''काव्योत्सव'' में आज रश्मि प्रभा जी - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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''काव्योत्सव'' में आज रश्मि प्रभा जी

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पुणे
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प्राण-संचार
तुम्हारे चेहरे की धूप
तुम्हारी आँखों की नमी
तुम्हारी पुकार की शीतलता
मुझमें प्राण- संचार करते गए ........
दुःख के घने बादलों का अँधेरा
मूसलाधार बारिश
सारे रंग बदरंग थे !
पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !
लोग राज़ पूछते रहे हरियाली का
विस्मित होते रहे ....
मैं अपने आत्मसुख की कुंजी लिए
तुम्हारे धूप-छाँव में
ज़िन्दगी जीती गई....
कहने को तुम पौधे थे
पर वटवृक्ष की तरह
मुझ पर छाये रहे
मुझमें प्राण-संचार करते गए ...............

13 टिप्‍पणियां:

  1. तुम्हारे धूप-छाँव में
    ज़िन्दगी जीती गई....
    कहने को तुम पौधे थे
    पर वटवृक्ष की तरह
    मुझ पर छाये रहे
    मुझमें प्राण-संचार करते गए ..

    सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

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  3. rasim mummy ji
    namaskar
    एहसास की यह अभिव्यक्ति बहुत खूब

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  4. bahut sundar rachna

    शेखर कुमावत
    http://www.amritwani.com/
    http://kavyawani.blogspot.com/

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  5. पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
    मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
    मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !

    बहुत सुंदर भाव.. प्रेम को कितनी सहजता से किन्तु नए रूप में व्यक्त कर देती हैं आप. काव्योत्सव में आपकी कविता के आने से काव्योत्सव का मान बढ़ गया ..

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  6. तुमने अपनी मुठ्ठी में
    मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
    मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !

    सहज लिखी सुंदर भाव लिए अच्छी रचना है ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. तुम्हारे धूप-छाँव में
    ज़िन्दगी जीती गई....
    कहने को तुम पौधे थे
    पर वटवृक्ष की तरह
    मुझ पर छाये रहे
    मुझमें प्राण-संचार करते गए
    ati sundar

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह्………………बहुत सुन्दरता से भावों को पिरोया है।

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  9. सारे रंग बदरंग थे !
    पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
    मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
    मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !


    ufff!! hriday sparshi.....:)
    ek bahut hi khubsurat kavita...:)

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