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आज ''काव्योत्सव'' में छपने वाले कवि देवेन्द्र कुमार जी

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on गुरुवार, जून 17, 2010 | गुरुवार, जून 17, 2010

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आज ''काव्योत्सव'' में छपने वाले कवि महोदय हैं देवेन्द्र कुमार जी जो फिलहाल
पेशे से पत्रकार हैं और बर्तमान में लखनऊ में कार्यरत हैं उनका पता - L DA कालोनी, कानपुर रोड, लखनऊ, फ़ोन 9044824636
goswami.deven@gmail.कॉम पर संपर्क किया जा सकता है.

बेटी

माँ मैं भी पढ़ना चाहती हूँ
 भैया की तरह मैं भी स्कूल जाना चाहती हूँ
 पापा के साथ मैं भी चलना चाहती हूँ
 तुम मेरे लिए भी सुबह नास्ता बनाना
 भैया के तरह अपने ही हांथों से खिलाना
 तुम मेरे भी नखरे सहना
 इंतजार में मेरे भी दरवाज़े पर रहना
 माँ मैं जानती हूँ मेरे जन्म पर
 तुम कितना रोई थी
 दादा, दादी और पापा के
 कितने ताने सही थी
 उम्मीद  थी तुम लोगों को बेटे की
 जो कुल का नाम रोशन करेगा
 खानदान को आगे बढ़ाएगा
 और बुढ़ापे की लाठी कहलायेगा
 पर मेरे आने पर सभी ने मातम मनाया
 हर खिलोने के  लिए मुझ पर एहसान जताया
 इन एहसानों के बोझ तले
 अब मैं दब रही हूँ
 तुमलोगों के प्रेम के लिए
 अब भी तरस रही हूँ
 माँ तुम्हारी कोख में मैं भी

भैया की तरह नौ महीने तक रही
 जन्म मेरे भी तुम वही कष्ट सही
 माँ मैं भी तो हूँ तुम्हारी संतान
 मैंने भी तो किया तुम्हारे स्तनों का पान
 फिर भैया से ही केवल क्यों करती हो प्यार
 बेटी के साथ ये कैसा दोहरा व्यवहार

माँ मैं भी बन सकती हूँ तुम्हारा सहारा
 मौका दो जीत कर दिखला सकती हूँ जग सारा
 वह लड़की
एक बच्ची खेल रही थी
 सड़क के किनारे तपती धूप में

सहमते हैं लोग जिस तेज से
 उसी की परछाई में बैठ वह
 खेल रही थी कुछ पत्तों से
 ये वही पत्ते हैं जो सह न सके
 प्रचंड ताप को
 कुछ ही दूरी पर बन रही है सड़क
 रोलरों और दामरों की गति
 लू को भी दे रही है चुनौती
 पत्थर और अलकतरा डालती

व्यस्त हैं औरतें अपनी काम में
 अंगारों पर चलने वाली
 इन्ही में से एक है माँ
 उस बच्ची की
 जिसके अर्धनग्न बदन को
 कर दिया है काला
 सूर्य की तेज ने
 मां की ही बुलंद हौंसलें की तरह
 इस बच्ची के भी हैं हौंसलें बुलंद
 जो आँखों को मल कर
 लू के थपेड़ों में भी मुस्कुरा रही है
 हथोंड़ों, कुदाल और बेलचे को ही
 अपना खिलौना मान रही है
 दामरों  और रोलरों की गडगडाहट पर
 नाचती है वह लड़की
 पत्थरों की पटकने की धुन पर
 गाती है वह लड़की
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