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उपन्यास 'बूढ़ी डायरी'' :सृजन-कथन

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, अप्रैल 30, 2010 | शुक्रवार, अप्रैल 30, 2010



चिर सम्मोहिनी छवि: नर्मदा
नर्मदा के प्रवाह का ग्राम्य अरण्य प्रेम सदा-सदा ही विश्रुत रहा है। लेकिन मैं तो नर्मदा से पहले-पहल अपने छोटे से नगर होशंगाबाद  में ही मिला था। बचपन की न  जाने कितनी स्मृतियां हैं और स्मृतियों का कोष आज भी कुछ न कुछ सहेजता ही रहता है अपने नगर में भी और उन स्थानों पर भी जहां मैं नर्मदा से मिलने गाहे-बगाहे जाता रहता हूं। हाँ ! कुछ यात्राएं ऐसी रहीं हैं जिन्हें मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। ऐसी ही एक यात्रा थी भेड़ाघाट की। कॉलेज  के दिन थे किशोरावस्था बस हाथ छुड़ाने ही वाली थी तब मैंने देखा था-भेड़ाघाट। होशंगाबाद  में तो नर्मदा को मैंने बस बारिश में ही भागते-दौड़ते देखा था वरना तो नर्मदा का राजसी औपचारिकताओं से परिपूर्ण सुकुमार गमन ही मेरे लिए नर्मदा की स्थायी छवि बन चुका था। वैसे नर्मदा होशंगाबाद  में किसी ओडिसी नृत्यांगना की तरह त्रिभंग मुद्रा में नृत्य तो करती है लेकिन यह नृत्य लय का तीव्र स्वरूप धारण करने में सदा ही संकोच करता है। ऐसी सौम्य छवि को मन में रखकर जब भेड़ाघाट देखने पहुंचा  तो आश्चर्य चकित रह गया। नर्मदा का प्रवाह जैसे लय की समस्त मर्यादाएं तोड़कर आगे बढ़ रहा था लेकिन उड़ती हुई बूँदें  ऊपर की ओर भी उठ रहीं थीं। वहीं तो मैंनें देखी थी नर्मदा की धरा-गगन पथ गामिनी चिर-सम्मोहिनी छवि। मुग्ध केवल मैं ही नहीं था बहुत से लोग और थे जो पहली बार वहाँ  आए थे और वे भी तो मुग्ध ही थे जो पहले भी वहाँ आ चुके थे। 
भारतीय जन-मानस वहाँ  भी अपने प्रसिद्ध मुखर स्वरूप में ही उपस्थित था ; लेकिन वे सारी आवाज़ें नर्मदा के प्रवाह-रव में टिक कहाँ पा रहीं थीं ; सब की सब उस आलौकिक ध्वनि में विलीन हो रहीं थीं। मैं देखता रहा ; देखता रहा फिर जब दिन ढलने लगा तो लौट आया। लौटते समय ही मैंने मार्ग में एक पटल देखा जो चैंसठ योगिनी मंदिर के मार्ग का संकेत पटल था। तब बस चैंसठ योगिनी षब्द युग्म मेरे स्मृति-पटल पर अंकित हुआ था और मैंने तय कर लिया था कि एक बार यह मंदिर देखने अवश्य  आऊंगा। बाद में यही भेड़ाघाट ; चैंसठ योगिनी मंदिर और तेवर अर्थात प्राचीन त्रिपुरी मेरे उपन्यास बूढ़ी डायरी के लेखन की प्रेरणा बने।   


          भेड़ाघाट की मेरी दूसरी यात्रा के आरम्भ में पहले तो मैं प्रपात तक ही गया लेकिन कुछ देर रुककर ही मैं चैंसठ योगिनी मंदिर चला गया था। मैं इतिहास का विद्यार्थी नहीं था और ना ही शिल्प-कला की मुझे कोई गहरी समझ ही थी; बस शिल्प  के सौंदर्य के प्रति ना जाने कैसा पूर्व संस्कार जन्य आकर्षण था जो चैंसठ-योगिनियों की प्रतिमाओं के सामने मुझे मुग्ध भाव में छोड़ गया था। मेरे एक मित्र को कुछ प्रतिमाएं वीभत्स भी लगीं थीं लेकिन मैं तो शिल्प  के अद्भुत कौशल  को देखकर आश्चर्य  चकित था। प्रतिमाओं को बनाने वाले शिल्पी  अवश्य ही उच्च कोटि के  शिल्पी रहे होंगे। बाद में मैंने जाना कि यह मंदिर कलचुरि राजवंश  के अंतिम काल में जब बना तब तक तो वह राजवंश  अपनी गौरव-गाथा के लगभग सभी अध्याय लिख चुका था। लेकिन सदियों की राज-पोषित  कला-मर्मज्ञों की परंपरा में पले बढ़े वे अत्यंत दक्ष हस्त रहे होंगे जो महारानी अल्हण देवी की अपने गुरू आचार्य रुद्रराषि के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए पत्थर में प्राण फूंकने  का अद्भुत कौशल  दिखा सके। इसी मंदिर के नीचे सीढ़ियों के पास बैठे हुए कुछ शिल्पियों  से हुई वार्ता मुझे आज भी हंसाती है।मंदिर में घण्टों बिताने के बाद मैं नीचे आया था। इतना जानता था कि प्राचीन काल में शिप्ली दो  वर्गो में बंटे हुए थे - राज- शिल्पी और ग्राम्य-शिल्पी । राजा दोनों को आश्रय देते थे लेकिन राज-शिल्पी   शिल्प  के शास्त्रीय स्वरूप को ध्यान में रखकर कार्य करते थे और ग्राम्य शिल्पी अपनी सहजता के साथ कला को व्यक्त करते थे। जिन शिल्पियों से मैं मिला वे संभवतः ग्राम्य शिल्पियों के वशंज  रहे होंगे। मैंने उनसे पूछा कि अब वो कैसी मूर्तियां बनाते हैं तो उन्होंने बताया कि अब वो केवल दो चीज़ें बनाते हैं- एक तो संगमरमर के छोटे-छोटे टुकड़ों केा जोड़कर भेड़ाघाट का प्रतिरूप और दूसरा दिल के आकार पर आइ लव यू लिखकर उसे एक स्टेंड से जोड़ देते हैं। मैंने पूछा था कि आइ लव यू वाले शो-पीस तो केवल जवान लड़के लड़कियां ही खरीदते होंगे तो उसने तुरंत कहा ‘‘ नहीं साहब! बूढ़े लोग भी खूब खरीदते हैं।’’ साथ ही उसने प्रति प्रश्न  किया था- ‘‘क्यों साहब बूढ़े लोग प्यार नहीं कर सकते क्या?’’ उस भोले-भाले शिल्पी का वह प्रश्न  ही मेरे उपन्यास ‘बूढ़ी डायरी ’ के नामकरण का एक कारण बना।         
चैंसठ योगिनी मंदिर से मैं तेवर गाँव  और वहां स्थित प्राचीन बावड़ी देखने गया था। वैसे तो भेड़ाघाट प्रपात की भीड़ के विपरीत चैंसठ योगिनी मंदिर में अंगुलियों पर गिनने लायक लोगों का होना मुझे आश्चर्य  चकित् कर ही चुका था लेकिन तेवर में तो हमारे अलावा और कोई भी पर्यटक नहीं था। कलचुरि राजवंश  द्वारा बनवायी गयी बावड़ी का सौंदर्य भी कम अनूठा नहीं था। मैं सोचता रहा कि कैसे रहे होंगे हमारे पूर्वज जो हर एक निर्माण में सौंदर्य का ध्यान सदैव ही रखते थे। वर्तमान युग के अधिकांश निर्माण तो सौंदर्य की भारतीय षैली की बहुत अधिक उपेक्षा ही करते हैं। परिणाम स्वरूप हमारे वास्तुविद् चाहे लाख दावे करें लेकिन हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि हम तरक्की तो बहुत कर रहे हैं लेकिन कई क्षेत्रों में हम अपने पूर्वजों से बहुत पीछे हैं। उस बावड़ी के कुछ चित्र लेकर और  गाँव  वालों से बातें करके फिर मैं त्रिपुर सुन्दरी का प्रसिद्ध मंदिर देखने गया था। महाकाली-महासरस्वती- महालक्ष्मी का त्रिपुर-सरूप। अनगढ़ प्रतिमाएं लेकिन मंदिर में चारों ओर बंधे लाल कपड़े में लिपटे हजारों नारियल एक अद्भुत दृश्य  का निर्माण कर रहे थे। जिसकी भी कोई मनोकामना होती है वो लाल कपड़े में लपेटकर मंदिर में कहीं भी एक नारियल बाँध देता है। आज भी कहीं ‘लाल चोला लाल चोला मां का लाल चोला लाल ’ गीत सुनता हूँ  तो सोचता हूँ  

कि हमारी इच्छाएं पूरी करने वाली मां का चोला लाल है शायद इसीलिए श्रद्धालु अपनी इच्छाओं को भी लाल चोला पहनाकर मंदिर में बांधते  हैं। तब उस मंदिर में जहां  तक नज़र जाती;  लाल चोला धारी नारियल अनंत इच्छाओं की अनंत कहानियां सुनाने लगते। बाद में इस दृश्य  को अपने उपन्यास में सम्मिलित तो किया लेकिन आज भी लगता है कि ‘ गिरा अनयन नयन बिनु बानी ’ ही रह गए। तब की वो यात्रा वहीं पूर्ण हुई थी और बाद की यात्राएं भी मेरे उपन्यास को नयी कहानियां देतीं रहीं।               
                           एक बात मुझे अक्सर विचलित करती थी और वो बात थी इतिहास की पुस्तकों में कलचुरि राजवंश का अत्यंत अल्प उल्लेख। मुझे जो भी पुस्तकें मिलीं वो बस मुट्ठी भर ही देती थीं कभी तृप्त नहीं कर पाती थीं। न जाने क्यों हम अपने प्रदेष के अत्यंत गौरवशाली  इतिहास को अब तक ठीक ढंग से दर्ज भी नहीं करवा सके हैं।  नर्मदा का सौंदर्य अनुपमेय है। उस सौंदर्य को निहारने के बाद तृप्ति का एक ऐसा भाव जागता है जो बहुधा हमें दूसरे सौंदर्य से विमुख कर देता है। भेड़ाघाट में भी नर्मदा का सर्व-प्रिय स्वरूप हमें मुग्ध कर देता है लेकिन इसी भेड़ाघाट के आस-पास एक राजवंश की अनेक गौरव गाथाएं कई मंदिरों मूर्तियों और पुरावशेषों  को माध्यम बना कर आज भी बहुत कुछ कहना चाहती हैं। मैने उन्हें सुनने की  कोशिश की और मुझे लगा कि उन गौरव गाथाओं की चिर-साक्षिणी नर्मदा का सौंदर्य गर्व से झूम उठा।            


                  उन बिखरी हुई कहानियों को कुछ पात्रों से जोड़कर एक डायरीनुमा उपन्यास लिखा था जिसे नाम दिया था - बूढ़ी डायरी। मेरे एक मित्र ने आपत्ति प्रकट की थी    ‘‘डायरी तो अंगे्रजी का शब्द  है।’’ तब मैने उनसे कहा था   ‘‘हिन्दी में इसका नाम होगा ‘वृद्धा दैनन्दिनी’ आप कहें तो वही रख दूं ।’’ उन्होंने तुरंत कहा था ‘‘ नहीं-नहीं बूढ़ी डायरी ही ठीक है।’’  भेड़ाघाट और उससे जुड़े क्षेत्र की कहानियों को यथासंभव लिखने के बाद एक ग़ज़ल लिखी थी। आज भी मुझे लगता है कि मुझसे वो ग़ज़ल भेड़ाघाट में बिखरी कहानियों ने ही लिखवायी थी। और आज भी वो कहानियां उन लोगों की प्रतीक्षा कर रहीं हैं जो उन्हें सुन सकें।    उस ग़ज़ल का अंतिम शेर  था -      
फिर कहने को जी करता है बातें वही पुरानी सब      पुस्तक चर्चा 
सुनने वाला कोई नहीं है किस्से तो सब रक्खे र्हैं।         
- अशोक  जमनानी
www.ashoknaamaa.blogspot.com
 
- भोपाल से प्रकाशित  ‘पुरवैया’ में मेरे द्वारा लिखा गया सृजन-कथन
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