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''काव्योत्सव'' में आज रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति जी

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, जून 06, 2010 | रविवार, जून 06, 2010

Share अपनी माटी ब्लॉग और आप सभी की तरफ से सुनहरे भविष्य की कामना के साथ ''काव्योत्सव'' में आज की रचना और  रचनाकार प्रस्तुत हैं.स्वागत करिएगा.आपके अनमोल सुझाव ,विचार भी बताइएगा
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 Peoples Samachar
6, Malviye Nagar, Bhopal MP
swapnil.ravi@gmail.कॉम 
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मेरे गांव की नदी पर पुल

मैं पहाड़ बना एक शहर में मेरे दोस्त
तुम गांव बने रहे अपने गांव में
इस तरह हम गांव और शहर के दो दोस्त हुए

वक्त ने हमारे बीच से गुजर जाना मंजूर किया
वह नदी बना और हममें से होकर बहने लगा

मेरे सपने पेड़ बन कर उग आए
वक्त की नदी के किनारे सपनों ने झाड़ फैलाए
छांव दी और फल गिराए

मेरे विचारों ने दूब का रूप धर लिया
मेरी शुभकामनाएं फूल बन गर्इं
वक्त की नदी की तरह बहते हुए
सब कुछ हरियाली में जज्ब हो गया

कुछ दिनों बाद मैं शहर आ गया
नदी सूख चुकी थी और
गांव उसके किनारों पर छांव के लिए नहीं ठहरा
पहाड़ में से एक सड़क गुजर गई
गांव की नदी पर एक पुल बन गया

मैं पहाड़ हूं और अपनी नदी में देखता हूं चेहरा
नदी सूख चुकी है और पुल बहुत ऊंचा बना है
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2 टिप्‍पणियां:

  1. नदी सूख चुकी है और पुल बहुत ऊंचा बना है
    ati sumdar

    उत्तर देंहटाएं
  2. "पहाड़ में से एक सड़क गुजर गई
    गांव की नदी पर एक पुल बन गया


    मैं पहाड़ हूं और अपनी नदी में देखता हूं चेहरा
    नदी सूख चुकी है और पुल बहुत ऊंचा बना है"
    पहाड़ नदी और गाँव और शहर का साझा दुःख बहुत ही मर्मस्पर्शी रूप से व्यक्त हुआ है... बिम्ब नया है... बात नए ढंग से कही गई है.. सुंदर रचना

    उत्तर देंहटाएं

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