''काव्योत्सव'' में आज डॉ.अनिल चड्डा की रचना - अपनी माटी

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गुरुवार, जून 10, 2010

''काव्योत्सव'' में आज डॉ.अनिल चड्डा की रचना

Share अपनी माटी और आप सभी की तरफ से सुनहरे भविष्य की कामना के साथ ''काव्योत्सव'' में आज डॉ.अनिल चड्डा की रचना और रचनाकार प्रस्तुत हैं.स्वागत करिएगा.आपकेअनमोल सुझाव ,विचार भी बताइएगा

डॉ.अनिल चड्डा
निदेशक,
दूरसंचार विभाग,
संचार भवन, नई दिल्ली
प्रायश्चित

कभी कभी सोचता हूँ
क्या पापियों के पाप
बिना प्रायश्चित ही
धुल जाते हैं
और फिर पापियों को
और पाप करने की
राह दिखलाते हैं
यदि हाँ
तो इन पापियों के पाप
बिना प्रायश्चित ही
क्यों धो डालती है गंगा
क्या ये भी पाप नहीं है
मन सहजता से
इस बात को
स्वीकार नहीं कर पाता है
तभी तो
सवाल उठाता है
कि दुनिया में
दिन-ब-दिन
पाप क्यों बढ़ते जा रहे हैं
और
उत्तर पाता है
कि जब पापियों के पाप
यूँ ही
बिना अन्त:करण को धोये
धुल जाते हैं
तो स्वत: ही
और पाप करने की
प्रेरणा पाते हैं
अंतत: पाप
बढ़ते ही जाते हैं
बढ़ते ही जाते हैं

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