''काव्योत्सव'' में आज रामकृष्ण गौतम जी - अपनी माटी

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गुरुवार, जून 03, 2010

''काव्योत्सव'' में आज रामकृष्ण गौतम जी

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रामकृष्ण गौतम जी
जबलपुर (एमपी)

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 "विरह"
ख़ुशी जो छीन ली उसने तमाम उम्र के लिए
गिला फिर क्या करें हम उसका किसी के लिए

चांदनी तो होती ही है महज़ चार पल की
मिलेगी क्या किसी को रोशनी सदा के लिए

भूल जाना हालाँकि इसे मुनासिब तो नहीं होता
पर भुला सकते हैं हम इसे पल दो पल के लिए

जिंदगी ने किसे हंसाया है उम्र भर के लिए
हमें तो बस चाहिए सहारा एक सफ़र के लिए

"विरह" की वेदना कैसी है, हमसे पूछो "गौतम"
हमें तो साथ ही मिला था बस "विरह" के लिए

6 टिप्‍पणियां:

  1. "विरह" की वेदना कैसी है, हमसे पूछो "गौतम"
    हमें तो साथ ही मिला था बस "विरह" के लिए

    BAHUT KHUB


    BADHAI AAP KO IS KE LIYE

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत उम्दा ग़ज़ल... जिंदगी की हकीकत लिए... गहरी बात सहजता से !

    जवाब देंहटाएं
  3. विरह" की वेदना कैसी है, हमसे पूछो "गौतम"
    हमें तो साथ ही मिला था बस "विरह" के लिए
    बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं

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