पैसों से मोहताज पर दिल को संगीत का सकून - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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पैसों से मोहताज पर दिल को संगीत का सकून








मांगणियार जाति के लोक कलाकारों से एक खास मुलाकात  





अपनी माटी की सांैधी खुषबु जब संगीत के जरिये दिल को लगती हैं तो लोक संगीत सहज ही आम आदमी के दिलो दिमाग में उतरता चला जाता हैं । वक्त के साथ लोक संगीत के मायने बदले हैं पर यह कहना गलत होगा कि धुम धडाके के संगीत के दौर में उसका अस्तित्व संकट में है । हकीकत में तो लोक संगीत और भी परिपक्व होकर उभरा हैं । यह मानना हें मांगणियार समुदाय के लोक कलाकारों को जो आज अपनी जाति विषेष के परम्परागत संगीत को मारवाड की धरा से सात समुद्र पार 25 देषों तक ले जा चुके है। हाल ही स्पक मैंके के तहत चित्तौड़गढ़ आये इस कलाकार दल ने तमाम विषयों पर खुलकर बातचीत की ।  


आज के इस दौर में आपका यह लोक संगीत.....................?.  

हमारा संगीत पहले भी प्रासंगिक था और आज भी । राजा रजवाडे की महिफलांे की शान रहने वाला यह संगीत आज भी जब केसरिया बालम पधारो म्होरों देष के जरिये अपनी मजबूज अस्तित्व का अहसास करा सकता हैं तो, आपको स्वीकारनाहोगा की यह एक ऐसी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता हैं जिसमें वक्त के साथ अपनी पहचान को कायम रखने का सामथ्र्य हैं । परम्परागत वाद्य यंत्रों के साथ इस तरह की अद्भूत जुगलबंदी मिलना आपको मुष्किल है। 

फ्यूजन के दौर से तो यह भी अछुता नहीं.................................? 

यह सही हैं कि फ्यूजन के प्रभाव से यह भी अधुता नहीं रहा हैं लेकिन यह मानना गलत हैं कि हमने हमारे संगीत को उसके अनुरूप ढाल लिया हैं । हा,ँ यह एक कटू सत्य है कि कभी कभी पेट की मजबूरी के आगे हमारे कुछ साथियों को फ्यूजन के साथ समझौता करना पडा हैं, पर इसके लिये इस कला को प्रोत्साहन का अभाव व आर्थिक मजबूरी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं । इसका एक दूसरा पहलु यह भी हैं कि वक्त की मांग के साथ हमने अन्य संगीत षैलियो की अच्छाईयों को को लेकर अपने संगीत के साथ नवीन प्रयोग किये हैं । अभी हाल ही की प्रस्तुतियों में हमने ईरान की गायन षैली के साथ इस संगीत को मिक्स किया हैं, इसे आप दो संस्कृति के मिलन के रूप में भी तो देख सकते हैं । 

भविष्य और यह लोक संगीत........................ 

क्या आपको हमारी टीम के सबसे बुजुर्ग साथी षाकर खा की आँखों में अपनी जवान पीढी के हाथों में इस के सुरक्षित होने का आत्म विष्वास नहीं दिखता (कामयाना पर रियाज करते 65 वर्षीय षाकर खां की ओर संकेत करते हुये) ? जब तक हमारा यह समर्पण हैं, इसके भविष्य को लेकर हम आषंकित नहीं हैं । मारवाड के रेत के टीलो से निकलकर यह दल आज तक करीब 25 देषों में अपनी प्रस्तुतियां दे चुका हैं तो आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि इसे अभी और कहां तक पंहुचना है। 




बाडमेर की बाढ़ के वो दिन .......................... 


उन्हंे याद नहीं करना चाहते । बाडमेर में दो साल पहले आई बाढ़ में इस लोक संस्कृति को ही खतरे में डाल दिया था । उस बाढ़ में हुये आर्थिक नुकसान ने हमें एक बार तो हताष कर दिया था कि हम अब क्या करेगें ? चारों ओर पानी से घिरे होने के बावजूद हमारा यह ही जतन था कि हम हमारे परम्परागत वाद्य यंत्रों को सुरक्षित बचा पाये, हम इसमें काफी सफल भी रहे पर उबरने में काफी समय लगा । 


साम्प्रायिक सौहार्द और लोक संगीत............................  


हमारा गायन अंदाज सुफियाना षैली का हैं जो सीधे बंदे के मन के तार राम और रहीम से जोड देता हैं । संगीत कभी भी साम्प्रदायिक भावों की संर्किण विचारधाराओं में बंधकर नहीं रहा, यह तो व्यापक हैं जो दिलो के आपसी वैमनस्य को भूलाकर एक चिर स्थायी शांत वृति की और प्रेरित करता हैं । क्या आप कबीर को साम्प्रदायिक कह सकते हैं, जिसने पंडित व मौला को एक ही तराजु में तोलते हुये दुनिया को बेवकुफ नहीं बनाने की नसीहत दे डाली ? कबीर के विचारों को सुफियाना षैली का पूट देकर आमजन के सामने ले जाकर हम समाज को अनायास ही समता मूलक समाज का संदेष दे पा रहे है।  


वक्त के साथ इस लोक संगीत के आयाम............................  

करीब 14 पीढ़ियों से यह कला मांगणियार जाति के कलाकारों के हाथों सुरक्षित है। वक्त के साथ कला ने विकास के नये आयाम तय किये हैं । गांवों की चैपालो से निकलकर प्रतिष्ठित संगीत महफिलों में इसकी उपस्थिति यह बंया करने को काफी हैं कि इसने काफी लंबा सफर तय किया है। वक्त की मंाग हैं कि इस लोक कला की ओर मांगणियार जाति के अलावा अन्य वर्ग के व्यक्ति भी इसकी ओर रूख करे जिससे यह और भी परिपक्व व देष की पहचान बन सके, इसके लिये हम सदैव तैयार हैं । 

आपकी जिन्दगी और यह लोक संगीत......................

इसने हम पहचान दी हैं, मान सम्मान दिया हैं पर मन दुखता हैं आज भी परिवार के लोगों के लिये हम कुछ नहीं कर पाये । विदेषों में हवाई यात्राओं के जरिये इस कला को पंहुचाने वाले हम कलाकारों के घर के कई सदस्यों ने तो ट्रेन तक में सफर नहीं किया हैं । तालीम का अभाव आज भी रह रहकर हमे कचोटता हैं । दसवी से आगे की जमात हमने नहीं देखी । परिवार में आज भी कई बार पैसों के लिये मोहताज हो जाना पडता हैं । पर, सकून हैं कि आम लोगेंा के प्यार और अपनेपन ने इन अभावों को कभी दिल से महसूस नहीं होने दिया और कला से समझौता करने को विवष नहीं किया ।

द्वारा विकास अग्रवाल  










संपर्क
aggrawalvikas@gmail.com
(विकास लम्बे समय तक मीडिया से जुड़ा रहा,कभी स्पिक मेके आन्दोलन से जुड़कर बहुत अच्छे
 काम किये,फिलहाल स्वतंत्र रूप से लिखते हुए,आदित्य सीमेंट ,चित्तौड मे  केमिस्ट के रूप मे सेवारत हैं.)

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