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आईआईटी के एक छात्र ने लिखी स्पिक मैके की कहानी

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, नवंबर 06, 2009 | शुक्रवार, नवंबर 06, 2009

             हम अपने देश की सांस्कृतिक परम्पराओं और मूल्यों को विकृत करने के लिए युवा पीढ़ी को कितना ही दोष दें, इसी युवा पीढ़ी में कई बार ऐसे युवा आगे आते हैं जो हमारी परम्पराओं, मूल्यों और संस्कृति में एक स्वर्ण अध्याय जोड़ देते हैं। आईआईटी के एक छात्र ने आज से 25 साल पहले युवाओं में भारतीय संस्कृति के पारंपरिक मूल्यों और दर्शन से जोड़ने का जो स्वप्न देखा था वह आज स्पिक मैके के रूप में देश भर के कई शैक्षणिक संस्थाओं में हजारों युवाओं को एक नई दिशा में मोड़ रहा है। स्पिक मैके ने आज एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर दी है जो आने वाले समय में हमें शास्त्रीय संगीत से लेकर शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में हमारे स्थापित कलाकारों की कमी को कई आयामों के साथ पूरी करने में सक्षम होगी। जो काम करोड़ों रुपये खर्च करके बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घराने और सरकार नहीं कर सकती वो काम स्पिक मैके ने संकल्प और समर्पण से कर दिखाया है। प्रस्तुत है स्पिक मैके से जुड़े एक युवा की यह खास रिपोर्ट।

            अपनी पढ़ाई और शोध करने की उम्र में एक युवा को आईआईटी खड़कपुर से अपनी शिक्षा पूरी कर लेने के बाद उच्च शिक्षा पाने के लिए कोलम्बिया जाना पड़ा। विदेशी धरती पर पूरी तरह से पश्चिम के प्रभाव वाली हवा में आने पर इस युवा को एक बार उस्ताद् निसार अमीनुद्दीन डागर और उस्ताद ज़िया फरीदुद्दीन डागर का ध्रुपद गायन सुनने को मिला, बस उसी दिन से उसके मन में बहुत अन्दर तक असर करने वाला एक विचार, चिन्तन के लिए प्रेरित करता रहा। विदेशियों में भारतीय संगीत परम्पराओं के प्रति भारत के बाहर इतनी लोकप्रियता के साथ उनके अन्दर आदर देखकर आश्चर्यचकित, वह युवा देश (आचार्य किरण सेठ) लौटने पर आईआईटी दिल्ली में मैकेनिकल के प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएँ देने लगा। प्रोफेसर अनवरत काम करते रहे और अपने साथियों-विद्यार्थियों के साथ उसी विचार के इर्द-गिर्द तानाबाना बुनते रहे, समय गुजरता रहा। 1978 के कुछ साल पहले के शुरूआती दौर में कम दर्शकों और श्रोताओं के साथ ही कई अन्य मुसीबतों से गुजरता हुआ आन्दोलन, 1978 से अपनी असल शक्ल में आया फिर बाद से लेकर अभी तक की 31 वर्षों चली इस यात्रा का नाम ही स्पिक मैके पड़ा। ये यात्रा उसी प्रोफेसर की मेहनत थी।

                राजनीति से बहुत दूर पूरी तरह छात्र-सहभागिता वाले इस सांस्कृतिक आन्दोलन का नाम आज बहुत बडे़ रूप में बरगद की तरह दिखता है, जिसका बीज डालने वाले युवा अब इस ज़माने में डॉ. किरण सेठ के नाम से जाने जाते है। ज़िन्दगी भर अविवाहित रहते हुए सभी सामाजिक और विभागीय जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए स्पिक मैके के जरिये इस सफर में लाखों विद्यार्थियों को प्रेरणा देने वाले कार्यक्रमों को तैयार करने वाले किरण सेठ ही है। हजारों नौजवान आज उनके पीछे चल पडे़ है। जो अपने पढ़ने और पढ़ाने के बाद बचे हुए खाली समय में निःस्वार्थ भाव से सृजनात्मकता से भरे पूरे काम करते हुए नजर आते है । स्वयँ सेवा की भावनावाले इस आन्दोलन का नाम स्पिक मैके (सोसाइटी फॉर द प्रमोशन ऑफ इण्डियन क्लासिकल म्यूज़िक एण्ड कल्चर अमांग्स्ट यूथ) अर्थात युवाओं में भारतीय शास्त्रीय संगीत और संस्कृति के संवर्धन हेतु प्रयासरत् आन्दोलन के रूप में जाना जाता है। आईआईटी दिल्ली के 10-12 साथियों के साथ शुरू हुई ये कहानी, अभी तक तो रफ्तार पकड़ने ही लगी है, मंजिल बहुत दूर है। स्पिक मैके कलाकारों के लिए रोजी-रोटी की सुविधा उपलब्ध कराने या विद्यार्थियों को कलापरक ज्ञान बाँटने जैसे उपरी उद्देश्यों से, बहुत दूर की गहरी सोच और समझ पर टिका हुआ एक संगठन है।

                     आन्दोलन में संगीत और अन्य संस्कृतिपरक आयोजन के जरिये बहुत सुगमता के साथ सभ्यता के गुणों का विकास करना और प्रस्तुतियों के साथ साथ विद्यार्थियों को तपस्वी कला-गुरूओं, कर्मठ बुद्धिजीवियों का अल्प और प्रेरणादायी सानिध्य उपलब्ध कराना, खास उद्देश्य है जो आज के परिवेश से लगभग गायब हो गया है। आन्दोलन में लगभग सभी सदस्य निष्काम कर्म की भावना के साथ बरसों से परिवार के सदस्यों की भांति जुड़ाव बनाये हुए हैं। शुरूआत से लेकर अभी तक सभी बड़े कलाधर्मी महापुरूषों ने स्पिक मैके को नाममात्र के अल्प मानदेय पर भी अपना आशीर्वाद और सानिध्य प्रदान किया है। विद्यार्थी, संस्कृतिकर्मी, शैक्षणिक संस्थान, औद्योगिक घराने और राज्य सरकारें इसकी पवित्रता और ईमानदार उद्देश्यों से प्रभावित होकर यथासंभव सहयोग देने की मुद्रा में आज तैयार खड़ी हैं। अनौपचारिक रूप सें चलने वाले इस आन्दोलन में युवा सदस्य अपने वरिष्ठ और बुजुर्ग सदस्यों के निर्देशन में काम करते है।


                     समानतापरक प्रवृति वाले इस मंच पर पारिवारिक माहौल और सामाजिकता की भावना प्रमुख आकर्षण होती है। आन्दोलन की फितरत ही यही है कि कई विद्यार्थी इसमें आते हैं, उनमें से कुछ उत्साही और ऊर्जावान थोड़ा जुड़कर, ठहरकर आन्दोलन को देखते हैं और स्वयँ की ओर से कुछ जोड़ने की सोचते हैं। इसी बीच करिअर बनाने की दौड़ में चले जाते हैं और स्थापित होकर किसी ओहदे पर पहुँचकर, फिर से स्पिक मैके के लिए कुछ करने की सोचते हैं।

                आज ये आन्दोलन, देश के सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के अलावा विदेशी धरती के पचास के करीब शहरों में अपनी गतिविधियाँ संचालित कर रहा है। देशभर के 300 ज़िलों में फैलाव वाले इस परिवार में 2 या 3 कर्मचारियों को छोड़कर कोई भी वेतनभोगी कार्यकर्ता नही है। कभी चिठ्ठियों पत्रों और फोन द्वारा चलने वाला यह आन्दोलन अब मोबाईल, इन्टरनेट और बैठकों के जरिये अपने कार्यक्रमों को ज्यादा बेहतर तरीके से क्रियान्वित करने लगा है। जहाँ इस संगठन में 20 सदस्यों वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी, और राष्ट्रीय सलाहकार समूह के साथ ही राज्य स्तर पर राज्य समन्वयन समूह और राज्य सलाहकार बोर्ड अपना कार्य करते हैं वहीं चेप्टर लेवल पर एक छोटी कार्यकारिणी अपने दायित्व निभाती है। पूरे रूप से विकेन्द्रीकरण की प्रकिया अपनाते हुए, सेवा का दायित्व सभी स्तरों पर बाँटा जाता है। शैक्षणिक संस्थानों में स्पिक मैके सेन्टर और यूनिट्स भी बनाई जाती है जो अपने संस्थान में आयोजित कार्यक्रमों की जिम्मेदारी स्वयँ निभाती है।

                        केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी, केन्द्रीय साहित्य अकादमी या पदम सम्मानों से अलंकृत और पुरस्कृत हो चुके देश के हर क्षेत्र के शीर्षस्थ कलाकार स्पिक मैके के मंच पर अपने कार्यक्रम दे रहे हैं। आजकल केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी के बिस्मिल्लाह खान युवा पुरूस्कार से पुरूस्कृत कलाकार भी नई पीढ़ी के रूप में स्पिक मैके में आमन्त्रित किये जा रहे है।

                                 स्पिक मैके के सदैव सहयोगी रहे कलाकारों में पंडित शिव कुमार शर्मा, पंडित हरिप्रसाद चैरसिया, किशोरी अमोनकर, शुभा मुद्गल, गीतकार गुलज़ार, शबाना आज़मी, फारूख शेख, डॉ. मल्लिका साराभाई, पं. भीमसेन जोशी, डॉ. तीजन बाई, पं. विश्व मोहन भटट्, पं. बिरजु महाराज, सोनल मानसिंह, उस्ताद् फहीमुद्दीन डागर, उस्ताद असद् अली खान, अंजोली ईला मेनन, श्याम बेनेगल, अरूणा रॉय, मेधा पाटकर, गंगूबाई हंगल, उस्ताद शाहीद परवेज़, पं. राजन-साजन मिश्र, पं. रविशंकर, पं. जसराज, आदि से शुरू होने वाली सूची और भी कई नामचीन कलाकारों को साथ लेकर खत्म होती है । स्पिक मैके के लिए वैसे हमेशा किसी भी कला से ज़्यादा मायना उन व्यक्तित्त्वों से रहा है जो कला के साथ तपस्या भरा जीवन जीते हुए कार्य कर रहे हैं।

                             स्पिक मैके आज विश्वभर में प्रतिवर्ष स्थानीय सहयोगियों के साथ ही राष्ट्रीय प्रायोजकों की सहायता से 2000 कार्यक्रम कर पा रहा है। देश के 300 शहरों में होने वाली इन गतिविधियों के लिए वित्तीय साधनों की सदैव कमी ही रही है, फिर भी आवश्यकतानुसार सहयोग तो मिलता रहा ही है। आज जहाँ 14 से भी ज़्यादा राज्यों में वहाँ के राज्यपाल राज्य इकाई के अध्यक्ष बनकर सहयोग दे रहे हैं वहीं राष्ट्रीय सलाहकार समूह के अध्यक्ष के रूप में पूर्व प्रधानमन्त्री श्री आई. के गुजराल का सान्निध्य प्राप्त है।


                          स्पिक मैके अभी शास्त्रीय नृत्य, गायन और वादन के साथ ही विभिन्न प्रादेशिक लोक परम्पराओं और उनसे जुडे़ कलाकारों को भी साथ लेकर काम कर रहा है। देशभर में एक छोर से दूसरे छोर तक कलाकारों का आदान-प्रदान उनके कार्यक्रमों का आयोजन राष्ट्रीय एकता के लिए की गई एक ईमानदार कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। साथ ही सामाजिकता और जन सामान्य पर बनी फिल्मों का प्रदर्शन कर, बाद में फिल्मों को लेकर खुली चर्चाओं का आयोजन, हस्तकलाओं की प्रशिक्षण कार्यशालाएँ, योग और ध्यान शिविरों का भी आयोजन किया जा रहा है। स्पिक मैके कई बार सामाजिक कार्यकताओं, पर्यावरणविदों और साहित्यकारों को विद्यार्थियों तक ले जाकर वार्ताओं का आयोजन करवाता रहा है। ऐतिहासिक महत्व की इमारतों के प्रति अपनेपन की भावना भरने के लिए, जानकार इतिहासविद् के साथ हेरिटेज वॉक भी करवाये जाते है। संस्कृति के सभी पहलुओं को छुता स्पिक मैके रंगकर्म और वैश्विक कलाओं के लिए भी कार्य करता रहा है।

                              जहाँ स्पिक मैके द्वारा वर्षभर सतत् रूप से गतिविधियाँ चलाई जाती है वहीं इनकी समीक्षा करने हेतु हर 6 महीने में एक बार राज्य स्तरीय अधिवेशन और प्रत्येक वर्ष मई-जून माह में वार्षिक अधिवेशन का आयोजन किया जाता है। पिछले 32 सालों में 25 राष्ट्रीय महोत्सव हो चुके हैं। कार्यक्रमों के लिए जुलाई से शुरूआत करते हुए नवम्बर तक ‘‘ विरासत ‘‘ के नाम से आयोजन होते हैं। जिसमें हमारी संस्कृति से जुड़े हुए सभी पहलुओं को शामिल किया जाता है। दिसम्बर के अतिंम सप्ताह में राष्ट्रीय स्तर का ‘‘ स्पेशल इन्टेसिव‘‘, जालन्धर में होने वाले बाबा हरवल्लभ संगीत समारोह के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में देश भर में सभी राज्य ईकाइयाँ केवल शास्त्रीय संगीत से जुड़े हुए कार्यक्रम आयोजित करवाती है। पुनः अप्रैल माह के अन्तिम सप्ताह में विश्व नृत्य दिवस मनाने हेतु नृत्य प्रस्तुतियाँ आयोजित करवाई जाती है। मई और जून के दौरान होने वाले 6 दिवसीय वार्षिक राष्ट्रीय महोत्सव में देशभर के 1000 से भी ज्यादा लोगों द्वारा प्रतिभागिता निभाकर आश्रमनुमा वातावरण में समय बिताया जाता है जहाँ प्रातःकालीन योग, दोपहरकालीन कार्यशालाएँ और सायंकालीन सजीव प्रस्तुतियों की रूपरेखा बनी होती है। इन गतिविधियों के साथ साथ चेप्टर अपने स्तर पर साप्ताहिक बैठकों का आयोजन भी करता है जहाँ पत्र-वाचन, चर्चा, वाद-विवाद आदि का आयोजन करते हुए अन्य प्रस्तुतियों के लिए तैयारी और समीक्षा बैठकें आयोजित की जाती है। विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का विकास करने और उनके गुणों को दिशा देने के लिए यह आवश्यक और प्रभावी मंच बन पड़ा है।

                         स्पिक मैके कार्यक्रम समय की प्रतिबद्धता के साथ साथ कलाकार को ही मुख्य अतिथि मानते हुए सर्वाधिक सम्मान देने की सीख देता है। यह आन्दोलन अपनी प्रस्तुतियों में पूजा करने की भाँति, शांत और ध्यान की मुद्रा में बैठकर स्वयँ को जानने के प्रति प्रेरित करता है। स्पिक मैके कार्यक्रम किसी भी रूप में मनोरंजन कार्यक्रमों के रूप में नही देखे जा सकते जहां पोपकॉर्न खाते हुए चाय की चुस्किया भी ली जा सके। यह प्रस्तुतियाँ हमें लगातार अपनी ही जड़ों से परिचय देती व्यवस्थित होने के साथ साथ शालीन और संवेदनशील बनने को कहती है।

                           आन्दोलन से जुड़ने के लिए किसी भी प्रकार की औपचारिकताएँ नही हैं, जब भी किसी के मन में यह विचार आये की हमारी अपनी सांस्कृतिक धरोहर अक्षुण्ण और अपार है, उसे किसी से ख़तरा नही है, बस इसी समृद्ध विरासत को मुझे जानना चाहिए और साथ ही जुड़ाव बनाना चाहिए। यही विचार स्पिक मैके से जुड़ने की योग्यता हैं। इन्टरनेट पर दुनियाभर के ग्रुप बने हुए है जहाँ पिछले 10 वर्षो में बहुत गुणात्मक गति से फैल रहे स्पिक मैके की तस्वीर दिखाई देती है।

                          स्पिक मैके के लिए अपनी लगातार सेवाएँ देने वाले बुजुर्ग कलाविद् आज नही हैं। आन्दोलन को खड़ा करने के लिए अपनी और से बहुत बड़े योगदान देकर गए उस्ताद् बिस्मिल्लाह खान, पं. किशन महाराज, उस्ताद अमीनुद्दीन डागर, हबीब तनवीर, निर्मल वर्मा, विष्णु प्रभाकर, एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी, गुरू अम्मानुर माधव चाक्यार, कोमल कोठारी, केलुचरण महापात्र, उस्ताद अली अकबर खान, पं. रामश्रय झा, गंगुबाई हंगल, तैयब मेहता ऐसे और भी कई नाम है जो स्पिक मैके के मंच पर आए मगर आज हमारे बीच नहीं हैं।

                 आज स्पिक मैके एक ब्रान्ड नेम बन चुका है और यह सब कुछ साझा प्रयासों के बूते पर ही संभव हुआ है। आन्दोलन में डॉ. किरण सेठ से एक बार की मुलाकात ही किसी भी संस्कृतिकर्मी में बहुत सारी ऊर्जा उडे़ल देती है कि वह आन्दोलन के लिए अपनी ओर से भी कुछ करने का मन बना लेता है। संस्थापक डॉ. किरण सेठ का सादा लिबास, नरम भाषावली और अनुभवों का भण्डार उनके औज़ार है। कभी पश्चिमी संगीत के दीवाने और गिटारवादक रपे किरण अब बरसों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत और योग सीख रहे है। सादा जीवन और सादगीपूर्ण भोजन, नियमित योग, सरकारी सेवा और अपनी 94 वर्षीय माताजी की सेवा के बाद, स्पिक मैके के लिए बराबर रूप में समय निकालना और इन सब के साथ ही आधुनिक युग में रहते हुए बिना मोबाईल के आन्दोलन की बागडोर संभालना बहुत बड़े आश्चर्य पैदा करते हैं। किरण सेठ को उनकी इस यात्रा के लिए पिछले एक वर्ष में 4 बड़े पुरुस्कारों से नवाज़ा गया है जिनमें एनडीटीवी इण्डिया का ‘‘ इण्डियन ऑफ द ईयर अवार्ड‘‘, कलाधर्मी संस्था द्वारा ‘‘केशव स्मृति लाइफ टाईम एचिवमेन्ट अवार्ड‘‘, भारत सरकार का ‘‘पद्म श्री ‘‘ अलंकरण और दिल्ली घराने का चांद खॉ अवार्ड शामिल है।


                आन्दोलन की इतनी लम्बी यात्रा में स्पिक मैके की स्वयँ की कोई भौतिक सम्पदा नही है, यही इसकी एक अनौपचारिकता भरी विशेषता है। आईआईटी दिल्ली के सहयोग से वहीं दो कमरों में दो चार कर्मचारियों द्वारा कार्यालय खोलकर गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। आन्दोलन में सभी स्तरों पर कार्यकारिणियों का गठन और पदों पर सदस्यों का मनोनयन अधिकतम दो वर्षों के लिए किया जाता है और यह सारी प्रक्रिया आपसी सलाह से की जाती है। कोई भी युवा या विद्यार्थी इस आन्दोलन से जुड़ने के बाद एक अन्तर्राष्ट्रीय परिवार से जुड़ जाता है जहां उसे सभी प्रकार के मित्र और विद्वान साथी मिलते हैं। स्पिक मैके अपनी गतिविधियों में श्रमदान और वृक्षारोपण के लिए भी सदैव प्रेरित करता रहा है। स्वयं के सभी छोटे बड़े कार्य जहाँ तक हो सके स्वयँ करें की भावना से श्रमदान करवाये जाते रहे हैं।

                  स्पिक मैके द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर अपनी गतिविधियों की जानकारी त्रैमासिक समाचार पत्र ‘‘ संदेश‘‘ में नियमित रूप से प्रकाशित की जाती है। सदस्यों द्वारा इन्टरनेट के सहयोग से वेबसाइट, एसएमएस सेवा, न्यूज ग्रुप्स आदि के जरिये सूचनाओं को संप्रेषित किया जाता है। स्पिक मैके में पिछले कुछ बरसों से नवीन अवधारणाएँ भी शामिल हुई हैं जिनमें ‘‘ वर्ल्ड विरासत‘‘ के नाम पर जर्मनी, चीन, जापान और नार्वे जैसे देशों के परम्परागत कलाकार देश में आमन्त्रित किये जाते रहे हैं और भारतीय कलाकारों को अन्य देशों में भेजा जाता है। ऐसे ही ‘‘ म्युज़िक इन द पार्क‘ कार्यक्रम के तहत देश के शीर्षस्थ कलाकारों को व्यवसायिक रूप से मानदेय देते हुए जनसामान्य को जोड़ने हेतु प्रायोजकों का सहयोग लेकर सार्वजनिक स्थानों पर प्रस्तुतियाँ करवाई जाती है। दिल्ली के नेहरू पार्क में लगातार रूप से सफल होने के बाद पिछले दो वर्षों से जयपुर (राजस्थान) के सेन्ट्रल पार्क में भी ‘‘ म्युज़िक इन द पार्क‘‘ कार्यक्रम होने लगे हैं। ‘‘ स्पिक मैके कम्युनिकेशन ‘‘ के नाम से गठित मंच के जरिये कुछ कैसेट और सीडीज का प्रोडक्शन भी शुरू किया गया है। वहीं दूसरी ओर ‘‘ होलिस्टिक फूड‘‘ योजना में शिक्षण संस्थानों के केम्पस में विद्यार्थियों के लिए उचित दाम पर संन्तुलित और स्वास्थ्यवर्धक भोजन, ज्यूस, अंकुरित दालों और फलों की व्यवस्था होती है। फास्ट फूड संस्कृति के पूरक के रूप में यह कार्यक्रम आईआईटी दिल्ली में सफलतापूर्वक संचालित है।


                   ‘‘स्कूल इन्टेसिव‘‘ खासतौर पर कक्षा 6 से 12 तक के बच्चों के लिए किसी एक शिक्षण संस्थान में देश भर के 200-300 विद्यार्थियों का समागम होता है जहाँ आश्रमनुमा माहौल में विभिन्न प्रस्तुतियाँ और कार्यशालाएँ आयोजित होती हैं। ‘‘ गुरूकुल छात्रवृति योजना‘‘ भी एक अति महत्वपूर्ण योजना है जिसमें 14 से 25 वर्ष के विद्यार्थी एक अनौपचारिक साक्षात्कार के बाद देश के ख्यातनाम और साधनारत् कलाकारों के साथ गर्मी की छुटिट्यों में रहने का अवसर पा सकते हैं। स्पिक मैके इस प्रकार भारतीय सांस्कृतिक विधाओं को यथासंभव प्रकाश में लाते हुए प्रचारित और प्रसारित करने का कार्य कर रहा है। यह कार्य देशभर में कई रूचिशील कार्यकर्ताओं और उनके आपसी घनिष्ठ रिश्तों की बदौलत संभव हो पाता है। किसी भी रूप में यह आन्दोलन पश्चिमीकरण के विरोध में नहीं है। यह संगठन तो बस श्रेष्ठतम और गहरी कलावादी परम्पराओं को सहेजते हुए उन्हे बढ़ाने का कार्य कर रहा है। अभी तक आन्दोलन के प्रेरणा स्त्रोत डॉ. किरण सेठ रहे है, आगे भी रहेंगे। लेकिन पूरे देश में उनके विचारों से प्रभावित होकर कुछ कमतर गुणों के साथ और भी कई किरण सेठ तैयार हो रहे हैं, यही विचारधारा इस आन्दोलन को आगे भी थामे रहेगी।

                      स्पिक मैके ने यथासमय नई पीढ़ी के प्रतिभाशाली कलाकारों को भी समाज के समक्ष लाने में अपना योगदान दिया है। यथासंभव स्पिक मैके प्रशासनिक आयोजनों में भी उचित मार्ग निर्देशन प्रदान कर अच्छे परिणाम के लिए कार्य करता रहा है। स्पिक मैके, समयानुसार सरकार को शिक्षा प्रणाली में अपेक्षित सुधार हेतु सुझावभरी रिपोर्टस भी भेजता रहा है। देशभर में कई छात्र संगठन कार्य कर रहे हैं,लेकिन स्पिक मैके की कार्य प्रणाली और रूपरेखा अनोखे रूप में बनी हुई है। आन्दोलन की पहचान इसके प्रतीक चिन्ह से ही हो जाती है जिसमें भगवान शिव के तीसरे नेत्र जैसे लम्बरूप में आँख है, जिसका केन्द्र लाल रंग का है और पलके काले रंग की बनी हुई है। सभी प्रकार की प्रचार सामग्री पीले रंग के बेकग्राउण्ड पर बनायी जाती है। आज के परिवेश में युवाओं, विद्यार्थियों और रूचिशील संस्कृतिकर्मियों के लिए स्पिक मैके सदैव श्रेष्ठ मंच साबित हुआ है। यहाँ संस्थागत नियमों से बोझिल संविधान से कुछ अलग पूरी स्वतन्त्रता में रहते हुए गतिविधियों को अनुशासन के साथ देखे जा सकता है।


                        कोई भी संदेश या चेप्टर यदि स्पिक मैके कार्यक्रम की बड़ी प्रस्तुतियों को आयोजित करवाना चाहता हो तो उन्हें कलाकार के लिए आवास, भोजन, यात्रा, स्टेज और साउण्ड जैसी सामान्य व्यवस्थाएँ करनी होती है। प्रत्येक कार्यक्रम पर न्यूनतम लगभग 25-30 हजार रूपये खर्च होते है जिसके लिए आयोजन के इच्छुक संस्थान अपना हिस्सा और सामर्थ्य के अनुसार सहयोग देते है। ये कारवाँ यूं ही चलता रहेगा, लोग जुड़ते रहेंगे और हर युग में ईमानदार कोशिशों की याद दिलाएगा, स्पिक मैके। युवाओं के लिए कुछ चमत्कृत कर देने वाला आन्दोलन स्पिक मैके मेरी नजर से ऐसा ही दिखता है।

आलेख
 माणिक
स्पिक मेके कार्यकर्ता,आकाशवाणी उद्गोषक और अध्यापक


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