आज ''काव्योत्सव'' में किरण जी राजपुरोहित ''नितिला'' - अपनी माटी

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शुक्रवार, जून 11, 2010

आज ''काव्योत्सव'' में किरण जी राजपुरोहित ''नितिला''




रसोई

सपना होता है हर गृहिणी का
अपनी रसोई सजाना
झाड़ पोंछ कर जंजालों को
वह प्रविष्ट करती है
इक महत्वपूर्ण साम्राज्य में
जो धुरी है तमाम सभ्यताओं की
आचार विचारों की ,
रंग बिरंगे धुले डिब्बेंा में भरी होती है
शुभेच्छा की भावना
हर डिब्बा जैसे प्यार की पोटली हो
उसका
एक ममत्व भरी दृष्टि डाल
छम्म की छमक से छौंक देती है
वही खुश्बू बयार की भांति उड़ा ले जाती है तमाम
विपदाओ को,
हर डिब्बे में ही जैसे जादू हो
जो खोलते ही छा जायेगा
समस्त दुर्योगों पर,
हर बर्तन पर स्नेह की छाप हेाती है
जो पहंुचती है खाने वाले की
उंगलियों की पोरों को छूकर
रग रग में और
आत्मा को पान कराती है
संस्कारों और सुविचारों का
सिंचित होती है यहंी से
सचमुच ही मानव के
वंश वृक्षों की खेती,
जो सुरसोई की स्नेह भरी गंध से
न गुजरा हो
अछूता हो
अवश्य ही अमानवीय
आतंकवादी होगें!!!!!

5 टिप्‍पणियां:

  1. kकिरण जी से मुलाकात करवाने और उनकी कविता पढवाने के लिये धन्यवाद । कविता दिल को छू गयी।

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  2. Wahh!!!Bemishal..sabhi sabhyataon achar-vichar or vyavhaar ka aadhar..soch or kalpna ke sach ki chasni ka satt ka swaad....sukhad hain ..kamal

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