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रचनाकार संजीव का सफरनामा

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, अप्रैल 20, 2010 | मंगलवार, अप्रैल 20, 2010


अब तक आठ उपन्यास और लगभग दो सौ कहानियां लिख चुके वरिष्ठ रचनाकार संजीव अभी भी अपने रचनाकर्म में पूरी तन्मयता से जुटे हुए हैं। वे स्वयं को निम्न मध्यवर्गीय परिवेश का लेखक मानते हैं। अथक परिश्रम और गहन शोध के चलते उनकी कहानियां और उपन्यास अलग से पहचाने जा सकते हैं। शारीरिक कष्टों से जूझते और हंस पत्रिका के संपादकीय कार्यो के दबावों के बाद भी उन्होंने हाल में ही अपना नया उपन्यास लिख कर पूरा किया है। पिछले दिनों विभू श्रीवास्तव ने, उनके साहित्यिक मूल्यांकन और उनकी रचना प्रक्रिया से जुडे कुछ सवालों को लेकर उनसे मुलाकात की। यहां प्रस्तुत है, उस बातचीत के प्रमुख अंश-
जिस परिश्रम और शोध के साथ आप लिखते हैं, वह बहुत कम ही रचनाकारों में दिखाई पडता है, तो सबसे पहले यही बताएं कि आप लिखते क्यों हैं और लेखन की ओर रुचि क्यों और कैसे बढी?
लिखना मेरे लिए केवल मनोरंजन का साधन कभी नहीं रहा। लिखना मेरे लिए खुद एक तनाव से गुजरने का कारण बना है और जाने कितनी बार मुझे जाने कितने ब्लैक होल्स में ले जाता रहा है, जहां मृत्यु की यातनाएं और मर्मातक अहसासों को झेलना पडा है लेकिन मनोजगत की अर्गलाएं, स्मृति और कल्पना की आंखमिचौली में भटककर सत्य को टटोल पाना एक दिलचस्प अनुभव भी रहा है।
पहले-पहल कविताएं लिखीं, लेकिन कुछ ही समय बाद लगने लगा कि धर्म, वर्ग, जाति और लिंग पर आधारित जो असमानताएं समाज में व्याप्त हैं, उन्हें व्यक्त करने के लिए कविता का माध्यम अपर्याप्त है। इस तरह मैं पहले निबंध और फिर कहानियों, उपन्यासों की तरफ मुडता चला गया। 1980 के बाद मेरा कविता लिखना लगभग बंद ही हो गया।
कुछ आलोचकों का मानना है कि यथार्थ को अभिव्यक्त करने के प्रयास में आपकी कहानियां तथ्यों और ब्यौरों में उलझ जाती हैं और भावनात्मक स्तर पर कमजोर होने लगती हैं।
सबसे पहली बात तो यह है कि आज के समय में हिंदी साहित्य में समर्थ आलोचक हैं ही नहीं। जो हैं, उनके पास समय ही नहीं है कि वे किसी रचना को धैर्य से पढे और समझें। मैंने जितनी मेहनत और शोध से कहानियां लिखी हैं, शायद ही उस तरह से कोई और लिखता हो। जहां तक संवेदनहीनता या भावनात्मकता का प्रश्न है, तो मैं नहीं समझता कि मेरी कहानियां इस स्तर पर भी उतनी लचर हैं। मैं नहीं जानता कि वे कौन-से आलोचक हैं, जो इस तरह की बात करते हैं।
हिंदी के शीर्षस्थ आलोचक डॉ. नामवर सिंह का ऐसा मानना है, आपकी कहानियों के बारे में..?
नामवर सिंह जी भी कुछ नहीं जानते, क्योंकि वे कहानी के तो वस्तुत: आलोचक हैं ही नहीं। कहानी के लिए वे मानक नहीं हैं। वे कविता के आलोचक हैं, उसी में रहें तो अच्छा है।
लेकिन इसी तरह राजेंद्र यादव जी भी आपको प्रेमचंद की परंपरा का महत्वपूर्ण लेकिन ठंडा लेखक मानते हैं। उनका कहना है कि आपकी कहानियों में भाषा की सहजता, विषय और पात्रों की विविधता तो मौजूद है, लेकिन वे निवैयक्तिक हैं। इस बारे में क्या कहना चाहेंगे?
पहले तो मैं उनके आरोप को खारिज करता हूं कि मेरा लेखन ठंडा है। वह किस प्रकार के लेखन को ठंडा कहते हैं, इसकी व्याख्या भी उन्हें करनी चाहिए। मैं कहानी लिखता हूं और समझता भी हूं। अगर ठंडेपन से उनका आशय सेक्स से है तो मैं उसे दूर से ही प्रणाम करता हूं। सेक्स मनुष्य की नैसर्गिक प्रकृति है, ये ठीक है लेकिन जब तक हमारे सामने उससे जुडी इसकी भयानक समस्याएं और चिंताएं हैं, तब तक वह [सेक्स] प्राथमिक विषय नहीं बन सकती। शोध से कहानियां ठंडी नहीं होती हैं।
मुख्य बात यह है कि आप अपने उपजीव्य यानी, विचार, शोध, कथ्य [कच्चे माल] को कहानी में किस प्रकार ट्रांसफार्म करते हैं। यह निर्भर करता है, आपके कौशल पर। मैं जिस बैकग्राउंड और मूवमेंट से आया हूं, वैसी आग अपने भीतर पालने वाला व्यक्ति ठंडा लेखन कर ही नहीं सकता।
आपका अधिकांश लेखन जातिवाद, सामंतवाद, पूंजीवाद, साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के विरोध में खडा दिखता है। क्या आपको लगता है कि केवल लेखन के जरिए ही आप इतने विस्तृत उद्देश्यों को प्राप्त कर पाएंगे?
मैं मानता हूं कि लेखन अपने आप में एक विचार मात्र है। यह अपने आप में पूर्ण नहीं है, जब तक उसे अनुकूल समाज और वातावरण न मिल जाए। मैं मानता हूं कि लेखन अगर समाज और मनुष्य को बदलने में असमर्थ है, तो वह तब तक व्यर्थ है। साहित्य मेरे लिए साध्य नहीं साधना है। मेरा साध्य यही है कि मनुष्य और मनुष्य के बीच सभी वादों को लेकर जो दूरियां हैं, उन्हें कम करते हुए समाप्त कर देना। इसीलिए मेरा अधिकांश लेखन इन वादों के विरुद्ध खडा दिखाई देता है।
जब शब्द और साहित्य, निरर्थक और अनर्थक होता जा रहा है। ऐसे समय में साहित्य और साहित्यकार की भूमिका क्या होनी चाहिए?
मैं इस प्रश्न पर बहुत सोचता हूं। इसके समाधान के लिए कई स्तरों पर काम जरूरी है। परिवर्तनशील समय के प्रभाव से ही अनेक प्रकार के दबाव हर कहीं व्याप्त हैं। सिर्फ पुस्तक और साहित्य पर केंद्रित न होकर बदलावों के लिए हमें ऑडियो विजुअल मीडिया की तरफ रुख करना पडेगा। इसके साथ ही कला, संगीत, पेंटिंग और दूसरे माध्यमों को भी टटोलना पडेगा। साहित्य और साहित्यकार दोनों को ही अखबार और पत्रिकाओं से ऊपर उठना होगा।
मनुष्य होने का यही तकाजा है, कि हम उस दिशा की ओर मुडें, जो हमें मनुष्य बनाती है। मनुष्य में उदात्तता, साहित्य ही पैदा कर सकता है। साहित्य ही मनुष्य के संवेदी पक्ष को व्यक्त कर सकता है और उसे बेहतर मनुष्य बना सकता है। इसीलिए साहित्य को बचाना जरूरी है। लेकिन यह किस तरह होगा, इस पर गहन चिंतन आवश्यक है।

[अक्षर प्रकाशन, 2/36, अंसारी रोड,नई दिल्ली-110002]
साभार :http://in.jagran.yahoo.com
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