गंगा - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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गंगा


गंगा .............. एक अलौकिक और शाश्वत नाम ................. एक परम्परा ............. एक आस्था ............. एक विश्वास


भारत की माटी का कण-कण उसके स्नेहिल अनुराग से ओत-प्रोत हर भारतवासी उस ममता और करूणा के आगे नतमस्तक है प्राणाधार की अन्तर्चेतना, भागीरथ का तप और परमपिता शिव की सहमति से अविरल धारा स्वर्ग से भारत भूमि पर प्रकट हुई .............. 
और शाश्वत और चिरन्तन बन गई .............




सत्य है निष्ठा है प्रेम सदाचार है श्रद्धा है और विश्वास है उस धरती पर जहां गंगा बहती है सारा भारत अछूता नहीं है गंगा मैया से सच मानों तो हर भारतवासी के प्राणों में बसती है गंगा ऐसी एकात्मकता और ऐसी विलक्षणता है उस जल में कि माटी का हर पुतला यही कहता है कि हम बने है


भारत भूमि की मिट्टी और गंगा के पवित्र जल से ............. इसी धरती पर जन्म लेंगे जहां गंगा बहती है मन और आत्मा से जुड़ी बातें आस्था और धार्मिक विश्वास की अविरल धारा जिसमें नहाकर प्राणी का काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद और सभी क्लेश घुल जाते हैं। आत्मा का बोझ हल्का कर मनुष्य उस गंगा के तट पर अपना सिर टेक देता है उस जल में डूबकी लगाकर आत्मा तृप्त हो जाती है जिस जल को अंजुलि में भरने को देवता भी तरसते हैं उस जल से हर भारतवासी का उद्धार होगा यही गंगा का प्रण है यूं तो लौटा भर पानी घर बैठे ही गंगा जल समझ कर पीया जा सकता है पर मन को कहा स्वीकार है........ कोसों दूर होकर भी गंगा मैया मन से बेहद करीब है कौन अभागा उसके तट पर जाकर अछूता रहेगा माँ का आँचल पुकारकर बुला ही लेता है अपने सपूत को ........... ये तो प्रेम की भाषा है।






भगवान शिव के मस्तक पर बैठी चन्द्रिका देवी पार्वती के लिये ईष्र्या का विषय है किन्तु उस गंगा से उन्हें कोई कष्ट नहीं जो शिव की जटा से निकल कर उनके चरणों में गिरती हुई जन कल्याण के लिये बह रही है। गंगोत्री से कलकता तक ये अखण्ड धारा गति से चलायमान है...... कर्म की प्रेरणा, परिहित का संदेश क्या कुछ नहीं हैं गंगा के पवित्र जल में... ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयाग और काशी वो तीर्थ है जहाँ दिव्यता है, पवित्रता है पर गंगा के उस पवित्र स्वरूप को तो वो हिमाचल ही जानता है जहां से गंगा निकल कर चली थी ...... उस गंगा की फिक्र कौन करे जो जन कल्याण की संवाहक है उसे क्या पता दूसरों का मैल धोकर वो कितनी मैली हो गई है राम ही जाणे।







हर हर गंगे - तेरे जल में सृष्टि के काया कल्प की क्षमता है
तेरी लहरों में संस्कृति की लय है

है तेरे स्वरूप में कुसुम की असंख्य कलियां खिल कर
हंसते हुए मोतियों की स्वर्णिम सा आभास कराती है जब स्नेह सुधा से सिंचित होकर भारत उपवन बन जाता है

मोक्ष के द्वार खुल जाते है
रोशनी की उस स्निग्ध धारा में नहाकर मन पाप मुक्त हो जाता है




कभी बस्ती से, कभी वादियों से, कमी मैदानों से, कमी पहाड़ों से, कभी पूरब से, कभी उतर से, गंगा आवाज देती है अपने वतन वालों को .......... तेरे जल से अपना इतिहास लिखा है भारत भूमि के वीरों ने........ गंगा और जमना का संगम प्रयाग, जहाँ कुम्भ का समागम देखकर पुलकित होती होगी गंगा मैया मेलों का रेला और हर हर गंगें का जयकारा एकता का यही मर्म हमें बांधे हुए है एक सूत्र में फिर चाहे पूरब हो या पश्चिम-उत्तर हो या दक्षिण...... हम सब है तो आखिर भारतवासी

इस धरती का सुख देखकर तू खूब इठलाती है और तेरा पानी रोता है जब देश की अखण्डता को चोट पहुंचती है इस धरती का सुख दुख उसी का है जिसने सदियों से धरती को पाला है पोसा है..... युगों से सब कुछ सहकर जिसने एक होकर रहना सिखाया उस गंगा मां के जल में चरितार्थ होता है नारी का जीवन और भारत की हर नारी के मन में गंगा जैसा सतीत्व और हर पुरुष के हृदय में हिमालय सी स्थिरता, धन्य है गंगा, धन्य है गंगा की धारा, सूबे से सरवदों तक, बस्ती से नदिया तक, नदिया से पहाड़ों तक और पहाड़ों से हिमाला तक माटी का कण कण उस संगीत में रचा बसा है जो तेरी कल कल में समाया हुआ है।
तेरी महिमा का जितना करूं उतना कम है क्यों कि तू तो मां है गंगा माँ ................

रचना भगवती लाल सालवी की है
जो फिलहाल अध्यापन के साथ-साथ आकाशवाणी चित्तौडगढ में उद्गोषक हैं.-9460608977

2 टिप्‍पणियां:

  1. यह कलकल-छलछल बहती क्या कहती गंगा धारायुग युग से बहता आता यह पुन्य प्रताप हमारा
    .....
    http://laddoospeaks.blogspot.com/

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  2. भगवती लाल सालवी ko bahut bahut badhi jo unhone ganga mayya ka gungan apne shbdo me kiya


    SHEKHAR KUMAWAT

    http://kavyawani.blogspot.com/

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