''काव्योत्सव'' में आज शील निगम की रचना - अपनी माटी Apni Maati

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''काव्योत्सव'' में आज शील निगम की रचना

Share अपनी माटी और आप सभी की तरफ से सुनहरे भविष्य की कामना के साथ ''काव्योत्सव'' में आज शील निगम की रचना और रचनाकार प्रस्तुत हैं.स्वागत करिएगा.आपके अनमोल सुझाव ,विचार भी बताइएगा


sheelnigam@yahoo.com

भीगे मौसम की सुगंधमयी सदा,
श्रावणी परदों से छनकर आतीं हैं,
और मेरी बंजारन आत्मा के अंतस्‌ में,
इन्द्रधनुषी रंग सजा जाती है।

वासन्ती बयार की हल्की सी छुअन,
ले जाती है मन को दूर अनंत तक,
बसा है जहाँ रिश्तों का अनबूझा सा संसार
जहाँ दूर दूर तक अपनेपन का नहीं पता,
हाँ कुछ प्रतिबिम्ब उभरकर आते हैं,
दिल ने जिन्हें नहीं दी कभी सदा।

भीगे मौसम की सुगंधमयी सदा,
श्रावणी परदों से छनकर आती है,
और मेरी वैरागन आत्मा के अंतस में,
इन्द्रधनुषी रंग सजा जाती है।

कच्ची धूप की प्रथम किरण,
चुपके से आती है मन के आँगन में,
रहती है दिनभर खट्टी मीठी
यादों की भूल-भूलैयों में
जीवन संध्या में गोधूलि बेला ही ,
अपने परायों का भेद बता जाती है।

भीगे मौसम की सुगंधमयी सदा
श्रावणी परदों से छनकर आती है
और मेरी जोगन आत्मा के अंतस में
इन्द्रधनुषी रंग सजा जाती है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. khubshurat abhivyakti....shandaar!!

    hamare blog pe aayen...

    जवाब देंहटाएं
  2. भीगे मौसम की सुगंधमयी सदा,
    श्रावणी परदों से छनकर आतीं हैं,
    और मेरी बंजारन आत्मा के अंतस्‌ में,
    इन्द्रधनुषी रंग सजा जाती है।


    waah ..!!! bemishal..ek banjaran hone ka andazz behad pasand aaya...kabhi 2 sirf ek shabd ko samil kar lene matr se shabdon ki takat kitni mukhar hojaty hain....ye iska saboot hain...

    Bahut sunder abhiwyakty

    जवाब देंहटाएं

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