सांवत्सरिक क्षमापना - अपनी माटी Apni Maati

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सांवत्सरिक क्षमापना


साल में हमसे कोई, हुइ्र कभी हो भूल
वंदन कर माँगे ‘क्षमा’ पर्युषण का है मूल।
तप-आराधना नित करे, श्रद्वा सारू आप
समता उर में जगे, मेट दिलो के पाप।
रिवाज धर्म का जब चले, खुले ‘मोक्ष’ के द्वार
कषाय कर्म को छोड़ दे, सुखी रहे संसार।
‘‘क्षमा वीरस्य भूषणं’’ अहं कायर अज्ञान
मायत सेवा जो करे जीतले सकल जहां।
परखो अपने दोष को चाहो अगर उद्वार
नाते-रिश्ते झूठे हैं अनुभव का यही सार।
क्षमायाचना
अहं भूल खुश रहो, कर थोड़ा उपकार।
दुःख से बचने का यही, एक मात्र उपचार।।
गुस्सा, नफरत छोड़ दे, करे ना तिरस्कार।
तन-मन-नित स्वस्थ रहे, सुख का यही आधार।।
आपसी रंजिश भूल, रिश्ते नया रचा।।
‘मिच्छामि दुक्कडं’ कहो, जीवन दो सजा।।
माफ करना सीखिए, भूल गुण इंसान।
धन-दौलत ये कुछ नही, जब हो क्षमा।।
अक्षम्य कोई जुर्म नही, विवेक की है बात।
त्याग-समन्वय संग चले तो, मिट जाये आघात।।
संवत्सरी पर्व पर, माँगे क्षम का दान।
‘‘क्षमावीरस्य भूषणं’’ मान ले तू नादां।।
दिल दुःखाया हो यदि दी कोई यातना।
भूल करे ना फिर कभी, करे क्षमा याचना।।

दिलीप गांधी,चित्तौडगढ 

1 टिप्पणी:

  1. माणिक जी, आपके सभी ब्लॉग का बहुत अच्छे से चक्कर काट कर आ रहा हूँ. कुछ को आपने बहुत अच्छे से सजाया है तो कुछ पर बहुत अच्छा लिखा है. कहने का भाव यह है की मै खुद नहीं समझ पा रहा हूँ की किस चीज की तारीफ करूँ और किस को छोड़ दूँ. वैसे मैंने आपके ब्लॉग को फालो कर लिया है. जब दिल चाहेगा चक्कर लगा लिया करूँगा. आप भी कभी गुफ्तगू में शामिल हो.
    www.gooftgu.blogspot.com

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मुलाक़ात विद माणिक


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