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कविता -अजीब करवट

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, मार्च 05, 2010 | शुक्रवार, मार्च 05, 2010


बरसों बीते जिस जीवन में ,
उससे पलटी मार रहा हूं,
सीधे रास्ते पसन्द नही ,
अब पगडण्डी नाप रहा हूं,
अनजानों मे खोया सा,
अपनेपन की चाह लिये,
असली मतलब भूल गया हूं,
नकली प्यारा-प्यारा है,
चल पडा़ है सारा जीवन,
जहां नींद नही बस करवट है,
बेमतलब की भागादौड़ी,
खून के रिश्ते खून-खून हैं,
मज़बुरी की इस करवट में,
रूक रूक कर सांसे आती है,
अपने और परायेपन का,
याद कहां कब रहता है,
खबर कम ही रहती है मुझे,
गांव में छूट गये  मां-बाप की,
बचपने के उन साथियों की ,
जो मिलते नही है आजकल,ओनलाइन,
ताज़ा खबरों का  खबरी बन बैठा,
बोल सकता हूं घंटों तलक,
बाबा रामदेव,अमिताभ के ब्लोग,
और अखबारी चर्चाओं पर,
मगर याद नही,
हालचाल इन दिनों के,
कि कब ?,
बस्ती वाले बाबा गुज़र गये,
गांव का खास कुआ कब सुख गया,
जहां बिजली की कटौती भारी है,
बहुत देर से पता लगा कि,
शहर की कच्ची बस्ती पर बंगले खडे़ गये,
हो गये अपने पराये से और,
खाद और दवाओं से खेती बंज़र,
खो चुका हूं बहुत कुछ मैं,
जागने की अब बारी है,
थोड़ा थोड़ा सबकी बारी,
सबसे मिलकर जीवन है,
अपनी धून में कब तक चलता,
साथ बिना सब निश्फल है,


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