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''काव्योत्सव'' की आज की कलमकार हैं वन्दना जी

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on बुधवार, जून 23, 2010 | बुधवार, जून 23, 2010

जो खुद के बारे में वन्दना जी कहती हैं कि मैं एक गृहणी हूँ। मुझे पढ़ने-लिखने का शौक है तथा झूठ से मुझे सख्त नफरत है। मैं जो भी महसूस करती हूँ, निर्भयता से उसे लिखती हूँ। अपनी प्रशंसा करना मुझे आता नही इसलिए मुझे अपने बारे में सभी मित्रों की टिप्पणियों पर कोई एतराज भी नही होता है। मेरा ब्लॉग पढ़कर आप नि:संकोच मेरी त्रुटियों को अवश्य बताएँ। मैं विश्वास दिलाती हूँ कि हरेक ब्लॉगर मित्र के अच्छे स्रजन की अवश्य सराहना करूँगी। ज़ाल-जगतरूपी महासागर की मैं तो मात्र एक अकिंचन बून्द हूँ। उनकी बहुत सी लोकप्रिय रचनाओं में से एक आज प्रस्तुत है.

"उर्मिला की विरह वेदना"

१) प्रियतम हे प्रानप्यारे
विदाई की अन्तिम बेला में
दरस को नैना तरस रहे हैं
ज्यों चंदा को चकोर तरसे है
आरती का थाल सजा है
प्रेम का दीपक यूँ जला है
ज्यों दीपक राग गाया गया हो


२) पावस ऋतु भी छा गई है
मेघ मल्हार गा रहे हैं
प्रियतम तुमको बुला रहे हैं
ह्रदय की किवाडिया खडका रहे हैं
विरह अगन में दहका रहे हैं
करोड़ों सूर्यों की दाहकता
ह्रदय को धधका रही है
प्रेम अगन में झुलसा रही है
देवराज बरसाएं नीर कितना ही
फिर भी ना शीतलता आ रही है


३) हे प्राणाधार
शरद ऋतु भी आ गई है
शरतचंद्र की चंचल चन्द्रकिरण भी
प्रिय वियोग में धधकती
अन्तःपुर की ज्वाला को
न हुलसा पा रही है
ह्रदय में अगन लगा रही है
४) ऋतुराज की मादकता भी छा गई है
मंद मंद बयार भी बह रही है
समीर की मोहकता भी
ना देह को भा रही है
चंपा चमेली की महक भी
प्रिय बिछोह को न सहला पा रही है

५) मेरे जीवनाधार
पतझड़ ऐसे ठहर गया है
खेत को जैसे पाला पड़ा हो
झर झर अश्रु बरस रहे हैं
जैसे शाख से पत्ते झड़ रहे हैं
उपवन सारे सूख गए हैं
पिय वियोग में डूब गए हैं
मेरी वेदना को समझ गए हैं
साथ देने को मचल गए हैं
जीवन ठूंठ सा बन गया है
हर श्रृंगार जैसे रूठ गया है

६) इंतज़ार मेरा पथरा गया है
विरहाग्नि में देह भी न जले है
क्यूंकि आत्मा तो तुम संग चले है
बिन आत्मा की देह में
वेदना का संसार पले है


७) मेरे विरह तप से नरोत्तम
पथ आलोकित होगा तुम्हारा
पोरुष को संबल मिलेगा
भात्री - सेवा को समर्पित तुम
पथ बाधा न बन पाऊँगी
अर्धांगिनी हूँ तुम्हारी
अपना फ़र्ज़ निभाउँगी
मेरी ओर न निहारना कभी
ख्याल भी ह्रदय में न लाना कभी
इंतज़ार का दीपक हथेली पर लिए
देहरी पर बैठी मिलूंगी
प्रीत के दीपक को मैं
अश्रुओं का घृत दूंगी
दीपक मेरी आस का है ये
मेरे प्रेम और विश्वास का है ये
कभी न बुझने पायेगा
इक दिन तुमको लौटा लायेगा, लौटा लायेगा
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9 टिप्‍पणियां:

  1. वंदना,

    बहुत सुन्दर लिखा है आपने, उर्मिला के वेदना को और जिसने साकार किया था वह जहाँ तक मुझे याद है मैथिलि शरण गुप्त जी थे. जिस गहराई से उसको जीकर तुमने शब्दों में ढाला है उसकी तारीफ नहींकी जा सकती है.
    बहुत सुन्दर.

    उत्तर देंहटाएं
  2. उर्मिला की विरह को सटीक शब्द दिए हैं...अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  3. urmila ki vedna itni sahi hai ki kya kahun....ramayan ke is patra per log kam sochte hain

    उत्तर देंहटाएं
  4. Dashrath ko mila shraap kahan,kahan tak ,kis,kis ko dard de gaya!
    Bahut khoobsoorati se Urmila ka dard bayan hua hai!

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर, सटीक और सहज रचना के लिए बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  6. इंतज़ार का दीपक हथेली पर लिए
    देहरी पर बैठी मिलूंगी
    प्रीत के दीपक को मैं
    अश्रुओं का घृत दूंगी
    दीपक मेरी आस का है ये
    मेरे प्रेम और विश्वास का है ये
    कभी न बुझने पायेगा
    इक दिन तुमको लौटा लायेगा, लौटा लायेगा
    बहुत ही सुन्दर और सशक्त अभिव्यक्ति है ! उर्मिला के विशवास को नमन !

    उत्तर देंहटाएं
  7. bahut marmik virahhbhivyakti h ... urmila ki peeda ko bhartiya sahitya men sarvpratham guptji ne hi vyakt kiya....ek upekshit paatr ke dard ko aapne phir se shabd diye h...badhai..

    उत्तर देंहटाएं
  8. उर्मिला उपेक्षित पात्र रही है. उसका विरह मौन ही रहा है.
    सुन्दर रचना से आपने मुखरित किया है

    उत्तर देंहटाएं

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