अशोक जमनानी का गीत: ओ पथिक तू चल अकेला - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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अशोक जमनानी का गीत: ओ पथिक तू चल अकेला

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ओ पथिक तू चल अकेला कारवां बन जायेगा
तू समर पर हो समर्पित; तो अमर हो जायेगा


ना आंसुओं का अर्ध्य  हो न पीर की परवाह हो
यश की कोई कामना न पथ में शीतल छांव हो
तू नींव के पत्थर को अपनी आस्था का दान दे
निर्माण का हर कंगूरा तुझसे ही जीवन पायेगा


यह तम नहीं तेरा पता; न तेरा परिचय मौन है
आके तमस को चीर दे वो पहली रश्मि कौन है
अज्ञान की आंधी में भी तू ज्ञान के दीपक जला
जब गहन होगा दहन जग उजियारा हो जायेगा


हर संघर्ष तेरा तू ही; अतुलित बल का स्वामी है
बाधाओं ने ओ साथी आखिर तो हार ही मानी है
तू सत्य ग्रहण कर
साहस को संग ले
कर श्रद्धा अर्पित
विश्वास का रंग ले
देव भूमि भारत पर तेरा जन्म सफल हो जायेगा

5 टिप्‍पणियां:

  1. ओ पथिक तू चल अकेला कारवां बन जायेगा
    तू समर पर हो समर्पित; तो अमर हो जायेगा


    -बहुत उम्दा पंक्तियाँ और गीत!

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