अशोक जमनानी की ग़ज़ल- परिंदों लौट आना - अपनी माटी

नवीनतम रचना

अशोक जमनानी की ग़ज़ल- परिंदों लौट आना

Share
 http://www.njpinelandsanddownjersey.com/open/images/pagemaster/birds_in_nest.jpg
परिंदों शाम को लौट आना घर ज़रा ज़ल्दी
हम दीवारें इस ख़ामोशी से ऊब जातीं हैं

उतने ही दानें चुनो जितनी ज़रूरत है हमें
यहां कितनी चोंचें घोंसलों  में रीती आतीं हैं

जुगनुओं से कह दो ना रात में चमका करें
वो रोशनी महलों की इससे खीज जाती है

उनसे ना मिलना गले जो ख़ंजरों को बेचते
उनकी उंगलियां बेवज़ह भी कसमसातीं हैं

जश्न का माहौल है इस शहर को छोड़ दें
सुना है हर जश्न से हक़ीकत दूर जाती है

                                            -अशोक जमनानी

3 टिप्‍पणियां:

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here