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दिल

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on गुरुवार, अप्रैल 01, 2010 | गुरुवार, अप्रैल 01, 2010

...... जो धड़कता है, धड़कन की दर जुम्बिश के साथ जिन्दगी के अहसास को बढ़ा देता है जिन्दगी हर आलम में जहाँ महफूज रहती है मोहब्बत, प्यार और जज्बात, खुशी, गम और उनके अहसास जीवन की वीणा का हर तार उस संगीत में रचा बसा है जो हर धड़कन पर अनूठे राग में गाता है मुझमें कुछ है जो मुझे समझता है मैं जाग कर फिर से सो जाता हँू पर वो नहीं सोता वो ना जाने मुझे किस दुनिया में ले जाना चाहता है सरसों के खेत अभी खाली पड़े है पर वो मुझे पीले फूलो से लकदक खेतों की सैर करा कर ले आता है म्या सपना क्या इकीकत समझ में नहीं आता..... बरसों से सूखे उस कुए के करीब कोई नहीं जाता.... वो मुझे उस कुए की मुण्डेर पर ले जाकर बिठा देता है और मैं जैसे जन्मों का प्यासा ............... अपने दोनों हाथों में भरकर पानी पीने लगता हूं पता नहीं ये दिल .... मुझे और कहां-कहां लेकर जायेगा।

दि जिसने सारी कायनात को बनाया, ईंसान को बनाया और दुनिया की खूबसुरती के अहसास को जिन्दा रखने के लिए बहुत ही नज़ाकत से ये दिल बनाया ना जाने क्या करिश्मा था उन हाथों में .............. खुदा जाने ............... ये जिस्म एक वीरान शहर है और ये दिल एक मन्दिर है जिसमें वो रहता है अपनी तमाम खूबियों के साथ जो भी बोलता है वही बोलता है अभी आंखों की जुबां से, कभी धड़कन की जुबां से ................ और मैं उस एक को बहुत प्यार करता हूं जिसमें मुझे अपना खुदा नज़र आता है .............. उसकी सूरत और उसकी निगाहों में क्या असर है ............ दिल ही जाने

घर से बहुत दूर पहाड़ों के पास जाकर उन वृक्षों की छाव में इतना रम जाता हूं झरने सूख चुके है पर हरियाली पता देती है कि यहाँ कभी पानी बहकर निकला था सोचता हूं यहां एक छोटा सा घर हो बगिया हो और मैं उस घर में आकर कुछ पल के लिये भूल जाऊं अपने घर को ...........
उजाले और कभी सर्द अंधेरी रातें ............. दिल कहता है कांटों पर चल ............. और कांटों पर चल कर खुश रहना दिल की फितरत है ............. दिल कहता है फूलों की राह कांटों से होकर गुजरती है। मैं दिल में उस एक आवाज पर दौड़ पड़ता हूं कांटों का दर्द भूलकर उस फूल को सीने से लगा लेता हूं जिसकी मैं शिदत से तमन्ना लेकर बैठा था .............
इस दरिया का उस समन्दर से बहुत गहरा वास्ता है जो कभी इन आखों से बहकर निकलता है ............. ऐसा समन्दर जहां जज्बातों की लहरें है, दुखों का ज्वार है, खुशियों के हिलोरे है और मुहब्बत के पानी में प्यार के बेशुमार मोती है और ये दो पलकें ............... सागर के दो साहिल हैं जहां लहरें आकर टकराती हैं और छलक जाते हैं कभी अनमोल मोती ......... मैं अलबेला माँझी सागर के बीच ढूंढता हूँ मोती ............. किनारों का पता कौन दे? दिल मायूस हो जाता है जब घर की याद आती है खुदा करे .............. कभी तूफान ना आए। दिल की ये बस्ती ............ कभी धूमिल
वो एक कांटा जो पैर में लगा है उसे निकलने में बरसों लग जायेंगे पर ये टीस उस खुशी से बढ़कर नहीं ............. साथियों मन की बातें मन ही जाने और ना जाने कोय मन का सागर कितना गहरा धाह ना पासा कोय आज भी धीम है मन लागो मेरो यार

........ ये भी सच है कि मन ही जानता है आकाश की सीमाएं मन ही जानता है क्षितिज की दूरी श्रेष्ठता क्या है मन ही जाने शबरी के बैर खाकर श्री राम ही बता सकते हैं कि बैर कितने मीठे थे, गरीब सुदामा के चावल का भोग लगा कर श्री कृष्ण ही बता सकते हैं चावलों का स्वाद कैसा था, अपने ज्येष्ठ भ्राता के श्रीराम की चरण पादूकाओं को सिर पर रख कर सैंकड़ों मील पैदल चलने वाले भरत ही जानते है कि पैरों में चुभने वाले काटों की पीड़ा से कहीं अधिक था भाई से मिलने का सुख ........ ये तो सब मन की बातें हैं। मैं कभी घर से निकल कर सुनसान गली के नुक्कड़ पर खड़ा होकर अपने बिछड़े दोस्तों को आवाज देता हूँ ये दुनिया कभी खिलता हुआ चमन लगती है तो कभी वीरान नागफनी का जंगल, एक ऐसा रेतीला जंगल जो मेरे भीतर पसर रहा है कभी पानी की दो गर्म बूं
मन ............. ना जाने कितनी संवेदनाएं ना जाने कितना प्रेम ना जाने कितनी गति ना जाने कितनी विलक्षणता ............. बस वो ही जाने मन को जो अपने मन के अश्व पर सवार हुआ हो ............. ऐसा अश्व जिसके कोई लगाम नहीं होती ....
.दें उस जंगल को फिर हरा कर देती है ना जाने ये किसकी आंख का पानी होगा मेरा मन फिर व्याकुल हो उठता हैं सूखे से पेड़ की डाली पर बैठ जाता है। मन करता है फरिश्ते आसमानों में रहते हैं पर क्यों कोई दिखाई नहीं देता तभी आसमानों से कुछ बूंदें बारिश बनकर गिरती है, मुझे यकीन हो जाता है, कोई है जो आसमानों में रहता है।

. सोचता हूं उस महल में क्यों रहूं जब मन माटी के आंगन में ही खुश रहता है घर की चार दीवारें अब मुझे बहुत ज्यादा ऊँची लगने लगी है.... इतना एकान्त है फिर भी एक संगीत मेरे अन्तर्मन को जगा देता है....... एक अनजानी सी आवाज मुझे साथ लेकर चल पड़ती है आज फिर खुद को उस बगीचे में बैठा हुआ पाता हूं जहां अनगिनत रंग के फूल है हजारों तितलियाँ है। मैं जानता हूँ यहाँ फूल तोड़ना है जमीन से बहुत दूर आसमानों में तारों के बीच घूमना, एकान्त को दूर करने का वो अनुभव है जो सबसे जुदा है........ टूटे हुए तारे को देखकर मैं कभी दुआ के लिए आंखें बंद कर लेता हूं मन स्वीकार कर लेता है निश्चय ही कुछ आशाएं पूरी होगी........ पर उन हताशाओं का क्या जो समन्दर की तरह फैली है किनारे पर बैठने वालों को मो
बिखरी हुई और टूटी हुई बहुत सी चीजें फिर से संवर जाती है जब मन एक विश्वास अपने भीतर संजो लेता है। मैं खुद ना जाने कितनी बार टूटा और हर बार फिर से जुड गया आत्मा की गहराइयों में एक अद्भूद आनन्द का अनुभव करता हूं जब भीतर का सुख बाहर आकर बोलने लगता है वो जो मेरे भीतर था मैं उसे ना जाने कहां कहां ढूंढ रहा था...
.ती नहीं मिलता इस लिये सागर में गोता तो लगाना ही होगा, अमावस की रात में लाखों तारे मिलकर भी कुछ ना कर सकंगे चांद के बिना सूना लगेगा आकाश... मन पूर्णिमा की रात का इन्तजार क्यों करे..... अपनी मुंडेर पर एक दीपक जलाकर उसी में देख लूं आपने चन्द्रमा को.... देखो इस एक दीपक से फिजां कितनी रोशन हो गई।





रचना भगवती लाल सालवी की है
जो फिलहाल अध्यापन के साथ-साथ आकाशवाणी चित्तौडगढ में उद्गोषक हैं.-9460608977


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