''काव्योत्सव'' में आज आचार्य संजीव 'सलिल' - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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''काव्योत्सव'' में आज आचार्य संजीव 'सलिल'

Share अपनी माटी और आप सभी की तरफ से सुनहरे भविष्य की कामना के साथ ''काव्योत्सव'' में आज आचार्य संजीव 'सलिल' की रचना और  रचनाकार प्रस्तुत हैं.स्वागत करिएगा.आपके अनमोल सुझाव ,विचार भी बताइएगा


आचार्य संजीव 'सलिल', संपादक दिव्य नर्मदा
ई मेल; सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम


अम्ब विमल मति दे

हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....

नन्दन कानन हो यह धरती।
पाप-ताप जीवन का हरती।
हरियाली विकसे.....

बहे नीर अमृत सा पावन।
मलयज शीतल शुद्ध सुहावन।
अरुण निरख विहसे.....

कंकर से शंकर गढ़ पायें।
हिमगिरि के ऊपर चढ़ जाएँ।
वह बल-विक्रम दे.....

हरा-भरा हो सावन-फागुन।
रम्य ललित त्रैलोक्य लुभावन।
सुख-समृद्धि सरसे.....

नेह-प्रेम से राष्ट्र सँवारें।
स्नेह समन्वय मन्त्र उचारें।
' सलिल' विमल प्रवहे.....

6 टिप्‍पणियां:

  1. संजीव सलिल जी को पढना हमेशा ही अच्छा लगा है...उनकी कविताओं की ज्ञेयता,,हमेशा आकर्षित करती है, मैंने तो उनकी कविता गाई भी इसलिए ..और भी करीब हूँ उनकी कविताओं के...
    आपका आभार ..

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  2. संजीव सलिल जी की रचनाऐ बहुत ही अच्‍छी होती हैं .. आपका आभार !!

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  3. सुंदर और सार्थक रचना... बहुत दिनों बाद ऐसे रचना पढ़ी जिसमे व्यापक भाव हैं..

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  4. aisi rachanye bahut kam padhne ko prapt hoti hai , man ppulkit ho gaya .sadhuwad

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  5. behad umda , prashansniya rachanyein likhte hain salil ji jo dil ko chhoo jati hain.

    उत्तर देंहटाएं

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