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आज ''काव्योत्सव'' में देवदत्त पालीवाल जी ''निर्भय''

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on शनिवार, जून 26, 2010 | शनिवार, जून 26, 2010









उनकी इस कविता के ज़रिये उनके निर्भय होकर लिखने का अनदाज लगाया जा सकता है. उनसे सम्पर्क का पता है 
  
कलम का उपयोग
बिक चुका स्वयं ईमान बिका,
क्यों बेच रहा है तू मुझको
लिख रहा दिवस को रात  व्यर्थ
साम्यर्थ नहीं है यदि तुझको (१)

लिख चुका सांच को झूठ बहुत
क्यों व्यर्थ डींग तू हांक रहा
है समर्थ नहीं सच लिखने का
क्यों कर जग को गुमराह रहा  (२)

यह माँ वाणी का आभूषण है
तू कर क्यों इसका दुरपयोग रहा
हो जाता जीवन उसका धन्य सदा
जो  कर इसका उपयोग रहा    (३)

लिख सको अगर तो सत्य लिखो
लिख झूठ न इसका अपमान करो
यह  हमें सिखाती  हैं माँ लिखना
सब मिलकर इसका सम्मान करो (४)
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