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''काव्योत्सव'' की मांग पर वन्दना जी आज फिर से

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on गुरुवार, जून 24, 2010 | गुरुवार, जून 24, 2010


पाठक साथियों हमें कल वन्दना जी के उर्मिला की वेदना पर पोस्ट की हुई कविता पर बहुत से ई-मेल मिले और आज हम उन सभी को ध्यान में रखते हुए उनकी लिखी एक और रचना पोस्ट कर रहे हैं. हम आप सभी के द्वारा मिल रहे स्नेह का आदर करते हैं. अपनी माटी को बने अभी एक साल भी नहीं हुआ कि ये सफ़र बहुत सफलता से जारी है.एक बार आप सभी को धन्यवाद-सम्पादक

स्वीकार करूँ मैं भी तुमको

अंगीकार किया जब तुमने
 क्यूँ नही चाहा तब
 स्वीकार करूँ मैं भी तुमको
 जब बांधा इस बंधन को
 गठजोड़ लगा था हृदयों का
 फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
 अंगीकार करूँ मैं भी तुमको
 दान लिया था जब तुमने
 तब क्यूँ नही चाहा तुमने
 वस्तु बना कर
 कोई तुम्हें भी दान करे
 सिन्दूर भरा था जब माँग में
 वादे किए थे जब जन्मों के
 तब क्यूँ नही चाहा तुमने
 मेरी उम्र भी दराज़ हो
 तुम भी बंधो उसी बंधन में
 जिसका सिला चाहा मुझसे
 अर्धांगिनी बनाया जब मुझको
 तब क्यूँ नही चाहा तुमने
 तुम भी अर्धनारीश्वर बनो
 अपूर्णता को अपनी
 सम्पूर्णता में पूर्ण करो
 इक तरफा स्वीकारोक्ति तुम्हारी
 क्यूँ तुम्हें आंदोलित नही कर पाती है
 मेरी स्वीकारोक्ति क्या तुम्हारे
 पौरुष पर आघात तो नही
 जब तक मैं न अंगीकार करूँ
 जब तक मैं न तुम्हें स्वीकार करूँ
 अपना वजूद कहाँ तुम पाओगे
 फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
 अपना वजूद पाना मुझमें
 फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
 स्वीकार करूँ में भी तुमको
 स्वीकार करूँ मैं .......................
रचनाकार
वन्दना गुप्ता



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6 टिप्‍पणियां:

  1. जब तक मैं न तुम्हें स्वीकार करूँ
    अपना वजूद कहाँ तुम पाओगे
    फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
    अपना वजूद पाना मुझमें
    फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
    स्वीकार करूँ में भी तुमको
    स्वीकार करूँ मैं .......................
    --
    सुन्दर भाव लिए हुए,
    बढ़िया रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  2. गहरे एहसास .... सच है पूर्ण रूप से न पाना .. अपूर्णता ही है .... एक दूजे के बिना सब कुछ अपूर्ण है ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सार्थक लेखन....यही तो नहीं समझ पते सब की कहाँ अपूर्णता रह जाती है....बहुत अच्छी और गहरे भाव लिए रचना

    उत्तर देंहटाएं

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