''काव्योत्सव'' में आज कवि कुलवंत सिंह जी - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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''काव्योत्सव'' में आज कवि कुलवंत सिंह जी

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प्रकृति

सतरंगी परिधान पहन कर,
आच्छादित है मेघ गगन,
प्रकृति छटा बिखरी रुपहली,
चहक रहे द्विज हो मगन ।

कन - कन बरखा की बूंदे,
वसुधा आँचल भिगो रहीं,
किरनें छन - छन कर आतीं,
धरा चुनर है सजो रहीं ।

सरसिज दल तलैया में,
झूम - झूम बल खा रहे,
किसलय कोंपल कुसुम कुंज के,
समीर सुगंधित कर रहे ।

हर लता हर डाली बहकी,
मलयानिल संग ताल मिलाये,
मधुरिम कोकिल की बोली,
सरगम सरिता सुर सजाए ।

कल - कल करती तरंगिणी,
उज्जवल तरल धार संवरते,
जल-कण बिंदु अंशु बिखरते,
माणिक, मोती, हीरक लगते।

मृग शावक कुलाँचे भरता,
गुंजन मधुप मंजरी भाता,
अनुपम सौंदर्य समेटे दृष्य,
लोचन बसता, हृदय लुभाता ।
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1 टिप्पणी:

  1. "हर लता हर डाली बहकी,
    मलयानिल संग ताल मिलाये,
    मधुरिम कोकिल की बोली,
    सरगम सरिता सुर सजाए ।"
    इक वैज्ञानिक विचारों वाला कवि जब प्रकृति पर ऐसी कविता लिखता है तो मन और भी प्रफुल्लित हो जाता है... छायावादी प्रवृतियों वाली ए़क सुंदर कविता... कुलवंत जी को हार्दिक बधाई ! इक बार पुनः दोहरा रहा हू की टिप्पणियों एवं पाठकों की कम संख्या काव्योत्सव के आनंद को कम कर रही है... इसे और भी बेहतर ढंग से प्रोत्साहित किया जा सकता है... ताकि पाठक आयें ...

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