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ये शाम सुहानी ....एक संस्मरण

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on गुरुवार, अप्रैल 01, 2010 | गुरुवार, अप्रैल 01, 2010


खूबसुरत ही लगती है गांव में, शहर में या हर कहीं ........... पर अपनी छत पर शाम का वो नजारा मैं नहीं कर सकता जो नजारा पहाड़ों पर खड़े होकर देखने को मिलता है। पहाड़ों के पीछ
शाम हर कहीं
से निहारता शून्य कुछ धुधलाया हुआ सा मटमैला प्रकाश पत्थर कांटे और संकरी वो  पगडांडियां, अटकी हुई एक सौम्यता..... बैर की उन कंटीली झाडियों के बीच एक टीला है कच्चे रास्तों से घिरा

हुवा,वहा से जब  भी गुजरता हूँ उन रास्तों से..... ऐसा लगता है 
इस  पार तो बस्ती है........ उस पार ना जाने क्या हो। लम्बी और अन्त हीन सी इस सड़क से मुझे बुलाती है एक पुरानी सी इमारत जो लगती है जैसे कोई पहाड़न खडी है अकेले में....... अल मस्त मैं
पुकारती है।

रास्तों से गुजरते हुए दिल को लुभा जाती है प्रकृति की वो खूबसुरतियां नटखट और शोख कुछ अदाएं उन दरख्तों में भी है जिन्हें मैं तलाश करता हूं कहीं और... सड़क से सरपट गुजर जाते उन वाहनों से ना जाने कितनी आँखें अपनी रफ्तार में खोकर नहीं छू पाती उस सुन्दरता को....... पर मुझे पहली बार ही हैरत मे डाल दिया था उस मञ्जर ने।

 अनजाने से रास्ते  से जुड़ा एक कच्चा रास्ता.... कुछ कदमों की वो दूरियां और फिर कुछ कच्चे कुछ पक्के घरों की आबादी......... खेतों की सौंधी महक वाला वो गांव.... ढ़ाढ़ण...... जहां ठण्डी हवाओं का हरदम रहता है बसेरा..... कभी उलझी लट वाली वो लडकी और बकरियों के झुण्ड के बीच नंगे पांव पथरीले रास्तों पर चलने में अभ्यस्त कोई लड़का..... लुभाती हुई बहुत सी तस्वीरें.... सामने वो टीला है जहां खड़ी है ”दरबार की ओदी“ और आज में हम राह बन गया उनका मेरी तरह उनके लिये भी खास है वो नजारा...... बातों बातों में अल्हड़ अदाओं वाली उस पहाडन चम्पा का जिक्र करना वो नहीं भूलते...

जी हाँ, आज प्रकाश खत्री हैं मेरे साथ..... ढ़ाढ़ण गांव की वो पाठशाला.... अपनी परछाइयों को आज शहर की सड़कों पर छोड़ कर हम खड़े है यहां मैं तो खो ही गया शाम के माहौल में...... ना जाने वो कब मेरे हम खयाल हो गये....... सचमुच खुदाई बोलती है उस आवाज में वो आवाज आज मेरे साथ है वो बोले देखो चम्पा बुलाती है तुम्हे....... कांटों भरी डगर है, संकरा रास्ता हैं पर ना जाने वो कब मेरे हम खयाल हो गये.........
हरियाली का वो सपना पोष के इस महीने में फीका है सूनी सी इस पहाड़ी पर....1 जहाँ दूर तक काँटों का बसैरा है कदमों तले बिछे है पत्थर और हर कदम पर बचना है उन काँटों से जो बोलती हुई खामोशी के हम झोली है गुलाब और गेंदा तो बागियाओं की अमानत है पर कछ फूल तो यहाँ भी है बेनाम... तन्हा और खामोश।

 रास्तों ने लिखी है बरसातों की दास्तां.......... थोड़ा ही सही पानी बरसा तो है अनजाने ही सही ये नजारे..... नजरों पर इनका तिलिस्म खूब छाया है उन्होंने कहा देखो कितनी शान्ति है यहाँ...... भीड़ में रहने वाला आदमी कितना अकेला है आज पता चला अभी पहँुचना है उस पहाड़ी पर जहाँ शाम ना जाने कितने रंग भर कर बैठी होगी अपने दामन में ढाढ़ण की उस ओदी से हमारी निगाहें नहीं हटती........ यही है वो अलबेली चम्पा जो ना जाने कबसे यहाँ खड़ी है अकेली इसी ने पुकारा था हमें और आज देखो ये परदेसी खड़े हैं उन रास्तों पर जहाँ से वो बेहद करीब है मन करता है बिखरी हुई कविताओं को समेटकर भर लूं अपने दामन में........ रूके हुए इस वक्त को सलाम।
मन कहता है इन घरों के बीच एक छोटा सा घर अपना भी हो बहुत तमन्ना है मिट्टी के तवे पर सिकी सौंधी रोटी की............... उनका हम कदम बन कर खुशी के इन पलों को आज दिल से महसूस कर रहा हूँ...........जी हाँ छोटे से इस सफर में मुझे मिला प्रकाश जी का साथ .................................. कुछ मायूसी शाम के अन्धेरे में है और कुछ मेरे दिल में, सड़क पर पहुँच कर मैने मुड़कर देखा, प्रकाश जी बोले चम्पा ................ देखो एक मुसाफिर आज फिर तुम पर फिदा हो गया .............................. सुहानी शाम की परछाईयाँ सो गई मैने कहा- अलविदा चम्पा। एकान्त की रोशनी में कभी दिन के उजालों की चकाचैंध तो कभी घोर अंधेरी रातो में रोशनी के कतरों को समेटने की चाहत..... बोलती हुई बस्तियां, चिल्लाती हुई भीड़, शोर करता हुआ सारा शहर और सबसे बढ़कर भीतर का कोलाहल रात का दूसरा पहर बन्द दरवाजों में दम घुटता है दुनिया इतनी छोटी भी तो नही घर की छत से ये श
पहाड़ के टीले की ऊँचाई से उस ओर दिखाई देता है हरियाली का मखमली कालीन.... कुछ अधूरे से खेत, दूर तक पसरी हुई खामोशी में छिटपुट आ जाते है, कुछ परिन्दे, नजर भर कर देख लूं अब उस ओर जहाँ गाँव की बस्ती और सड़कों की हलचल नजर आती है। डूबता सूरज हस ओदी से ज्यादा मोहक लगेगा खुद से किया वादा आज पूरा किया..... वीरान सी इमारत की सीढ़ीयां....... थोड़ा सा डर लेकिन एक दूजे का साथ काम कर गया तिमंजिला इस इमारत की छत पर पहुँचकर कुदरत का नजारा करने की हमारी चाहत पुरी हुई एक मुद्वत से इतनी सुन्दर जगह नही देखी भटकता हुआ सूरज फिर धरती के आगोश में समाने को है रोशनी सिमटने वाली है पर मैं उस फिजा में सूखे हुए खेतों की बेबसी देख रहा हूँ पीले पड़ते पत्तों वाले कुछ नीम के पेड़ और फागुन का इन्तजार करता पलाश कुछ कहते हुए सरसों के खेत, आपस में बतियाती गेहूँ की बालियां (सामने वाली पहाड़ी के पीछे केलझर महादेव का वो मन्दिर) और इन सबसे जुदा ये चम्पारानी। आज की शाम कं शुमार हो गई बहुत सी यादें और ढ़ल गई शाम अब लौटना होगा प
रहर अजनबी नही लगता यहां कोई अपना हो ना हो शहर तो अपना है और कुछ नही तो बिखरी हुई रोशनियों के कतरों को तो समेट ही सकता हूँ इन आंखो में और फिर एकान्त तो मेरा अपना हे ही....... इन बन्द कमरों में शहर की भीड़ सो रही है यहां मै तन्हा ही सही ................ पर कितना सुकून हे इन लम्हों में.......... चमकते हुए बेशुमार मोतियों वाली आसमान की चादर को ओढ़कर सोई हुई रात .......... सोई हुई इस रात को कौन जगाए ............... मैं दिन के उजाले आंखो मे चुभते है इसलिये इस खामोशी का मै इन्तजार करता हूँ रात के आगोश में बढ़ी हुई ठिठुरन के कारण सहमकर अपने घरोंदो में दुबके हुए पंछियों की फड़फडाहट मुझे बताती है कि हे कोई और जा सोया नही है,


खुले आसमान के नीचे रात गुजारने वाला कोई अपने फटे हुए कम्बल में दुबककर अपनी ही सांसो के साथ गिन रहा होगा गुजरते हुए हर पल को सर्दियो की लम्बी रातों में अपनी छत पर वो चांद भी अकेला है मेरी तरह........... मै रात से बाते कर रहा हूँ और वो मेरे एकान्त की रोशनी से भर रहा है। कल्पनाओं की तस्वीरें, सपनों का उड़न खटोला शून्य को निहारती दो आंखों में विचारों का ताना बाना जिन्दगी की उघेड़धुन में खो जाता है एकान्त को जीने का सुख ............. कोई सोकर भी नही सोता और कोई जागता हुआ भी सोया रहता है कोई हे जिसे शिद्धत से इन्तजार है सहर होने का........................ उन आंखो को यकीन है हर रात के बाद रोशनी आती है बेहिसाब..........................................

अलसाई हुई सुबह ने, उकताई हुई शाम ने बोझिल मन को आज फिर सोच की खाई में धकेल दिया अब अपनी बेबसी की कहानी लिखूं या उस गम की दास्तां बंयां करूं जिसका एक अकेला किरदार मैं ही हूँ। एकान्त की नीरवता मुझे अपने पास बुलाती है पथरीले और कंटीले रास्तों से होकर मैं फिर पहुंच जाता हूँ उस छोटी सी झील के किनारे जहां से पहाड़ों का नजारा बेहद अच्छा लगता है झील का पानी कभी इन किनारों को चूमता था अघखिले कमल में फूलों को देखकर मेरा एकान्त फिर भावमय हो गया जब पानी नही बरसता तो किनारे इसी तरह तरसते है।
रास्ते के हर पत्थर को उस नजर से देखा किसी में वो नजर ही नही आया जिसकी चाहत लेकर निकला था दूर वीराने में मंदिर की घण्टी बजने से सैंकडो कबूतर उड़कर आसमान का रूख करने लगे वो जिसे मैं ढूंढ रहा था मन्दिर में अकेला खड़ा था फूल कहां से तोड़ कर लाऊ अपने अंधेरों से खुद लड़ रहा हूं अपने लिए थोडी रोशनी जुटाने आया हूं हो सके तो मेरे दामन में डाल देना रोशनी के चन्द कतरे ................ मै उन टूटी फूटी सड़कों से होता हुआ फिर चला जाऊंगा अपने घर की ओर ............... जहां मैं आज भी अकेला रहता
हूँ



रचना भगवती लाल सालवी की है
जो फिलहाल अध्यापन के साथ-साथ आकाशवाणी चित्तौडगढ में उद्गोषक हैं.-9460608977


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