''काव्योत्सव में कविराज अमृत ''वाणी'' - अपनी माटी Apni Maati

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''काव्योत्सव में कविराज अमृत ''वाणी''


 

 

 

 

 

 

 

 

प्रस्तुत है उनकी एक राजस्थानी रचना ,ये काव्योत्सव की पहली राजस्थानी रचना है

जमी जमाई दूकान

एक नेताजी की

जमी जमाई दूकान
असी खतम होगी ,
कि
ईं चुनाव में तो
वांकी जमानत ही जप्त होगी ।

बाजार में
मारा पग पकड़
बोल्या मर्यो कविराज ,
ईं चुनाव में
मारी ईं भारी हार को
थोड़ो बताओ राज ।

में धोती उठाके
सबने वो निषान दिखायो ,
झटे नेताजी के
छ महीना पेली
एक पागल कुत्ते खायो ।

में बोल्यो
कुत्ता का काटबा से
खून में ईमानदारी बढ़गी,
ओर ईं रिएक्षन से
दूजो कुर्सी पे छडग्यो
अन कुर्सी थांका पे छडगी ।

कुत्ता का जेर से
राजनीति को
सारोई जेर कटग्यो ,
ओर यो एक ही कारण
जो
अबकी बार
थूं कुर्सी सेई हटग्यो ।

स्ुाणोजी नेताजी
राजनीति में
भारी विनाष हो जातो ,
वो कुत्तो जो पागल नी होतो
तो थांको  स्वर्गवास हो जातो ।
   
नेताजी बोल्या
थूं मारा दोष्त होयके
या बात  केवे ,
मने तो वा बात बता
के ईंज राजनीति में
पाछो कसान लेवे ।

में बोल्यो करवालो
डाकूआं का अड्डा में रिजर्वेषन ,
लगवाओ सुबह-षाम
सांप का इंजेक्षन पे इंजेक्षन ।
कुकर्म का दो केपसूल
गबन की चार गोळ्या पाओ ,
अय्यासी की हवा , दारू की दवा
या कोर्स छ महीना खाओ ।


डाकू जो मानग्या थाने
हमेषा उंची मूंछ रहेगी ,
अरे कमीषन लेबोई सीखग्या
तोई विदेषां तक  पूंछ रहेगी  ।

परदादा के दादा को
यो जूनो कोट भी उठै धूलेगो ,
थू सब जाणेगो ,
पण जाण के भी सब भूलेेगो ।  

थू नटतो-नटता खावेगो
ओर खाके झट नट जावेगो ,
पण याद राखजे
थे छीप के कटे बीड़ी भी पी
तो धूंओ अठै  आवेगो।


रचनाकारःअमृत‘वाणी‘

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