''काव्योत्सव'' में आज रश्मि प्रभा जी - अपनी माटी Apni Maati

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''काव्योत्सव'' में आज रश्मि प्रभा जी

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पुणे
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प्राण-संचार
तुम्हारे चेहरे की धूप
तुम्हारी आँखों की नमी
तुम्हारी पुकार की शीतलता
मुझमें प्राण- संचार करते गए ........
दुःख के घने बादलों का अँधेरा
मूसलाधार बारिश
सारे रंग बदरंग थे !
पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !
लोग राज़ पूछते रहे हरियाली का
विस्मित होते रहे ....
मैं अपने आत्मसुख की कुंजी लिए
तुम्हारे धूप-छाँव में
ज़िन्दगी जीती गई....
कहने को तुम पौधे थे
पर वटवृक्ष की तरह
मुझ पर छाये रहे
मुझमें प्राण-संचार करते गए ...............

13 टिप्‍पणियां:

  1. तुम्हारे धूप-छाँव में
    ज़िन्दगी जीती गई....
    कहने को तुम पौधे थे
    पर वटवृक्ष की तरह
    मुझ पर छाये रहे
    मुझमें प्राण-संचार करते गए ..

    सुन्दर अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  2. तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

    जवाब देंहटाएं
  3. rasim mummy ji
    namaskar
    एहसास की यह अभिव्यक्ति बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं
  4. bahut sundar rachna

    शेखर कुमावत
    http://www.amritwani.com/
    http://kavyawani.blogspot.com/

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  5. पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
    मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
    मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !

    बहुत सुंदर भाव.. प्रेम को कितनी सहजता से किन्तु नए रूप में व्यक्त कर देती हैं आप. काव्योत्सव में आपकी कविता के आने से काव्योत्सव का मान बढ़ गया ..

    जवाब देंहटाएं
  6. तुमने अपनी मुठ्ठी में
    मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
    मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !

    सहज लिखी सुंदर भाव लिए अच्छी रचना है ...

    जवाब देंहटाएं
  7. तुम्हारे धूप-छाँव में
    ज़िन्दगी जीती गई....
    कहने को तुम पौधे थे
    पर वटवृक्ष की तरह
    मुझ पर छाये रहे
    मुझमें प्राण-संचार करते गए
    ati sundar

    जवाब देंहटाएं
  8. वाह्………………बहुत सुन्दरता से भावों को पिरोया है।

    जवाब देंहटाएं
  9. सारे रंग बदरंग थे !
    पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
    मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
    मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !


    ufff!! hriday sparshi.....:)
    ek bahut hi khubsurat kavita...:)

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