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साहित्य जगत की एक और अच्छी वेबसाईट

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, अप्रैल 04, 2010 | रविवार, अप्रैल 04, 2010

(मैंने एक दिन यहाँ सफ़र किया ,मुझे बड़ी तसल्ली हुयी.वाकई कुछ वेबसाईट पर जाकर सुकून मिलता है.उन्ही में से एक साईट ये है,सोचा और पाठकों तक हम इसे पहुचाएं,इस लेख को साभार लेते हुए साईट का लिंक भे रहें है.यहाँ जाकर देखेंगे तो आपको बहुत सी काम की जानकारियाँ मिलेगी शुभ  जीवन )

इलाहाबाद । 20वीं सदी के अंतिम वर्षो में बांदा क्षेत्र से स्फुटित होने वाले साहित्यिक शब्द अगले दो वर्षो में देश के हिंदी भाषी प्रदेशों में लोगों को साहित्यिक बोध कराएँगे। केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती समारोह समिति की ओर से प्रख्यात हिंदी कवि केदारनाथ का जन्मशती समारोह 1 अप्रैल 2010-12 तक मनाया जा रहा है। आयोजन की पहली कड़ी में दूरदर्शन पर 'केन और केदारनाथ अग्रवाल' विषयक परिचर्चा प्रसारित होगी।
दिल्ली से संयोजक अशोक त्रिपाठी के अनुसार अगले दो वर्ष में केदारनाथ की मूर्ति की स्थापना, हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में विशेषांक, पत्र, गोष्ठियाँ, सम्मेलन, परिसंवाद, आकाशवाणी पर प्रसारण, उनके लेखों का संकलन के प्रकाशन आदि का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके लिए प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच प्रसार-प्रसार के कार्य में लगा हुआ है।
जन संस्कृति मंच के राज्य अध्यक्ष डा. राजेंद्र कुमार बताते हैं कि 2011 में अज्ञेय, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह और केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशती है। इस ग्लैमर और राजनीति से ओतप्रोत वातारण में हिंदी भाषा के महान कवियों के सम्मान को जीवित रखने के लिए जन्मशती समारोह के आयोजन का निर्णय लिया गया है। इसके लिए देश के मुख्य प्रचार-प्रसार के माध्यमों का सहारा लिया जाएगा। समिति के अध्यक्ष मंडल में डा. नामवर सिंह, डा. विश्वनाथ सिंह, डा. शिवकुमार मिश्र, डा. निर्मला जैन आदि शामिल हैं। वहीं परामर्श मंडल में ममता कालिया, असगर वजाहत, राजेश जोशी, डा. राधेश्याम अग्रवाल आदि भी सहयोग कर रहे हैं।

प्रयाग से था गहरा रिश्ता

'मैंने उसको जब-जब देखा, लोहा देखा, लोहे जैसा तपते देखा, गलते देखा, ढलते देखा, मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा।' एक विरांगना पर लिखी केदारनाथ की यह पंक्तियाँ उनके सहज और सरल व्यक्तित्व का परिचय देती हैं। 1 अप्रैल 1911 को बांदा स्थित कमासिन गाँव में जन्मे केदारनाथ का इलाहाबाद से गहरा रिश्ता था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान ही उन्होंने लिखने की शुरुआत की। उनकी लेखनी में प्रयाग की प्रेरणा का बड़ा योगदान रहा है। प्रयाग के साहित्यिक परिवेश से उनके गहरे रिश्ते का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनकी सभी मुख्य कृतियाँ इलाहाबाद के परिमल प्रकाशन से ही प्रकाशित हुई। प्रकाशक शिवकुमार सहाय उन्हें पितातुल्य मानते थे और 'बाबूजी' कहते थे। लेखक और प्रकाशक में ऐसा गहरा संबंध ज़ल्दी देखने को नहीं मिलता। यही कारण रहा कि केदारनाथ ने दिल्ली के प्रकाशकों का प्रलोभन ठुकरा कर परिमल से ही अपनी कृतियाँ प्रकाशित करवाईं। उनका पहला कविता संग्रह 'फूल नहीं रंग बोलते हैं' परिमल से ही प्रकाशित हुआ था। जब तक शिवकुमार जीवित थे, वह प्रत्येक जयंती को उनके निवास स्थान पर गोष्ठी और सम्मान समारोह का आयोजन करते थे।

केदारनाथ को मिले सम्मान

सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी सम्मान, हिंदी संस्थान पुरस्कार, तुलसी पुरस्कार, मिथिला शरण गुप्त पुरस्कार आदि। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं - युग की गंगा, नींद के बादल, लोक और अलोक, आग का आइना, पंख और पतवार, अपूर्वा, बोले बोल अनमोल, आत्म गंध आदि। उनकी कई कृतियाँ अंग्रेजी, रूसी और जर्मन भाषा में अनुवाद भी हो चुकी हैं। केदार शोध पीठ की ओर हर साल एक साहित्यकार को लेखनी के लिए 'केदार सम्मान' से नवाजा जाता है।

चयन:माणिक 
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