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तुर्रा - कलगी लोकनाट्यकला

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, फ़रवरी 21, 2010 | रविवार, फ़रवरी 21, 2010






भारतवर्ष एक बहुसंस्कृति राष्ट्र है, जिसमें लोक कलाओं का अपार भण्डार है। देश के प्रत्येक क्षेत्र में लोक कला का कोई न कोई रूप पाया जाता है। राजस्थान की संस्कृति में लोकनाट्यों का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि राजस्थान में लोकनाट्यों के जितने स्वरूप प्रचलित रहे हैं, उतने संभवतः देश के अन्य किसी राज्य में नहीं है।
‘लोकनाट्य’ को ‘ख्याल’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘ख्याल’ खेल शब्द का अपभ्रंश है, तथा इसमें नाट्यतत्व की प्रधानता रहती है। ‘ख्याल’ एक प्रकार से संगीत प्रधान लोकनाट्य है। श्री अगरचन्द नाहटा के अनुसार ख्यालों की पूर्व परम्परा, अर्थात् जो मध्यकाल में जनसाधारण में प्रचलित रास, चर्चरि, फागु आदि रचे व खेले जाते थे, वे ही कालान्तर में रम्मत, रामत, ख्याल के रूप में प्रकट हुए। डॉ. महेन्द्र भानावत की मान्यता है कि राजस्थान में ख्यालों की परम्परा लगभग 350 वर्ष पुरानी है। ख्यालों की लोकधर्मी परम्परा 17वीं शताब्दी में आगरा के निकट प्रारम्भ हुई। यहीं से ख्याल साहित्य की एक धारा की विधा ने उत्तरी भारत के आगरा, दिल्ली, मथुरा, वृन्दावन में पैर पसारने के पश्चात् राजस्थान के अलवर, भरतपुर, श्री महावीर जी से होकर करौली में प्रवेश किया। करौली के शहरी क्षेत्र में तुर्रा-कलगी का बैठकी ख्याल और ग्रामीण अंचलों में ‘हेला ख्याल’ खूब प्रचलित हुए। बाद में हेला ख्याल गंगापुर और लालसोट के ग्रामीण अंचलों में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। तुर्रा-कलगी की इस परम्परा ने मंजिल पाई दक्षिण राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में। 
लोकनाट्य परम्परा का उद्गम चूंकि जनसाधारण या लोक से और लोक के लिए हुआ है, अतः ये सरल और आडम्बरहीन हैं, किन्तु तकनीक की दृष्टि से ये सर्वांग सम्पूर्ण हैं। लोकनाट्य शास्त्रीय नाट्य नहीं हैं। ये तो जनसाधारण के मनोरंजन के लिए हैं और जनसाधारण के द्वारा ही अभिनीत होते हैं। राजस्थानी लोकनाट्यों में रंगमंच खुला ही होता है। सामान्यतः गांव के किसी चैराहे या देवालय पर इनका मंचन किया जाता है। स्थानीय संसाधनों और जनसामान्य के सहयोग से खुला मंच इस तरह तैयार किया जाता है कि दर्शक उसके चारों ओर बैठकर ख्याल का आनन्द ले सके। इसमें किसी विशिष्ट दीर्घा का निर्माण नहीं किया जाता है। साजिन्दों के बैठने के लिए मूल रंगमंच के बगल में एक छोटा मंच इस प्रकार बनाया जाता है कि दर्शकों के लिए यह व्यवधान न बने। मूल रंगमंच से काफी दूर पुरुष एवं सभी पात्रों के उतरकर मूल रंगमंच पर प्रवेश करने के लिए एक ऊँची अट्टालिका का मचान बनाया जाता है, जिसके पास एक सीढ़ी लगाई जाती है। पात्र अपना परिचय मचान से ही देते हैं, तत्पश्चात् गाते हुए नीचे उतरकर रंगमंच पर अभिनय एवं गाने के लिए आते हैं। तुर्रा - कलगी (माच)
 

तुर्रा-कलगी ख्यालों के उद्भव के सम्बन्ध में प्रचलित एक रोचक प्रसंग के अनुसार तुकनगिरि गुसांई महात्मा थे और भगवा वस्त्र धारण करते थे जबकि शाहअली मुसलमान फकीर थे जो हरे कपड़े पहनते थे और शक्ति की उपासना करते थे। दोनों ही सन्त प्रकाण्ड विद्वान तथा आत्मज्ञानी थे और कभी-कभी आपस में शास्त्रार्थ करने बैठ जाते थे। धर्म, योग, न्याय, वेदान्त तथा अध्यात्म जैसे गंभीर विषयों पर इनमें लम्बी बहस चलती। ज्ञानी होने के कारण दोनों में विवाद चलता रहता था। एक बार राजा ने जब इन दोनों के बारे में सुना तो

तुर्रा - कलगी ख्याल विधा की एक विशिष्ट शैली है, जिसे मेवाड़ - मालवा अंचल में ‘माच का खेल’ भी कहते हैं। ‘माच’ संस्कृत शब्द ‘मंच’ का अपभ्रंश है - एक ऐसा स्थान जो सामान्य धरातल से ऊंचा हो और जिसे लड़कियों, तख्तों और अन्य उपकरणों से जुटाकर बनाया जाय। नाट्याभिनय प्रस्तुत करने के लिए इसे ‘रंगमंच’ की संज्ञा दी जाती है। रंगमंचीय आडम्बरों से मुक्त मंच पर प्रस्तुत किये जाने वाले खेल कालान्तर में ‘माच’ कहलाने लगे। चित्तौड़गढ़ के निकटवर्ती भागों में ‘ख्याल माच’ या ‘माच का ख्याल’ बहुत लोकप्रिय है। राजस्थान में तुर्रा-कलगी ख्याल मुख्य रूप से चित्तौड़गढ़, निम्बाहेड़ा, बस्सी, बेगूं, करौली, हिण्डौन, भरतपुर, अजमेर, छोटीसादड़ी, किशनगढ़ आदि क्षेत्रों में प्रचलित हैं। निकटवर्ती मध्यप्रदेश के मालवा अंचल का नीमच, जावद, अठाणा आदि भी तुर्रा-कलगी अखाड़ों के केन्द्र रहे। ऐसा माना जाता है कि तुर्रा-कलगी शैली के जन्मदाता सन्त तुकनगिरि और शाहअली थे, जिन्होंने लगभग 450 वर्ष पूर्व कवित्त गाने की इस परम्परा को प्रारम्भ किया। तुकनगिरि शिव के और शाहअली शक्ति के उपासक थे। इनका निवास दिल्ली-आगरा के आसपास था
 । उत्सुकतावश उन्हें अपने दरबार में शास्त्रार्थ के लिए निमन्त्रित किया। कई दिनों तक दोनों के बीच काव्यात्मक शास्त्रार्थ चला परन्तु निर्णय नहीं निकला। फलस्वरूप राजा ने प्रसन्न होकर तुनकगिरि को अपने मुकुट का तुर्रा और शाहअली को कलगी भेंट की। इस पर ‘तुर्रा कलगी’ दो ख्याल गायक वर्गों का अभ्युदय हुआ। तुनकगिरि के अनुयायी अपने चंग पर भगवा रंग और शाहअली के अनुयायियों ने हरे रंग के साथ कलगी का निशान चढ़ाना आरम्भ किया। तुनकगिरि एवं शाहअली हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने वाले सन्त थे, जिन्होंने शिव एवं शाक्त धर्मावलम्बियों के झगड़ों को मिटाने का प्रयास किया। तुनकगिरि ने शिव की प्रशंसा में और शाहअली ने शक्ति की उपासना में अनेक कवित्त लिखे। दोनों सन्तों की महफिल प्रतिदिन लगती थी - जिसमें कवित्त कौशल का प्रदर्शन होता था। तुनकगिरि अगर शिव की प्रशंसा में एक कवित्त गाते तो उसी तर्ज में शक्ति की प्रशंसा के रूप में शाहअली उत्तर देते थे। दोनों ही सन्त आशुकवि थे तथा यही कौशल उनके अनुयायियों में विकसित हुआ। शिव और शक्ति के सम्बन्ध में कोई ऐसा पक्ष नहीं रहा जिस पर छन्दों की रचना न की गई हो। तुर्रा - कलगी के काव्य दंगल में समस्त हिन्दू धर्म का दर्शन समाविष्ट हो गया।

जब लड़ती थी तो उनका आलम ही कुछ और होता था। शताब्दियों से तुर्रा-कलगी अखाड़ों के मध्य इस बात पर बहस होती आई है कि तुर्रा और कलगी में से कौन श्रेष्ठ है। अखाड़ा तुर्रा वाले तुर्रा को ‘ओम्’ का प्रतीक मानते हैं वहीं अखाड़ा कलगी वाले कलगी को आदिशक्ति का प्रतीक मानते हैं। तुर्रा पुरुष और अखण्ड ब्रह्मचारी है, कलगी नारी तथा अक्षत कुंवारी है। चित्तौड़गढ़ के अखाड़ा तुर्रा के उस्ताद स्व. श्री चैनरामजी गौड़ ने तुर्रा-कलगी का ब्याह नामक एक लोकप्रिय ख्याल की रचना की है। दोनों अखाड़ों का कथन है कि ः-

कलगी पक्ष - है आदिशक्ति अवतार हमारी कलगी।

सब सृष्टि रचावनहार हमारी कलगी।। 


ा तुर्रा। तेरी शक्ति का सरदार हमारा तुर्रा

तुर्रा पक्ष - है ओम् शब्द ओंकार हमा

रा।। कलगी का खसम नहीं तुर्रा सुत ब्रह्मचारी। 


ष - है आदि अन्त से कलगी अखन कुंवारी। 

फिर भी कलगी का भरतार हमारा तुर्रा।। 

कलगी पक्ष यही है जग जननी है तुर्रे की महतारी।। 


ये इन काव्य-दंगलों का उद्देश्य धार्मिक वैमनस्य उत्पन्न करना नहीं था, वरन् शिव एवं शाक्तों के मध्य व्याप्त वैमनस्य को मिटाकर समाज में समरसता और भाईचारे का विस्तार करना था। प्रभाव यह हुआ कि तुर्रा एवं कलगी के अखाड़े अनेक स्थानों पर स्थापित हुए। दोनों ही अखाड़ों के समर्थक प्रेम - भाव से तर्क - वितर्क में सम्मिलित होते और उत्कृष्ट कोटि की काव्य रचनाओं से साहित्य की गौरववृद्धि करते थे। यह परम्परा अनेक वर्षों तक चलती रही और कालान्तर में राजस्थान और मध्यभारत में इसका प्रवेश हुआ। नीमच, मन्दसौर, जावरा, चित्तौड़, घोसुण्डा के कुछ साहित्य प्रेमियों ने अपने-अपने कस्बों और गांवों में तुर्रा - कलगी के अखाड़े स्थापित किये। इन अखाड़ों में जाति, धर्म, व्यवसाय, ऊंच-नीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। ब्राह्मण, बनिये, कायस्थ, क्षत्रिय, मुसलमान आदि सभी बड़े प्रेम से इन काव्य - दंगलों में भाग लेते और उत्कृष्ट काव्य रचनाएँ प्रस्तुत करते थे।

कुश्तियों के दंगल तो बहुत देखे होंगे आपने, किन्तु तुर्रा-कलगी ख्यालों में तो काव्य का दंगल जमता है और मुकाबला भी ऐसा होता है कि श्रोता रात भर आत्मविभोर हो, दोनों पक्षों के दांव-पंेच सुनता-देखता रहता है। तुर्रा-कलगी पक्ष की रंगतें तथा टेकरचनाएँ रहस्यवाद की पर्याप्त झलक देती हैं। कलगी को अखण्ड कुंवारी और तुर्रे को बाल-ब्रह्मचारी मानते हुए भी तुर्रे को कलगी का पति अखाड़ा तुर्रा मानता है और उसके गर्भ से समस्त विश्वशक्ति का जन्म होने की अवधारणा को स्थापित करता है। ब्रह्म और माया के इस शाश्वत और विचित्र सम्बन्ध को लेकर कवियों ने तुर्रा-कलगी का विपुल साहित्य रच डाला है।

समस्याएँ चित्तौड़ के अखाड़ा तुर्रा के उस्ताद श्री चैनरामजी गौड़ और उनके पश्चात् महान खिलाड़ी श्री नानालाल जी गन्धर्व तथा घोसुण्डा के अखाड़ा कलगी के उस्ताद श्री खाजू बेग जी के निधन के पश्चात् इन अंचल में इन अखाड़ों की स्थितियों में भारी शून्यता उत्पन्न हो गई है। अखाड़ों का आन्तरिक अनुशासन शिथिल हो गया है। उस्तादों एवं खिलाड़ियों के बीच परस्पर संवाद और अनुशासन में कमी हुई है। इसके साथ ही साथ विगत 40-50 वर्षों में आम आदमी के आर्थिक जीवन पर जो प्रभाव पड़ा है, उसका संकट तुर्रा-कलगी नाट्य विधा पर भी देखने को मिल रहा है। खिलाड़ी ही नहीं स्वयं उस्ताद लोग भी अपने एवं परिवार के भरण-पोषण की समस्याओं में इतना उलझ गये हैं कि अब अखाड़ों के प्रति उनमेंे पहले की भांति समर्पण का भाव और कला के प्रति प्रतिबद्धता समाप्त से हो गये हैं। नया सृजन, नये खेलों की रचना, बैठक ख्यालों की परम्परा, निरन्तर रिहर्सल, राग-रागिनियों का ज्ञान, परम्परागत तर्जों का अभ्यास एवं उनकी जानकारी आदि सभी कुछ विलुप्त होते जा रहे हैं। जिस गुरु-शिष्य परम्परा के बलबूते पर तुर्रा-कलगी के अखाड़े सरसब्ज थे, अब वे उजाड़ से नजर आते हैं। उस काल में जब समाज में मनोरंजन के साधनों का अभाव था, लोगों का जीवन अत्यन्त सरल था, जीवन की आवश्यकताएँ अत्यन्त सीमित थीं, समाज के विभिन्न वर्गों में परस्पर भाईचारा और और प्रेम था, उस समय तुर्रा-कलगी जैसी लोक संस्कृति की विधाओं का अत्यन्त महत्त्व था और समाज का भी संरक्षण एवं सहयोग इन्हें प्राप्त था। आज टी.वी. रेड़ियो, सिनेमा, दूरदर्शन आदि के प्रचलन में आने तथा लोक संस्कृति के प्रति समाज में रुझान कम हो जाने से शहरी क्षेत्रों में लोकनाट्यों की यह विधा अब अप्रासंगिक सी होती जा रही है। उज्ज्वल पक्ष यह है कि गाँवों में अभी भी तुर्रा-कलगी ख्यालों के प्रति लोगों का रूझान है, जिसके कारण इनका मंचन गांवों में बदस्तूर जारी है। किन्तु एक कटु सत्य यह स्वीकार करना पड़ेगा कि खिलाड़ियों की नाट्य एवं गायकी प्रतिभा अब पहले जैसी नहीं रही है। कुछ वर्षों पूर्व तुर्रा-कलगी विधा वे पुनर्विकास के लिए पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र उदयपुर ने गुरु-शिष्य परम्परा की योजना अन्तर्गत घोसुण्डा के कलगी अखाड़े के उस्ताद अकबर बेग को जिम्मेदारी दी एवं उन्हें वित्तीय सहायता भी स्वीकृत की। किन्तु इस योजना का भी कोई विशेष लाभ अब तक नजर नहीं आ पाया है। सुझाव ः 1. परम्परागत अखाड़ों को स्वहपेजपब एवं वित्तीय सहायता देकर मजबूत बनाना। 2. पुराने ख्यालों को इस पकार त्मबंेज करना कि लगभग 1) से 2 घण्टे में उनकी प्रभावपूर्ण प्रस्तुति हो सके। 3. कार्यशालाओं के माध्यम से आधुनिक थियेटर को ख्याल परम्परा से जोड़ना। 4. परम्परागत राग-रागनियों एवं तर्जों का नई पीढ़ी को अभ्यास कराने के लिए गुरु-शिष्य परम्परा को संस्थागत आधार पर लागू करना। 5. लोक संस्कृति के इन अखाड़ों के उस्तादों और खिलाड़ियों के लिए पेन्शन@मानदेय की समुचित व्यवस्था लागू करना तथा स्थानीय आधार पर कार्यरत प्रतिनिधि सांस्कृतिक संस्थाओं के माध्यम वित्तीय अनुदान की व्यवस्था करना। 6. परम्परागत ख्यालों के मंचन के लिए संस्कृति विभाग या संगीत नाटक अकादमी र्या ॅब्ब् के माध्यम से वित्तीय अनुदान की व्यवस्था करना। 7. लघु अवधि के ख्यालों का राज्य एवं देश में विभिन्न मंचों पर मंचन करवाना। 8. तुर्रा-कलगी अखाड़ों के पास विपुल मात्रा में समृद्ध लोक साहित्य विद्यमान है, उनके सम्पादन एवं प्रकाशन के लिए विशेष वित्तीय पैकेज स्वीकृत करना। प्रो. सत्यनारायण समदानी सचिव, मीरा स्मृति संस्थान चित्तौड़गढ़ (राज.)
९४१४१४८५३७
meerayan@gmail.com

आलेख ; शोध पत्रिका मीरायन पत्रिका से साभार 
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