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महान साहित्यकार अज्ञेय-अशोक वाजपेयी की नज़र में

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यह हिंदी के महान साहित्यकार अज्ञेय का जन्मशताब्दी वर्ष है। अज्ञेय हमारी उन विराट-विलक्षण प्रतिभाओं में थे, जिन्होंने अपने लेखन व उपस्थिति से साहित्यिक युगांतर किए। उनकी जन्मशती के अवसर पर प्रसिद्ध कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी का यह लेख, ख़ास रसरंग के लिए..

मैं एक/ शिविर का प्रहरी/ भोर जगा/ अपने को मौन नदी के खड़ा किनारे पाता हूं/ मैं/ मौन-मुखर/ सब छंदों में/ उस एक अर्निवच छंदमुक्त को गाता हूं।

मौन, अज्ञेय के प्रिय शब्दों और सुचिंतित अवधारणाओं में से एक था/थी। पर इसे एक तरह का अंतर्विरोध ही मानना चाहिए कि ‘शब्द माना सब व्यर्थ हैं इसीलिए कि शब्दातीत कुछ अर्थ हैं’, कहने वाले ने इतनी विपुल मात्रा में शब्द रचे-लिखे। वह भी साहित्य की लगभग हर विधा में।

उनके जैसा और कोई लेखक हिंदी में नहीं है, जो एक साथ कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, यात्रा-वृत्तांत, डायरी, संपादन और आयोजन में शीर्ष-स्थानीय हो। बीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य की कथा, इन सभी विधाओं में अज्ञेय के श्रेष्ठ अवदान को स्वीकार किए बिना पूरी या प्रामाणिक नहीं हो सकती।

यह अज्ञेय की अद्वितीयता का अदम्य और अकाट्य प्रताप है। अब, जब उनके जन्म को सौंवा वर्ष चल रहा है, तब उनके इस अनन्य स्थान को पहचाना जा रहा है, तो यह विलंबित व्यापक स्वीकृति स्वयं अज्ञेय को प्रीतिकर लगती। इस पहचान के विलंब के कई कारण हैं, जिनमें एक हिंदी के पिछले पचास वर्षो का विचारधारात्मक घटाटोप और आतंक है, जिसने साहित्य को विचार का उपनिवेश बनाने पर इस क़दर संगठित और आक्रामक आग्रह किया कि उसी आधार पर समकालीनता को जांचा-परखा जाने लगा है, भले उसके आतंक का बहुत सारा सर्जनात्मक साहित्य प्रतिरोध करता रहा है।

विपुलता और सक्रियता के कुछ दुष्परिणाम भी होते हैं और उनमें से एक यह है कि श्रेष्ठ लेखक भी कुछ ऐसा लिख जाते हैं, जो कमजोर होता है और जो स्वयं उनकी उत्कृष्टता के पैमानों पर खरा नहीं उतरता। अज्ञेय के साथ भी निश्चय ही ऐसा हुआ और याद आता है कि 1964 में उनके एक कमजोर कविता संग्रह से क्षुब्ध होकर मैंने लिखा था: ‘बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाए?’ उसके थोड़ा पहले अज्ञेय की कविता की अनेक उपलब्धियों का विश्लेषण करते हुए लिखे ‘अकेलेपन का वैभव’ शीर्षक निबंध को लोग लगभग भूल गए हैं, जबकि एक युवा कवि-आलोचक द्वारा एक मूर्धन्य पर किया गया प्रहार अब भी याद किया जाता है।

स्वयं अज्ञेय को यह प्रहार बरसों सालता रहा और उसने लगभग सत्रह बरसों तक मेरे उनसे संबंध ख़राब कर दिए। दुर्भाग्य यह था कि इसी दौरान साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में मेरी सक्रियता सबसे अधिक फैली और अज्ञेय ने मुझसे दूरी बनाए रखी। अपनी मृत्यु के कुछ महीनों पहले वे कुछ पिघले और भारत भवन पहली बार आए।

अब सोचता हूं कि उन्हें लेकर इतने प्रवाद फैलाए गए थे कि उनके रहते उनका सभी प्रहारों को बदनीयत मानना स्वाभाविक ही था। मुझे आज भी अपना वह प्रहार सामयिक और जरूरी लगता है, जितना कि यह स्वीकार भी कि वे उनमें से हैं, जिन्होंने हिंदी में आधुनिकता संभव की और जिनका नायकत्व हिंदी साहित्य का अब एक अनिवार्य आयाम है। वे आधुनिकता के जनक और अभिभावक दोनों थे।

सब बड़े लेखक नायक नहीं होते। यूं तो उनका बड़ा होना, यानी साहित्य में कुछ श्रेष्ठ करना पर्याप्त होता है। लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, जो श्रेष्ठ होने के साथ-साथ दूसरों के लिए राह खोलते हैं। मुक्तिबोध और शमशेर बहादुर सिंह बड़े कवि हैं, पर वे नायक-कवि नहीं कहे जा सकते। अज्ञेय नायक-साहित्यकार हैं। ऐसे लेखकों की संख्या लंबी और बहुत महत्वपूर्ण है, जिन्हें एक तरह से अज्ञेय ने संभव बनाया : धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मनोहर श्याम जोशी, विजय देव नारायण साही, लक्ष्मीकांत वर्मा, नरेश मेहता, रमेश चंद्र शाह, नंद किशोर आचार्य आदि। इनमें से कई अज्ञेय से असहमत और कुछेक उनके विरोधी तक हो गए। लेकिन उनके निर्माण में अज्ञेय ने निर्णायक भूमिका निभाई इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

अज्ञेय का नायकत्व कविता तक सीमित नहीं था। कहानी, उपन्यास और अलोचना में भी उनका नायकत्व उतनी ही सशक्त और निर्णायक भूमिका निभाता देखा जा सकता है। वे नायक-संपादक भी थे : ‘प्रतीक’ जैसी अद्भुत पत्रिका आज तक दूसरी नहीं हुई और न ही ‘दिनमान’ जैसा साप्ताहिक।


हालांकि अज्ञेय को समाज-विरोधी और सामान्य जीवन से कटा हुआ बताकर बार-बार लांछित किया गया। सच तो यह है कि वे हिंदी के उन बिरले लेखकों में से थे, जिन्होंने हिंदी अंचल में इतने सारे छोटे-बड़े लेखकों, अध्यापकों, पत्रकारों, संस्थाओं आदि से संबंध और संवाद स्थापित किए थे। हिंदी में भले शालीनता को आपातत: छद्म मान लिया गया हो, अज्ञेय बेहद शालीन लेखक थे : नफ़ासत पसंद और सब कुछ तरतीब से करने वाले।

इस सबको उनका आभिजात्य मानकर न केवल उनके व्यक्तित्व और ख़ासकर मौन के मनमाने नकारात्मक अर्थ निकाले गए, उनके अपाठ या कुपाठ का लगभग अभियान ही चलाया गया। अज्ञेय अपनी इच्छा से नहीं, दूसरों की दुर्भावना और लांछन से हिंदी के अब तक के सबसे विवादास्पद लेखक हुए। यह भी कहा जा सकता है कि विवाद के क्षेत्र में भी उन्हें हिंदी में शीर्ष स्थानीयता प्राप्त है।

आज यह पहचाना जा सकता है कि उन जैसे बड़े लेखक का बहुत सारा समय, शक्ति और शब्द इन विवादों से निबटने में अपव्यय हुए। अचरज यह है कि उन्होंने धीरज नहीं खोया, लिखने से तौबा नहीं कर ली, लेखक-समाज में सद्भाव बनाए रखने की अपनी कोशिश रोकी नहीं और अपनी स्वार्जित दृष्टि से किनारा नहीं कर लिया।

अपने समय में अज्ञेय हिंदी के सबसे पढ़े-लिखे लेखकों में से थे। उनकी रुचि के भूगोल में साहित्य के अलावा संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व, कलाएं, नृतत्व, विज्ञान, दर्शन आदि सभी आते थे। यह वह समय था, जब हिंदी में बौद्धिक जिज्ञासा और विश्वयारी को जरूरी सर्जनात्मक तैयारी माना जाता था।

पर इधर धीरे-धीरे एक तरह की अपढ़ता को वैधता मिलने लग गई और पढ़े-लिखे लेखक अभिजात और कुलीन कहे जाने लगे हैं। अज्ञेय अत्यंत भाषा-सजग लेखक थे। उनके यहां शिल्पगत लापरवाही बहुत कम, बल्कि नहीं के बराबर है। उनके काव्यशास्त्र में नपा-तुला कहा जाने वाला आग्रह है। इस गुण को अब अवगुण माना जाने लगा है : स्वत:स्फूर्ति के निषेध की तरह।

यह नोट करना दिलचस्प है कि अज्ञेय की आरंभिक छवि परंपरा के मूर्तिभंजक की थी। उनकी आधुनिकता एक तरह से परंपरा के प्रतिपक्ष में खड़ी दिखती थी। बाद में उनमें जैसे आत्म-संघर्ष गहराया और आत्मबोध जागा, परंपरा से एक तरह का सर्जनात्मक संवाद शुरू हुआ।

कथा का उनका भूगोल तो स्पष्ट ही अधिक सामाजिक है और उसमें संबंधों के द्वंद्व, विडंबनाएं और उलझनें सभी समाज के भीतर होते या प्रकट होते हैं। जापान-यात्रा के बाद विशेषत: ‘अरी ओ करुणा प्रभामय’ से उनकी कविता की लौकिकता में विस्तार होता है और वह पारंपरिक दृष्टियों और अभिप्रायों के पुनराविष्कार की ओर बढ़ती है। इस विपुल और परंपरा-समृद्ध लौकिकता का एक वृंदगान है उनकी क्लासिक लंबी कविता ‘असाध्य वीणा’।

अज्ञेय शुरू से ही, चाहे कविता में या कथा में, प्रकृति के सूक्ष्म अवलोकन के लेखक हैं। कालांतर में उनका प्रकृतिबोध गहरी कृतज्ञता और ऋण-स्वीकार की ओर मुड़ता है। यह भी अलक्षित नहीं जाना चाहिए कि अज्ञेय हिंदी के अंतिम कवि हैं, जिन्हें तुलसीदास, सूरदास की यशस्वी परंपरा में हिंदी में संस्कृत कवि कहा जा सकता है। इसका विशद विश्लेषण होना अभी शेष है कि हिंदी में तत्सम का वैभव और तद्भव की छटा जितनी अज्ञेय में है, उतनी उनसे पहले निराला में है, पर बाद के शायद ही किसी और कवि में।

स्वयं की आलोचना के क्षेत्र में कृतिकार-आलोचकों की बृहत्त्रयी बनती है: अज्ञेय, मुक्तिबोध और निर्मल वर्मा। पिछली अर्धसदी की हिंदी आलोचना की परिपक्वता और व्यापकता में, नए सिद्धांतों और विश्लेषण-पद्धतियों के निरूपण में इस त्रयी का अवदान बहुत बड़ा और निर्णायक रहा है।

ऐसे लोग हैं, जिन्हें अज्ञेय की कहानियां पसंद हैं, कविता नहीं। ऐसे भी हैं, जिन्हें अज्ञेय मूलत: कवि लगते हैं। कई उनके उपन्यास ‘शेखर : एक जीवनी’ को क्लासिक मानते हैं, लेकिन कविता में उन्हें बड़ा नहीं समझते। कई उन्हें हिंदी में साहित्य की स्वायत्ततावादी अवधारणा का स्थापित या प्रथम प्रवक्ता मानकर स्वीकार या अस्वीकार करते हैं।
कई उनके तथाकथित आतंक से चिढ़ते हैं, मानो कि वह आतंक स्वयं अज्ञेय ने फैलाया हो। कई उनके मौन को अर्थगर्भ मानते हैं, तो ऐसे भी हैं, जो उसे मुद्राभर मानकर ख़ारिज करते हैं। कई उनकी सामाजिकता देख पाते हैं, तो कई उन्हें व्यक्तित्व की खोज में रमे आत्मरत और आत्मग्रस्त लेखक के रूप में ही देख पाते हैं।
हो सकता है कि इन सभी को अज्ञेय का थोड़ा-थोड़ा सच मिल जाता हो, पर अज्ञेय हिंदी की बड़ी सच्चाई हैं और रहेंगे। वे ऐसी सच्चाई हैं, जिसे समय और उजला और तेजस्वी करता चलता है। यह भी याद करना चाहिए कि अज्ञेय हिंदी के तेजस्वी स्वाभिमान का भी एक नाम है, और रहेगा।
7 मार्च, 1911 को उत्तरप्रदेश के कुशीनगर क़स्बे में पैदा हुए ‘अज्ञेय’ न सिर्फ़ कविता, बल्कि कहानी, उपन्यास आलोचना और पत्रकारिता की आधुनिक परंपरा के नायकों में गिने जाते हैं। नई कविता और आधुनिक हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद के प्रतिपादक ‘अज्ञेय’ प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘प्रतीक’ और ‘दिनमान’ के संपादक रहे। उन्हें साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ, भारतभारती जैसे महत्वपूर्ण पुरस्कारों के साथ अंतरराष्ट्रीय ख्याति का गोल्डन रीथ पुरस्कार भी मिला। 4 अप्रैल, 1987 को 76 साल की उम्र में दिल्ली में उनका देहांत हुआ।


साभार दैनिक भास्कर 
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1 टिप्पणी:

  1. अज्ञेय महान साहित्यकार थे। "शेखर एक जीवनी" "नदी के द्वीप" और "अपने अपने अजनबी" जैसे उपन्यास, रोज़ जैसी ढ़ेरों कहानियाँ और बेहतरीन सैकड़ों कवितायें, जिनमें "साँप तुम मनुष्य तो हुये नहीं" जैसी अदभुत कविता भी शामिल है, और "अरे यायावर रहेगा याद" जैसे यात्रा वृतांत जिनके रचनाकर्म में शामिल हों और जिन्होने सम्पादक के तौर भी अपनी क्ष्रेष्ठता सिद्ध की हो, वे केवल शब्दों के "महान शिल्पी" कहे जा सकते हैं। नमन ऐसे महान लेखक को।
    http://swaarth.wordpress.com/

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