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राजनारायण बोहरे की ;कहानी - डूबते जलयान

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on बुधवार, मार्च 17, 2010 | बुधवार, मार्च 17, 2010

चूल्हे में लगी लकडी बहुत धुॅधुआ रही थी । सिलेण्डर कोने में लुडका पडा था शहर में गैस की किल्लत होने से हमेशा पन्द्रह दिन में नम्बर आता है . इसीलिए परेशानी है । तब तक मिट्टी के चूल्हे और लकर्डी कण्डा से जूझती रहेगी वह । धुऑ असह्य हो उठा तो उसने अधकटी सब्जी की थाली हाथ में ली और किचन से बाहर चली आई । नौ बजने को हैं. साढ़े नौ पर रश्मि कॉलेज जाऐगी । उसे नाश्ता तैयार चाहिए । चूल्हा जले तो वह जल्दी से पोहा तैयार करे ।
खुल्ल खुल्ल खुल्ल ॐ

बाहर के कमरे से फिर खॉसने की आवाज आई । आज खॉसी बाबूजी को ज्यादा ही परेशान कर रही है । कल मना किया था कि फ्रिज का पानी मत पियो. लेकिन मानते कब हैं किसी की ॐ अब्बल दर्जे के जिद्दी हैं शुरु से । बीडी पीना भी नहीं छोडेगें . और जब तकलीफ भोगेंगे . तो खुद के अलावा दुसरों को भी कष्ट पहुॅचाएॅगे । अब भला कौन परमहसं बना रह सकता है एसी त्रासद स्थिति में . जब पैसठ साला घर का बुजुर्ग खॉसी के मारे . बेहाल कमजोर शरीर . अशक्त खटिया पर लेटा हुआ पीडा झेल रहा हो । बाबूजी लकवे के शिकार हैं .इसलिए अपर्ने भर तो उठकर बैठ भी नहीं सकते । जब खॉसी चलती है तो दिवा को ही सभॉलना पडता हैैैैैैैैैैेै । वह कन्धों से पकडकर उठाती है ओैर सीने को सहलाती है तभी थोडी राहत मिलती है । 


बाबूजी के अलावा दिवा को बाजार का काम भी देखना होता हैैे उसकी ननद रश्मि तो दिन रात अपनी एम ़ए ़मनोविज्ञान की किताबों में खोई रहती है । घर की हर छोटी बडी चीज के लिए उसे ही खटना पडता हैे सास आज जिन्दा होती तो कुछ हाथ बॅटाती लेकिन तीन वर्ष पहले वे सुहागिन बनी . सर्जी धजी. मॉग भर सिन्दूर . हाथ भर चूडी और पॉवो में तीन तीन बिछिया पहने स्वर्ग सिधारीं हैं । सो घर में दिवा अकेली है । उसका पति बिपिन छजिाीसगढ में डाक्टर हैं । कभी कभार महीने दो महीने में उसे छुट्टी मिलती है तो आ पाता है । यूॅ विपिन के बडे भाई नवीन यहीं हैैैैैैैैैे इसी शहर में नहर विभाग के दफ्तर में यू़ ़डी ़सी ़ है । अच्छी खासी कमाई है । चाहें तो बाबूजी ओर रश्मि को अपने साथ रख सकते हैं . लेकिन उन्हें तो सगों में सडाँध आती है ।वे इन सबसे नाराज हैं । दूर की रिस्ते की एक बूढी विधवा बुआ को साथ रख छोडा है। रश्मि ने बताया था उसे विपिन अपना कोर्स पूरा कर रहा था उन दिनों और एम ़बी ़बी़ एस ़ के तीसरे वर्ष में था । नवीन की पत्नी रूपा के माध्यम से आया रिस्ता. किसी कारणवश बाबूजी ने नहीं स्वीकारा तो नवीन भाई चिडकर अलग हो गये थे . और लोटकर विपिन ने जरा सी बात की हुई खर्टपट पर अपना सिर पीट लिया था अभी तो उसे दो साल और पढना था । उसके लाख मनाने पर भी नवीन माने कहाँ थे । खेर किसी तरह एम ़बी ़बी ़एस ़करके विपिन ने इंटर्नसिप शुरू की थी और एर्कएक दिन करके समय गुजारा था बाबूजी की पेंसन पर इतना भार डालना उसे मुनासिब नहीं लगता था. लेकिन मजबूरी थी . वह कर भी क्या सकता था । जैसे तैसे करके विपिन ने डिग्री हासिल की फिर उसे घर लोटकर दैनिक चिन्ताओं से उसे र्दोचार होना पडा था ।


शहर के एक प्राइवेट चिकित्सक डॉ ़ शर्मा के यहॉ बडी अनूनर्यविनय करने के बाद वह सहायक बन सका था । फिर वहाँ से उसने कई जगह इन्टरव्यू दिये थे । पूरे तीन वर्ष बीते .पर आशा शेष थी अन्ततः सरकारी नौकरी में चुन लिया गया था वह मेहनत सफल रही उसकी । छजिाीसगढ के धुर जंगली इलाके की पोस्टिंग मिलने पर बाबूजी चिन्तित हुए. मगर दूरगामी परिणाम साचकर नोकरी पर जाना ही श्रेयस्कर समझा था । बीच में एक बार वह नवीन के यहॉ भी गया . और अपनी अनुपस्थिति में घर की फिक्र करने की बात कही . तो नवीन भाई. बाबूजी के प्रति अनार्पशनाप बोलने लगे थे । खिन्न मन से विपिन डयूटी पर चला गया था । एक दिन टेलीग्राम मिलने पर वापस आया . तो पता चला कि बाबूजी पर फालिज गिरा है । बिल्कुल लुंर्ज पुजं होकर बाबूजी खटिया पर लेटे मिले थे । विपिन तो घबरा ही गया था आनर्न फानन में इन्दोर ले जाकर विपिन ने बडे अस्पताल में इलाज आरम्भ किया था । एक महीना बाबूजी वहाँ भरती रहे । इलाज से फर्क पडा । लकवागस्त बायाँ हाथ और पेर सक्र्रिय हुआ । मुँह से अस्फुट से वाक्य निकलने लगे । घर लोटे तो दो महीने तक विपिन ने इन्दोर से दवाऐं लाकर इलाज कराया और जब बाबूजी थोडा चलर्ने फिरने की स्थिति में हुए तो उसने नोकरी की सुध ली थी जबलपुर वाली दीदी व जीजाजी को जल्र्दर्से जल्द विपिन की शादी निपटाने की फिक्र लग गई थी और रिश्ता तय करने उनके ताबडतोड दौरे शुरू हो गए थे । उन दिनों दिवा ने एम ़ए ़फाइनल दर्शनशास्त्र की परीक्षा दी थी .और रिजल्ट का इन्तजार कर रही थी .कि एक दिन विपिन और उसके दीर्दी जीजाजीे उसे देखने अचानक आ पहँचे । दिवा का मन उन दिनों विकट अन्तर्द्वन्द में फसा था. इसलिए उसे सब अचानक र्सा लगा था । दिवा तब शरीर और मन के तर्र्क युद्व के बीच निरुपार्य सी बैठी थी ।

बिपिन ने उसे एक नजर देखा और तुरन्त ही पसन्द कर लिया । वह थी भी एसी ही । भला कोन न मर मिटता उसके सोन्दर्य पर ॐ डैडी और मम्मी को विपिन अच्छा लगा था । कुछ देर विपिन की घरेर्लू आिर्थक प्रष्ठभूमि पर उन दोनों के बीच विचार विमर्श हुआ. और अन्ततः डेडी ने रिश्ता स्वीकार होने की घोषणा कर दी थी । दिवा का मौन उसकी सहमति मान ली गई थी ।

कितनी दफा याद आया है दिवा को अपना वह अन्तर्द्वन्द्व और मन की अबूझ गलियों का मकडजाल भी कितना चकित करता रहा है उसे । स्म्रति की जिस गली से होकर विपिन से उसकी शादी की बात याद आती है. उसके ही पास की गली में बैठा कोई और जैसे उस अन्तर्द्वन्द्व को कौंच कौंच कर जगाता है । उसी ने तो पैदा किया र्था वह द्वन्द्व. वह भ्रम . वह अस्थिरता औा नैरास्य ॐ विपिन और उसके जीजाजी शादी की तारीख तय करके ही लोटे थे । रस्म के मुताबिक दिवा को बिपिन की दीदी ने साडी ब्लाउज के साथ सोने की एक चेन और मिठाई भेंट की थी । तब मम्मी ने दीदी के पैैैेर छुआए थे उससे । वह यन्त्रवत सब कुछ करती रही थी शादी में जब लोग इकट्ठे हुए । खानदान के सभी लोग आये. पर नवीन नहीं आया । विपिन ने बताया था कि वह खुद उन सब को लेने गया था. मगर रुपा भाभी के मर्मभेदी व्यगं वाणों से आहत होकर अन्ततः निराश ही लोटा । अपनी बीमारी के कारण बाबूजी तो नहीं जा पाये र्थे जबलपूर वाले जीजाजी ने ही पिता की सारी रस्में पूरी की थी दिवा ने अभी तक पिता का लाड देखा था और देखी थी अपने मन के महत्वाकांक्षी परिन्दे की असीम उडान । यूनिवर्सिटी की क्रिकेट टीम में वह विकेट कीपर के रूप में शामिल रहती थी और इसी कारण उसने प्रदेश ही नहीं देश के कई शहर अपनी टीम के साथ घूम लिए थे कॉलेज की क्रीम थी वह । शहर की सर्वाधिक मॉड लडकियॉ उसे कम्पनी देने के लिए तत्पर रहा करतीं । इसीलिए अपने आप पर बडा नाज था उसे । ससुराल पहुँच कर वह एकाएक घबरा ही गई .क्यों कि हर स्तर पर असमानता दिखी. उसके और विपिन के घर में रहर्न सहन से लेकर मकान तक और खार्न पान से लेकर संस्कारों तक । एक देहाती घर था वह । लगता था जैसे आसमान की उँचाइयों से पकडकर किसी धवल हसिंनी को गन्दे नाले में पटक दिया हो । अपने डैडी के नौकर्र चाकरों से भरे घर में उसे कभी एक गिलास पानी भी अपने हाथ से नहीं पीना पडा था । जबकि यहॉ हर काम उसे खुद करना था. अपना भी और परिजनों का भी । अपनी नियत पर तडप उठी थीं वह और पहली रात देर तक रोती रही थी । बाद में जितने दिन रही . अन्यमनस्क ही बनी रही । शादी के चोथे दिन ही रसोई की राह दिखा दी गई जहॉ प्रविष्ट होते समय वह अपनी मम्मी की बेहताशा याद करती रही थी .जिन्होंने स्त्रिीयोचित दूरगामी द्रष्टि से दिवा को कच्र्चापक्का खाना बनाना सिखा ही दिया था ।वह किसी तरह रसोईघर के मोर्चे पर भी अपरास्त हो. भिड ही गई थी चूल्हे चक्की से . और विस्म्रत कर दिया था उसने सब को । अर्थात अपनी डिग्री. सक्रिय छात्र जीवन और लोर्कव्यवहार का प्रच्छन्न अनुभव. अपने परिजन . मित्र तथा और भी बहुत कुछ ।  


लेकिन इन तमाम बातों के बावजूर्द हल्का सा सन्तोष था . कि विपिन का स्वभाव बहुत शानदार था । एकदम उदार और अबोध बच्र्चेसा नजर आता विपिन जब उसके पास होता तो वह आश्वस्त हो उसकी गोद में सिर रखकर गहरी नींद में खो जाती थी । उसे वे क्षण अब भी याद हैं . जब झिझकते हुए बिपिन ने पहली बार उसके अर्गंप्रत्यगं छुए थे मानव शरीर के रार्ईरजिाी से परिचित होने के बाबजूद कितनी अनजान और निर्दोष हरकतें करता र्था उस रात वह खुद संकोच में थी । उन रातों में उनकी आधी अधूरी बातें होती । क्योंकि बगल के कमरे में मोजूद अन्य लोगों द्वारा सुन लेने का भय उन्हें न सोने देता था. न जगन घर लोटकर वह अपने पूरे प्रयास के बाद भी चुप नहीं रह पाई थी । तडपकर उसने मम्मी से पूछा था क्यों नरक मे झोंक दिया उसे ? जो स्टेण्डर्ड बिपिन के घर का है. ऐसा रहर्न सहन तो इस घर के नोकरों तक का नहीे है । मम्मी विचलित हो उठीं थीं और डैडी भी भी उसके असंन्तोष से शान्त न रह सके थे ।  


कितने बूद्धिमान थे डैडी ।एक दिन अकेले में उसे अपने पास बैठाकर धीर्रेधीरे सब कुछ पूछते रहे थे और वह भी नन्र्ही बच्ची बन गई थी । लाड में ठिनकते हुए . ससुराल के हर आदमी के बारे में . हर घटना के बारे में डैडी को बताती चली गई थी । डैडी आहिस्ता से बोले र्थे ”देखो बेटा. यह सब तो हमको पहले सोच लेना था ॐ घर कोन देखता है आजकल ? लडका सब देखते हैं । तुम्हीं बताओ. हमने बिपिन के रुप में लडका तो तुम्हारे लायक सही ढूँढा है न और फिर रही बात घर की . तो तुमको कितना रहना है उस घर में ? ज्यादा से ज्यादा एक बार और जाओगी वहॉ . इसके बाद तो नोकरी पर रहना ही है तुम्हें । वहॉ बना लेना अपना स्टेण्डर्ड “ एक पल चुप रह गये डैडी .तो उसकी प्रश्नाकुल निगाहें उनके चेहरे पर जम गईं थीं ।धीर्रे धीरे बोले र्थे ”और बेटा जो होना था .वह तो हो लिया । पूराना भूल जाअ‍ो सब ॐ अब उस घर की लाज . इज्जत मर्यादा सब तुम्हारी । हम तो पराये हो गये तुम्हारे लिए ।“ संजीदा हो गये पिता की गोद में सिर छिपा लिया था दिवा ने । अगली दफा ससुराल पहॅुची . तो बाबूजी का आग्रह मानकर बिपिन असे छजिाीसगढ ले गया था प्रक्रति प्रेमी दिवा को बडी सुखद अनुभूति हुई थी वहॉ । प्रक्रति के उन्मुक्त स्वरूप और गगन के प्रच्छन्न बितार्न तले फैली हरीतिमा ने उसका मन मोह लिया था ।बस अखरी थी तो एक बात । बोलर्ने बतियान के लिए अच्छी कम्पनी नहीं मिल सकी उसे । गिर्नेचुने मैदानी परिवार थे उस गॉव में बिल्कुल प्रथक परिवेश में पोषित थे वे सब ।



उस दफा जल्दी लोट आई थी दिवा ।बिपिन फिर डियूटी पर चला गया था । यहॉ सब कुछ ठीर्कठीक चलने लगा था. कर्भीकभार मन में आ जाने वाली ऊब और अकुलाहट के अलावा। सामान्यतः दिवा अपने आप को आपको माहोल में खपाने लगी थी कि एक दिन अचानक अम्माजी की तबियत बिगड गई ओैर उन्हें अस्पताल ले जाना पडा था सीने में दर्द की सिकायत उन्हें वर्षों से थी . मगर वह दर्द इस बार ऐसा था कि जान लेबा हो गया था । अस्पताल में ही उसका शरीर छूट गया । तार पाकर तीसरे दिन बिपिन आ पाया था . तो यह जानकर कितना दुख हुआ था उसे कि नवीन भैया ने बडी मार्नमनोबल के बाद अन्तिम क्रिया सम्पन्न की थी .और तुरन्त लोट गये थे । रूपा भाभी तो एसे गमगीन माहोल में झाकने तक न आई थीं इस घर में । शोक और सन्नाटे में डूबे घर में रश्मि और दिवा. अपगं बाबूजी के सहारे उसके इन्तजार की एर्कएक सैकण्ड और मिनट गिन रहीं थीं । माताजी की तेरही के बाद जिस दिन विपिन अपनी डियूटी पर लोटने की तैयारी कर रहा था उस दिन बाबूजी को सुबह से कुछ घबराहट होने लगी ।सीने में दर्द और बेइंतहा गर्मी का अनुभव करते बाबूजी का चैर्कअप जब खुद बिपिन ने किया तो पाया कि उन्हें हार्र्टअटेक हुआ है ।स्थानीय अस्पताल में भर्ती करर्तेर्न करते बाबूजी पर लकवे का दूसरा हमला हुआ । फिर तो विपिन प्राणपण से उनकी खिदमत में जुट पडा था टैक्सी करके वह फिर इन्दौर भागा था और बाबू जी को भर्ती करा दिया था । 



इस बार सीबियर अटेक था .इस वजह से डाक्टरों को भी ज्यादा उम्मीद न थी । पन्द्रह दिन बाद चिकित्सकों ने निराश मन से उसे घर लोटा दिया था । बाबूजी के हार्थपॉव हिलाने के लिए कुछ एक्सर्रसाइज भर उन्होंने बताई थीं । किकंर्तव्यविमूढ बिपिन .दिर्नरात बाबूजी की परिचर्या में व्यस्त रहने लगा था । तभी शहर में एक प्राकृतिक चिकित्सक का सात दिन का शिविर लगा था. ह्य मरता क्या न करता की तरह हृबिपिन वहाँ जा पहँुचा था । उनके परामर्श से बाबूजी की प्राकृतिक चिकित्सा प्रारम्भ हुई थी । चुम्बक के पानी की मालिश होती . वही पानी उन्हें पिलाया जाता ।
चमत्कार सा हुआ । बाबूजी अच्छे होने लगे । उनके हार्थ पॉव में हरकत शुरु हुई और मुँह से टूर्टेफूटे स्वर निकलने लगे । अब जाकर सबने राहत की साँस ली थी । धीर्रे धीरे अपनी पुरानी हालत में लौटने लगे थे ।
सो दिवा के जुम्मे सब कुछ छोडकर वह अपनी नोकरी पर भाग गया ।
अचानक एक दिन अपने विभाग से विपिन को तार मिला । उसे तत्काल ज्वाइन करने का आदेश दिया गया था । वह भी जानता ही था कि नई नोकरी में इतनी छुट्टियॉ भला वहॉ मिलेंगी ?
 


जब भी बिपिन आता वे दोनों अकेले में मिलने को तरस जाते । यर्दाकदा ऐसा अवसर आता भी तो चिन्तित और व्यग्र बिपिन उससे उतावली में मिलता और उसी उतावली में पार हो जाता । वह क्षुव्ध हो उठती । हर बार की अतृप्ति अनबुझी प्यास. उसके मन में कुण्ठा बढा जाती । दिवा की कितनी इच्छा होती थी कि वे लोग दुनियॉ जहान की बातें करें । साथ जाकर थियेटर में जाकर फिल्म देखें बाजार घूमें । क्रिकेट मेच की बात करें । नए फैशन के कपडों पर बहर्स मुबाहिसा करें । बाजार में नई छपकर आई किताबों और पत्रिकाऔं पर चर्चा करें । लेकिन बिपिन को इन सब फालतू बातों के लिए शुरू से ही कहॉ समय रहा हैॐ पढने लिखने के नाम पर वह सच्चे किस्से और अपरार्धकथाऔं तक सीमित था । शायर इसी का असर रश्मि पर रहा है । वह भी इसी टाइप का साहित्य पढती रही है और ज्यार्दार्सेज्यादा हुआ तो महिलाओं के लिए छपने वाली कोई ह्यबुनाई विशेषांक या व्यजंन विशेषांक वाली हृपत्रिकाएँ पढती रही है । रश्मि की नजर में सारे खेल मर्दों तक सीमित हैं और सारे फेसन ह्यअनाप शनाप कमाने वाले हृ लखपतियों के बच्चों के लिये सुरक्षित हैं । कितनी ऊब और अकुलाहट महसूस करती रही थी दिवा उन दिनों ।


”आज नाश्ता नहीं बनाना क्या भाभी ऋ“रश्मि अपने तीखे प्रश्न के साथ उसके सिर पर मौजूद थी । वह झल्ल उठी । मजाल क्या. रश्मि ने आज तक कभी र्दो एक दिन को जरुरत के दिनों में भी किचिन का मुॅह देखा हो। आदेश ऐसे देती है जैसे दिवा जर्रखरीद गुलाम हो उसकी ।
दिवा चुपचाप उठी और किचन में घुस गई । लकडी धुधुआकर जलने लगी थी चूल्हे पर कडाही रख दिवा ने गीले रखे पोहे बनाने की तैयारी शुरू कर दी ।
कि आज गुरूवार का ब्रत हे उसका । गुरूवार की याद आते ही उसकी स्मृति का दूसरा धडाक से खुल गया ।अरे बाप रे ॐआज तो दीपू आयेगा । उसे झटपट तैयार हो जाना चाहिए । नहीं तो उस
नाश्ता करके रश्मि कॉलेज चली गई तो उसने खना बनाया और बाबूजी को खिलाया . फिर छोटे मोटे कामों में उलझ गई। उसे अभी खाना नहीे खाना .
क्यों बागड बिल्लो बनी देख. जाने क्र्याक्या सुनाने लग जाएगा । जहॉ का काम तहॉ छोडकर उसने बाल खोले और कघंी फेरने लगी ।

दीपूॐ दीपूॐ दीपूॐ 



वह नाम उसके दिर्लदिमाग में ताजगी भर देता है. पिछले कई वर्षौं से क्षर्णक्षण । याद है उसे . दीपू से हुई मुलाकात । शादी के पहले की बात थी वह । दिवा को टायफाइड निकला था हाल ही एम ए की परीक्षा से निपटी थी । वह उन दिनों अपने कमरे में एकाकी लेटी घडी की चाल को कोसा करती थी । बढर्ते घटते बुखार में भयानक नैराश्य और अवसाद की मानसिकता में डूबी. उन दिनों वह . छत की फर्सियों को गिनती . ऊ्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्रँर्ची नीची सतहें नापती .दीवारों के पलंस्तर के बीच बने छोर्टेछोटे सूराखों को गिनती और पुताई की पर्तों में से उभरते अक्शों के बीच कोई आकृति तलाशर्तेतलाशते जब बोर हो जाती तो बाहर निकलने को बहुत मन करता था लेकिन डाक्टर की सख्त हिदायत और डैडी का कठोर अनुशासन उसे कमरे में कैद किए रहता था। एसे में वह मर्न र्ही मन कष्ट और पीडा में तिर्लतिल घुलते हुए बडा एकाकी और उपेक्षित महशूस करने लगी थी खुद को । शुर्रूशुरू में सब उसके पास बने रहते थे मगर लम्बी खिचती बीमारी के कारण धर के सब लोग अपर्नेअपने कामों में व्यस्त रहने लगे थे .हालाँकि सुबर्हशाम तो सब लोग उसके इर्र्दगिर्द इक्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्रट्ठा होते थे. पर पहाड सा दिन प्रायः उसे अकेले ही गुजारना होता । 



दिवा की बडी दीदी श्ल्पिा उन्हीं दिनों मायके आई थीं । शिल्पा के साथ एक अजनबी अल्हर्डसा युवक भी था जो जान पहचान की परवाह किए बगैर हर आदमी से बार्तर्बेबात मजाक और छेडखानी किया करता । पूछने पर पता चला था कि वह था शिल्पा का देवर्र दीपूॐ बाप रेॐ बचपन का वह दुबला पतला और शर्मीला दीपू अठारर्हउन्नीस पार करर्ते करते कैसे खुबसूरत और जिन्दादिल युवक निकल आया था । खुद शिल्पा परेशान रहा करती थी उसकी हरकतों से . लेकिन इसी कारण प्यार भी उसे करती थी । बचपन से शिल्पा के ही ज्यादा निकट रहा था दीपू । दिवा का मन बहल गया । घन्टे दो घन्टे में वह समझ गयी . कि दीपू ऊपर से जितना मस्त और लापरवाह है. भीतर से उतना ही भावुक और गम्भीर भी है । कम उम्र म में उसकी दृष्टी इतनी साफ और स्पष्ट थी . कि दिवा जैसी गम्भीर व पढाकू नव युवती उस के सामने नन्हीं बच्ची बनी टुकुर्र टुकुर ताकती रहजाती थी ।
दीपू का अड्डा दिवा के कमरे में जमा । उदास व नीरस कमरा गुलजार हो उठा ।हमेशा दिवा को हँसार्ता गुदगुदाता वह ढेर सारे चुटकुले छितराता रहता र्था कमरे के शुष्क माहौल में । बुखार बढ़ जाने पर दिवा निढाल हो जाती तो वह एका एक विराट गम्भीरता ओढ़ लेता । बीर्च बीच में मौसम्र्मी जूस और दूध पिलाना उसने स्वतः अपनी डियूटी में शामिल कर लिया था ।

दीपू के आने की पहली ही रात दिवा . बुखार में तपते हुए बेहोशी में तड़पती रही और अब सुवह आँख खोली. तो रात भर से जागते लाल आँखें लिये दीपू को अपने सिरहाने बैठे पाया था । उसके मन में अपने से पाँच बरस छोटे दीपू के लिये एक मधुर्र सी भावना जागी और भावुकता के उन छड़ों में उसने दीपू का माथा अपनी हथेलियों में लेकर एक गहरा चुम्बन ले लिया था । 



सन्नाटे में डूबा दीपू देर तक थर थराहट अनुभव करता रहा और ।।।।। दिवा भी कहाँ शांत रह पायी थी कम्बल के भीतर ।
तीन दिन के भीतर उन दोनों में ऐसा लगाव हो गया कि एर्कदूसरे से चुहल किये बिना उनका समय ही न कटता । पहली बार दिवा को अपनी रुचि का कोई मिला था । वर्ल्र्ड कप क्रिकेट से लेकर रणजी ट्रॉफी तक के खिलाड़ी और पॉप जॉर्ज संगीत से लेकर बुन्देलखंण्डी लोर्क संगीत तक नये से लेकर पुराने फैसन तक कोई भी तो एसा पक्ष न था. जिसको वह बारीकी से न जानता हो । अपने को तीस मारखा समझती दिवा एक ही झटके में धरती पर आ गिरी । बातचीत से इस सेतु से वे एर्क दूसरे तक पहुँचने लगे थे । कुछ रोज के बाद जब शिल्पा ससुराल लौटी तो हवा पानी बदलने के लिये दिवा को साथ लेती आयी थी । 



अब दिवा का अड्डा दीपू का कमरा था । वह मात्र सोने के लिये शिल्पा के कमरे में जाती इन कुछ घन्टों को छोड़कर वे दोनों पूरे समय हँर्सीठहाकों में डूबे रहते थे । दापू ने पूरा शहर घुमाया था दिवाको अपने साथ । शाम को उनकी गोष्ठी जमती । बीर्चबीच में शिल्पा भी आजाती उनकी चर्चाओं में शम्मिलित होने । और कभी तो दिवा के जीजाजी प्रकाश भी अपनी बकालत के झंझटों से मुक्त होकर उनकी महफिल में शामिल रहा करते थे । दिवा का बुखार जा चुका था और कमजोरी खत्म हो रही थी । वह बहुत खुश थी वहाँ ।
दीपू से दिवा को नयी दृष्टी मिली थी चीजों को देखने और समझने की । वह दीपू के सानिध्य में इसका और अधिक विकास करने का प्रयास कर रही थी उन दिनों । 



फिर वह शायद अनिवार्य हादसा ही था उस रात. कि तब देर रात दिखाई जाने वाली शुक्रवार की फिल्म दूरदर्शन से प्रसारित हो रही थी ।बाहर मौसम बेहद खराब था । आसमान में गड़गड़ाते जलधर और चमकती बिजली वातावरण को अपनी रुपहली चमकसे एक पल के लिये प्रकाशित कर फिर से अंधेरे में डुवा जाती थी । अपने कमरे में निकट बैठे दीपू और दिवा
टटोलने के लिये हाथ बढ़ाये.तो एर्कदूसरे के अनियन्त्रित उत्तेजित शरीर उनकी जद में थे ।फिर पता नहीं किसने क्र्याक्या किया . वे निकट से निकट तक होते चले गये । जाने कब से घिरते घुमड़ते बादल खूब बरसे उस रात । बाहर भी. भीतर भी । 



शिल्पा की पुकार सुनकर वे चौंके और अस्र्तव्यस्त दिवा ने उठकर कपड़े सँम्भालते
हुए शिल्पा के कमरे की ओर दौड़ लगा दी थी । वह पूरी रात दिवा ने आँखों में काटी थी । फिल्म के उत्तेजक द्रश्यों में डूब बार्रबार पहलू बदल रहे थे । शिल्पा अपने कमरे में थी कि बिजली चले जाने से अचानक गुप्र्पअंधेरा छा गया । भौचक्के से उन दोनों ने आर्सपास कुछ
टटोलने को हाथ बढाए .तो एक दूसरे के अनियन्त्रि उजिोजित शरीर उनकी जद में थे । फिर पता नहीं किसने क्र्याक्या किया. वे निकट से निकट तर होते चले गये । जाने कब से घिरर्ते घुमडते बादल खुब बरसे उस रात । बाहर भी भीतर भी ।

श्ल्पिा की पुकार सुनकर वे चौकें और अस्र्त व्यस्त दिवा ने कपडे सभालते हुए शिल्पा के कमरे की ओर दोड लगा दी थी ।वह पूरी रात दिवा ने आँखों में काटी थी ।


सुबह उठी तो दिवा में संकोच और शर्म में डूबी थी. जब कि दीपू पूर्ववत स्वच्छन्द और

ुखर मुद्रा मौजूद था देर तक दिवा उसके कमरे में आने से कतराती रही. पर जरा सा मौका मिला दीपू को . तो वह खुद दिवा के पास पहँच गया था । दबे स्वरों में दिवा ने रात में सब कुछ गलत हो जाने की बात कही तो वह फट पडा र्था ”कैसी गलतीऋकाहे की गलती ऋआपने समझा है कभी एसी प्यारी गलतियों के बारे में ? जिसे आप गलती कह रहीे हैं. वह

मुी तो इस दुनिया का मूल है सत्य हैॐ“
”पर हमारा समाज और उसके कायदे“
मैडम ऋचलिए. आप की ही भाषा में बात करूँ। आपने तो पुराण साहित्य खूब पढा ह
”किस कायदे की बातें कर रही हैं
कोन देवता ऐसा है जो काम के पाश से बचा रह गया

हैऋइन्द्रॐ ब्रम्हाॐ महेशॐ है कोई उदाहरणऋ“ 



लेकिन कौन मान्यता देगा हमारे तुम्हारे रिश्ते को ऋये प्रतिलोम रिश्तेऋ
”बकवास ॐ।।।।किसकी मान्यता चाहिए तुम्हें ऋ।।।इस समाज की ऋ।।। या इस धर्म की या सस्कृति की ? ध्यान रखो कि अनुलोर्मप्रतिलोम विवाह. और जायर्जनाजायज रिश्तों की बातें नपुंसकों की बकवास है सब“दीपू का स्वर तिक्त हो उठा था और दिवा को चुप रह जाना पडा था । इसके बाद दिवा ने प्रतिरोध नहीं किया था और कई दफा उस अनुभव को जिया था . पूरी प्राणवजिाा और हिस्सेदारी के साथ। दीदी के यहाँ से लोटना बहुत अखरा था उसे लेकिन क्या किया जा सकता था। उम्र में पॉच वर्ष छोटे नाबालिग दीपू के साथ जिन्दगीभर रहने की अनुमति कोन दे सकता था उसे. न घर वाले. न समाज और न कानून । हालाँकि दीदी को जाने कैसे ज्ञात हो गया र्था सारा गोरखधंधा ।
घर लौटकर द्वन्द्व में जीने लगी थी वह कभी दीपू के तर्क उसे सही लगते थे तो कभी बचपन से कोमल मन पर पडे नैतिकता सम्बन्धी सस्ंकार उस पर हावी होने लगते थे। तब अपराध्
र ही बदलगया उसके प्रति। उसे याद है. डैडी ने उसके पूर्व उन तीनों भाई बहनों यानी शिल्पा.दिवा और अंिकचन में कभी भी कोई भेदभाव नहीं रखा था। तीनों को एर्क सी सुविधा स्वतन्त्रता दी गई थी. पढने और विकास करने की। इसीलिए इस उपेक्षा के बाद वह अपनी ही नजरों में खुद को गिरा हुआ महसूस करने लगी । यर्दाकदा टपक बैठने वाला दीपू भी सम्भवतः आने से प्रतिबन्धित कर दिया गया। उसके लिए लडका ढूँढा जाने लगा। बिपिन से रिश्ता हुआ।
बोध से घिर जती थी वह। गनीमत थी कि अभी बात उसी तक थी। लेकिन जल्दी ही शिल्पा दीदी का दौरा अपने मायके का हुआ और उन्होंने ऐसा मन्त्र फूँका कि मम्मी और डैडी का व्यव
हा



उसका विवाह हुआ। वह श्री मती दिवा बनकर इस घर में आ गई थी। अपने आपको नई जिन्दगी के प्रवाह में सम्मिलित करके उसने पिछला सब कुछ भुलाने का प्रयास किया था। बिपिन को तो घर में लगातार आते संकटों के कारण अपनी जिम्मेदारी और बीमार पिता से सरोकार रखने के अलावा इतनी फुरसत नहीं थी कि उससे कोई गहरा मतलब रखता। दिवा ने भी अपने तर्न मन की अतृप्ति कभी बिपिन पर जाहिर न होने दी थी . और ज्र्योंत्यों दिन गुजर रहे थे। लेकिन कई बातें एसी थीं जिनसे बिपिन के दिल में मोजूद प्यार का बोध उसे हुआ था और मोहित सी हो चली थी वह बिपिन के प्रति। तभी हटात दीपू एक दिन उसकी ससुराल आ धमका था। दोनों मे बहस छिड गई थी पुराने सम्बन्धों को लेकर। दिवा पुरानी गलती न दोहराने की दुहाई दे रही थी. जब कि सूखकर कॉटा हो रही उसकी देह और दिनोंदिन बढते जा रहे चिडचिडेपन को अतृर्ति चिन्ह बताकर दीपू उसे प्रात्साहित करता रहा थार्। वह कहता था न पहले गल्ती थी . और न अब हैै। पर वह न राजी थी । दीपू उसका मुखर प्रतिरोध देखकर वापस लोट गया था. और कई दिनों तक इस उलझन में उलझी रह गई थी कि किसके प्रति वफादार रहे वह. दीपू के या बिपिन के । मौजूद होने पर बिपिन पर भी तरस आता था उसे . क्याकरे बेचारा? न बाप के प्रति लापरवाह हो सकता है न अपनी नौकरी के प्रति । वैसे उसका तो दीवाना है वह जब तक रहेगा ऐसे ताकता रहेगा. जैसे आँखों के रास्ते पी ही जायेगा उसे । घर और पिता से बचा रह गयाा समय वह दिवा को देता था। थके और श्लथ शरीरों को उस थोडे रात का मूल्य ही क्या था। हाँ बिपिन की गैर मौजूदगी में जरूर उसे गुस्सा आता रहता था।
दीपू के लौट जाने के बाद बडी अन्यमनस्क बनी रही थी उस दिन और चाहती रही थी भीतर्रर्ही भीतर कि दीपू फिर लौट आए। लेकिन जिस दिन दीपू आया. खुल कर स्वागत नहीं कर सकी थी उसका किवाड खोलकर देहरी पर ठिठकी रह गई वह ।


कई क्षण बीत गए थे
”अन्दर आने के लिए नहीं कहोगी ऋ“
दिवा ने एक भरपूर नजर से उसे देखा था और मुडकर भीतर चली गई थी। दीपू पीर्छे चल पडा था।
”आओ भी नहीं कहा“
ोते हैं जिनकी प्रतीक्षा भी होती है और वे टल जाँए तो निष्कृति का बोध् भी। शब्दों से स्व
ेकुछ आगमन ऐसे भी
होकृति देने की निर्द्वन्द्वता और साहस नहीं है मुझमें दीपू । चाह तो होती है तुम्हारी .पर जाने कैसे कॉटे बिछे हैं कि दौडकर तुम्हें अपने में समेट लेने की आतुरता ठिठक जाती है । पूछा मत करो तुम ।“
”कैसे हो“
”ऐसे पूछ रही हो. जैसेपिछले जन्म के बाद मिली हो।“
”तुमसे मिलकर हर बार पुनर्जन्म ही तो होता है मेरा।“
”दर असल . ये दिमागी जडता ही तो तुम्हारी कमजोरी है।“

नहीं दीपू. मैं न लकर्डीसी जल पाती हूँ और न आग से अप्रभावित हो रह पाती हूँ। सीलन और ताप के बीच धँुधआते रहना ही शायद मेरी नियति है। तुम समझा करो कुछ।



इससे ज्यादा बात नहीं कर सके थे वे दोनों । रश्मि आ गई थी । फिर वह रात भी बार्तों र्ही बातों में बीत गई थी .बिपिन को भूल कर दीपू में खो गई थी वह । ढेर सी बातें और ढेर से विषय थे उन दिनों के पास. जुबान थकती न मन भरता था। सुबह दीपू लौट गया था।
तब से यही क्रम जारी है। महीना पन्द्रह दिन मे दीपू आता है और कोशिश करता है कि उसकी झिझक टूटे . लेकिन दिवा उवर नहीं पाती है अपने द्वन्द्व से । कई दफा तो लगता है कि दीपू का आना सार्थक हो ही जाएगा. पर बात बस कुछ कदम आगे बढती है और श्लथ होकर गिरी रह जाती है मंजिल के पहले ही
अचानक घंटी बजी तो चिहँक उठी। दरवाजा खोला तो गैस वाला था।”वाह इस बार बडी जल्दी आ गई गैस।“कहते हुए उसने रास्ता दिया और सिलेण्डर बदलवाने लगी।
न्तजार में तत्पर खडा था।
गैस वाले को गिनकर रुपये दे रही थी कि घण्टी फिर बजी। उसने दरवाजे की ओर झाँका तो तबियत प्रसन्न हो उठी । वहाँ मौजूद लकदक दीपू उसकी अनुमति के

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