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''काव्योत्सव'' में आज रश्मि प्रभा जी

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on बुधवार, जून 02, 2010 | बुधवार, जून 02, 2010

Share अपनी माटी ब्लॉग और आप सभी की तरफ से सुनहरे भविष्य की कामना के साथ ''काव्योत्सव'' में आज की रचना और  रचनाकार प्रस्तुत हैं.स्वागत करिएगा.आपके अनमोल सुझाव ,विचार भी बताइएगा
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पुणे
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प्राण-संचार
तुम्हारे चेहरे की धूप
तुम्हारी आँखों की नमी
तुम्हारी पुकार की शीतलता
मुझमें प्राण- संचार करते गए ........
दुःख के घने बादलों का अँधेरा
मूसलाधार बारिश
सारे रंग बदरंग थे !
पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !
लोग राज़ पूछते रहे हरियाली का
विस्मित होते रहे ....
मैं अपने आत्मसुख की कुंजी लिए
तुम्हारे धूप-छाँव में
ज़िन्दगी जीती गई....
कहने को तुम पौधे थे
पर वटवृक्ष की तरह
मुझ पर छाये रहे
मुझमें प्राण-संचार करते गए ...............
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13 टिप्‍पणियां:

  1. तुम्हारे धूप-छाँव में
    ज़िन्दगी जीती गई....
    कहने को तुम पौधे थे
    पर वटवृक्ष की तरह
    मुझ पर छाये रहे
    मुझमें प्राण-संचार करते गए ..

    सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  2. तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  3. rasim mummy ji
    namaskar
    एहसास की यह अभिव्यक्ति बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut sundar rachna

    शेखर कुमावत
    http://www.amritwani.com/
    http://kavyawani.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  5. पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
    मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
    मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !

    बहुत सुंदर भाव.. प्रेम को कितनी सहजता से किन्तु नए रूप में व्यक्त कर देती हैं आप. काव्योत्सव में आपकी कविता के आने से काव्योत्सव का मान बढ़ गया ..

    उत्तर देंहटाएं
  6. तुमने अपनी मुठ्ठी में
    मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
    मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !

    सहज लिखी सुंदर भाव लिए अच्छी रचना है ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. तुम्हारे धूप-छाँव में
    ज़िन्दगी जीती गई....
    कहने को तुम पौधे थे
    पर वटवृक्ष की तरह
    मुझ पर छाये रहे
    मुझमें प्राण-संचार करते गए
    ati sundar

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह्………………बहुत सुन्दरता से भावों को पिरोया है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. सारे रंग बदरंग थे !
    पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
    मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
    मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !


    ufff!! hriday sparshi.....:)
    ek bahut hi khubsurat kavita...:)

    उत्तर देंहटाएं

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