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जन संस्कृति मंच गोष्ठी

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on बुधवार, फ़रवरी 24, 2010 | बुधवार, फ़रवरी 24, 2010


नाटककार शिवराम का व्याख्यान
उदयपुर। साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा नये उपनिवेशीकरण की मुहिम को ही वैश्वीकरण कहना चाहिए और कला सृजन के सभी माध्यमों के समक्ष इसी वैश्वीकरण की चुनौती है। सुप्रसिद्ध जन नाटककार और कवि शिवराम ने उक्त विचार जन संस्कृति मंच, उदयपुर द्वारा आयोजित एक गोष्ठी में व्यक्ति किए। उन्होंने कहा कि कलाएँ जनसाधारण की अभिरुचियों के अनुरूप ढले और कलाकार उनके बीच सक्रिय हों तो नयी चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। केवल शहरी लोगों के बीच फँसी रहकर कलाएँ आज की चुनौतियों का सामना नहीं कर सकती। गोष्ठी में शिवराम ने अपने चर्चित जन-नाटकों की रचना प्रक्रिया पर कहा कि नुक्कड़ नाटक जन साधारण के बीच सीधा सांस्कृतिक हस्तक्षेप है जिसकी अपनी भाषा और व्याकरण है। यहाँ अभिनेता के पास देह भंगिमाओं, गति और स्वर के सिवाय कुछ नहीं होता। उन्हों कहा कि हम नाटक के माध्यम से शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्षशील चेतना जाग्रत करना चाहते हैं।
आयोजन में वरिष्ठ आलोचक प्रो. नवल किशोर ने कहा कि अपने समय में हस्तक्षेप करने के लिए ही किसी रचना का व्यापक मूल्य होता है। उन्होंने शिवराम के नये नाटक ‘गटक चूरमा’ को साम्राज्यवादी दबावों के प्रतिरोध में गढ़े नये रचना शिल्प का उदाहरण बताया। युवा लेखक पल्लव ने कहा कि अलोचना के समक्ष यह दोहरी चुनौती है कि वह न केवल मनुष्य विरोधी प्रवृत्तियों का प्रतिरोध करे अपितु अपने समय की वास्तविक रचनाशीलता की भी पहचान करे। पल्लव ने शिवराम के सद्य प्रकाशित काव्य संकलनों ‘कुछ तो हाथ गहो’, ‘खुद साधो पतवार’ व ‘माटी मुळकेगी एक दिन’ की चर्चा में कहा कि अपनी कविताओं में भी शिवराम वंचित स्वर को प्रधानता देते हैं। मीरा गर्ल्स कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मंजु चतुर्वेदी ने रचना के विकास के लिए रचनाकारों द्वारा आलोचना को स्वीकार किए जाने की जरूरत बताई।
अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि नंद चतुर्वेदी ने कहा कि हमारे समय के हिन्दी पठन में जबरदस्त उछाल आया है तथापि गुणवत्ता और संख्या के भेद को पहचानना आवश्यक है। नंद बाबू ने हाल ही उदयपुर पर लिखी जा रही अपनी कविता शृंखला की दो कविताओं का पाठ भी किया। उन्होंने कहा कि प्रतिरोध जरूरी है लेकिन साहित्य की कसौटी के मानकों में सामंजस्य नहीं भूलना चाहिए। संयोजन कर रहे जन संस्कृति मंच के राज्य समन्वयक हिमांशु पंड्या ने साहित्य अकादेमी (नई दिल्ली) द्वारा सेमसुंग टैगोर पुरस्कार प्रारंभ करने को संस्कृति के क्षेत्र में साम्राज्यवादी घुसपैठ बताते हुए कहा कि अब प्रतिरोध का स्वर तेज करने के लिए संगठनबद्धता की जरूरत और गहरी हुई है। गोष्ठी में आनन्द गोदिका, मलय पानेरी और नंदलाल जोशी ने भी अपने विचार रखे।
गजेन्द्र मीणा
जन संस्कृति मंच
403, बी-3, वैशाली अपार्टमेन्ट, उदयपुर-313002, दूरभाष-0294-2467627


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2 टिप्‍पणियां:

  1. tagore puruskar par aapatti naheen honi chahiye. haan tagoe ke aage (aur na hi peechhe) samsung avashya naheen hona chahiye. yeh bataane mein koi harz naheen hai ki puruskaar rashi kahaan se prapt huyee hai. Sahitya akademi ko yeh sajha sujhav bheja ja sakta hai.
    - Om Prakash Prajapati

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