'काव्योत्सव'' फिर से शुरू आज चैन सिंह जी शेखावत - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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'काव्योत्सव'' फिर से शुरू आज चैन सिंह जी शेखावत

चैन सिंह जी रा.उ.मा.वि. समेजा (श्रीगंगानगर) में फिलहाल हिंदी के व्याख्याता हैं.प्रस्तुत है उनकी दो रचनाएँ.आशा है आपको पसंद आएगी.


1.भूखे जंगल


बन्दूक के पीछे की भूख
भेद नहीं सकती
हमारे नग्नता-प्रूफ चश्मों को

हमारी भाषा और कपड़े

हमें सभ्य बनाते हैं

लेकिन

असभ्यता की हक़ीक़त

मानों दिल्ली से दूर है

भूख को बारूद बनाने की

ये भूल अपराध है

या कि

भूख ही है अपराध

बन्दूक पर बन्दूक से

और उगेंगी बंदूकें

किन्हीं जंगलों में

और हम
व्यस्त हो जाएँगे

यह  सिद्ध करेंगे

कि भूखे जंगल अपराधी हैं.



२. स्वप्न

स्वप्न निशाचर होते हैं

इनकी किश्तियाँ

अँधेरे की

आकाशगंगाओं पे तिरतीं हैं

कुछ अँधेरा चाहिये

स्वप्न संजोने के लिये

नरम होते हैं ये,मुलायम

इनकी नरमी

अँधेरे में अधिक

महसूस की जा सकती हैं.

तमाम आकाशगंगाएँ

रीत गयी हैं अँधेरे की

और किश्तियाँ

घात पर जंग खा रही हैं.

ये अँधेरा

एकाकीपन का है

जहाँ निशाचरों के

कारवाँ निकलते हैं.

3 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन रचनायें………………लाजवाब अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  2. BHAI CHAIN SINGH JI ,
    AAPKI DONO KAVITAYEN BAHUT PYARI HAIN | YE PANKTIYAN JORDAR HAIN -
    ये अँधेरा


    एकाकीपन का है


    जहाँ निशाचरों के


    कारवाँ निकलते हैं.
    BADHAAI HO !

    उत्तर देंहटाएं

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