Latest Article :
Home » , , , » ''खाना और गाना दोनों ही खराब हो गया''-राम कैलाश यादव

''खाना और गाना दोनों ही खराब हो गया''-राम कैलाश यादव

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on शनिवार, जून 12, 2010 | शनिवार, जून 12, 2010

शेयर
 लोक गीतों की संस्कृति बहुत गहरी जड़ों  वाली जान पड़ती है,हमें बहुत सी बार ये बात अच्छे से अनुभव होती हैं खा तौर पर जब हम किसी लोक कलागुरु के सानिध्य में रहते हैं. मुझे भी पिछले दिनों देश के एक बड़े बिरहा गायक श्री राम कैलाश जी यादव के साथ  चार दिन बिताने का मौक़ा  मिला,एक ऐसा इंसान जो कलाकार कम ईमानदार और सादगीभरा गुरु ज्यादा लग रहा था. हम लगभग पंद्रह चेले थे उन दिनों में. क्योंकि वे हमें दो लोक गीत सिखाने में जी जान लगे  रहे थे,तो हम अपने आपको चेले मानने लगे. मजेदार बात ये है की उनको गाते हुए सुनते समय उनके चहरे पर आने वाले शर्माने  के भाव पर हम शिष्य वारी-वारी जाते थे. पुरुष होकर भी उनकी एक अदा  उन्हें एक नायिका बनाने में सेकण्ड लगाती  थी.जब वे हमारे गाने को सुनते तो मन प्रसन्न होने पर वे देसी  अंदाज में ताली बजाते थे.
यादव जाती द्वारा गई जाने वाली गीतों की इस परम्परा के वे प्रबल वाहक और संवर्धनकर्ता थे. धोती-कुर्ता पहनने के साथ और एक गमछा गले में डालना नहीं भूलते थे. ज़माने के साथ-साथ चलने की बात करें तो वे नाम मात्र का एक मोबाइल साथ लिए होती हैं. बाकी वे आज भी संगत के लिए सच्चे गुरु जान पड़ते हैं.भले ही और लोगों
ने बिरहा गायन  को मनोरंजन के लिए खुला छोड़कर तार-तार कर दिया हो मगर गुरु राम कैलाश जी आज भी अपने दम पर सतत बने हुए हैं.उनके साथ रहते हुए एक बात बहुत अच्छे से याद रही की आजकल खाना और गाना दोनों  ही खराब हो गया है.खाने मिर्च मशाला ज्यादा हो गया है और गाना  फूहड़पन को ओढ़ चुका है,उनके साथ रहकर सीखा एक लोक गीत यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ. ये बहुत ही मधुरता के साथ  कज़री के रूप में बहुत सी जगह  गाया जाता रहा है........

 -------------------------------------
हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा 
आवे बदरा आवे बदरा ,हमरे .............

जाईके  बरस बदरा वांई  धोबी घटवा 
जहां धोबइन  भीगोईके पछारे कपड़ा 
हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा   .................

जाईके  बरस बदरा वांई रे कुंवनियाँ
जहां पनिहारिन निहुरिके भरत बा घघरा
हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा   .................

जाईके  बरस बदरा वांई रे महलियाँ
जहां बिरहिन निहारता पिया का डगरा
 हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा   .................
 
जाईके  बरस बदरा वांई फूल बगियाँ 
जहां मलिनिया बईठके  गुहत बा गुजरा  
हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा   .................
जाईके  बरस बदरा धनवा के खेतवा 
जहां जोहतबा किसानिन उठाईके नजारा 
-------------------------------------
बातें बहुत सी हैं आज इतना ही,ये लोक संस्कृति  का आलम बहुत बड़ा है किसी और बैठक में इस अनुभव को लिखने की कोशिश करूंगा
माणिक
Share this article :

1 टिप्पणी:

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template