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आज कुलदीप बाबू की कविता छपी है

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, जून 29, 2010 | मंगलवार, जून 29, 2010


आज के रचनाकार हमारे साथी कुलदीप जी खुद अपने बारे में पूछानेपर कहते हैं.कि 

मैं ,कुलदीप गौड़ मूलतः हिंडौन सिटी राजस्थान का रहने वाला हूँ और पेशे से interior designer हूँ .हाई -स्कूल में हिंदी - साहित्य व संस्कृत-साहित्य पढने के कारण साहित्य में भी गहरी रूचि हो गयी,पढने के शौक के साथ-साथ थोडा बहुत लिख भी लेता हूँ.पढने और लिखने के साथ ही स्केचिंग और फोटोग्राफी भी मेरी रूचि के हिस्सा हैं.लेखन के क्षेत्र में कोई उपलब्धि नहीं हासिल की है, न ही हिंदी से कोई डिग्री ही हासिल की है,बस लिख लेता हूँ.हिंदी,संस्कृत और दर्शन-शास्त्र से स्नातक करने का असफल प्रयास जरूर किया था.और अब बेंगलोर शहर में एक प्रतिष्ठित कम्पनी में  interior designer की हेसियत से में बेगारी करता हूँ.







शिशिर की एक सुबह ,

मैं देखता हूँ पहाड़ के अंक से उठता हुआ सूरज

जो समेट रहा है यामिनी के साए को

अँधेरा दुबक गया है सरसों के पत्तों के बीच कहीं,



मैं देखता हूँ

सरसों के पत्तों के बीच जमे तुषार को

जो होना चाहता है आजाद ,उस ठिठुरन से जो

रच रही थी कोई साजिश हवा के साथ,

सूरज किरणों के बहलाने पर |

जो चीर आई हैं ,अँधेरे का कलेजा

वो लाली उतार तेज़ हो रही हैं,

तेज हो गया है पंछियों का कलरव भी और दौड़ बादलों की फलक पर |



अब मैं देखता हूँ फलक से लिपटी हुई एक धुंधली चादर ,

जिस ने मिटा दिया है रात के आँगन की रंगोलियों को ,

और इतराती धुंधली चादर पे किया पलटवार किरणों ने

कर दिया चादर तार-तार ,

और दो पहर तक सूरज डटा रहा तन के

क्षितिज मैं



अब सूरज संवार रहा है लटों को

जो उसने बिछायी थीं धरा पे सुखाने को ,

लपेटने लगा है सूरज अपने केश ललाट पे ,

जो पी रहे थे उस की चमक

हो गया है मद्धम

मुंद सा गया है अपने केशों से |





मैं देखता हूँ

सृष्टि के सौदागरों के द्वंद्व को,

पलटवार को,

और उन की नोंक-झोंक को

तुनक-मिजाजी को,

देखता हूँ करते हुए अठखेलियाँ

नन्हे शावकों की तरह |





देखता हूँ

एक शिशिर के दिन मैं

निढाल पड़े सूरज को और उस की छाती पे चढ़े अँधेरे को |



अब

फैलाए हैं यामिनी ने अपने डोने,

जो बढ़ रहे हैं द्रोपदी के चीर की तरह ,

मैं देखता हूँ ..

किसी पिकासो को,फलक पे उकेरते हुए चाँद और तारे

जो ठंडी हवा की मार से काँप रहे हों जैसे

और एक दरखत (दरख्त),जो खड़ा है नंगा किसी भिखारी की तरह ,

लुट गया जिसका सब यौवन ऐसी इक नारी की तरह |





मैं देखता हूँ

फलक के केनवास को

कि पड़ गए उसके रंग धुंधले अब,

सूरज खड़ा हो आँखे मसल रहा है और

फिर तैयार है तलवार लिए हुए ,

अँधेरे का कलेजा चीरने |



फिर वही सब

पलटवार -नोंक झोंक-और द्वंद्व

सृष्टि के दूतों का

फिर वही क्रम,वही प्रक्रिया वही,अंदाज़

मैं सोचता हूँ आखिर कब तक ?


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