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डॉ0 महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ‘‘नन्द’’की रचनाएँ

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on बुधवार, जुलाई 28, 2010 | बुधवार, जुलाई 28, 2010

 हिन्दी के दोहे-(हिन्दी महिमा)

हिन्दी मे गुण बहुत है, सम्यक देती अर्थ।
भाव प्रवण अति शुद्ध यह, संस्कृति सहित समर्थ।।1।।
वैयाकरणिक रूप में, जानी गयी है सिद्ध।
जिसका व्यापक कोश है, है सर्वज्ञ प्रसिद्ध।।2।।
निज भाषा के ज्ञान से, भाव भरे मन मोद।
एका लाये राष्ट्र में, दे बहु मन आमोद।।3।।
बिन हिन्दी के ज्ञान से, लगें लोग अल्पज्ञ।
भाव व्यक्त नहि कर सकें, लगे नही मर्मज्ञ।।4।।
शाखा हिन्दी की महत्, व्यापक रूचिर महान।
हिन्दी भाषा जन दिखें, सबका सबल सुजान।।5।।
हिन्दी संस्कृति रक्षिणी, जिसमे बहु विज्ञान।
जन-जन गण मन की बनी, सदियों से है प्राण।।6।।
हिन्दी के प्रति राखिये, सदा ही मन में मोह।
त्यागे परभाषा सभी, मन से करें विछोह।।7।।
निज भाषा निज धर्म पर, अर्पित मन का सार।
हर जन भाषा का करे, सम्यक सबल प्रसार।।8।।
देश प्रेम अनुरक्ति का, हिन्दी सबल आधार।
हिन्दी तन मन में बसे, आओ करें  प्रचार।।9।।
हिन्दी हिन्दी सब जपैं, हिन्दी मय आकाश।
हिन्दी ही नाशक तिमिर, करती दिव्य प्रकाश।।10।।
हिन्दी ने हमको दिया, स्वतंत्रता का दान।
हिन्दी साधक बन गये, अद्भुत दिव्य प्रकाश।।11।।
नही मिटा सकता कोई, हिन्दी का साम्राज्य।
सुखी समृद्धिरत रहें, हिन्दी भाषी राज्य।।12।।
हिन्दी में ही सब करें, नित प्रति अपने कर्म।
हिन्दी हिन्दुस्थान हित, जानेंगे यह मर्म।।13।।
ज्ञान भले लें और भी, पर हिन्दी हो मूल।
हिन्दी से ही मिटेगी, दुविधाओं का शूल।।14।।
हिन्दी में ही लिखी है, सुखद शुभद बहु नीति।
सत्य सिद्ध संकल्प की, होती है परतीति।।15।।

वृद्ध

बड़े हमारे पूज्य हैं, वही हमारी शान।
घर में इज्जत हो सदा, सदा करें सम्मान।।1।।
वृद्ध संग अनुभव मिले, अद्भुत ज्ञान अपार।
वृद्ध वृहद गुण पुंज हैं, करिये सब सत्कार।।2।।
जिस घर वृद्ध दुःखी रहे, अधम जानिये आप।
दान धर्म सब क्षीण हो, कलियुग का यह माप।।3।।
हो बुजुर्ग हित कामना, मन में सेवा कर्म।
मन की इच्छा पूर्णकर, पूर्ण करें सब धर्म।।4।।
अगर कष्ट हो वृद्ध को, मन में हो सन्ताप।
सुफल पुण्य होते नही, लगता मन को पाप।।5।।
इज्जत, सेवा भाव से, मिलता है आशीष।
कुल कुटुम्ब मे हर्ष हो, खुश रहते है ईश।।6।।
पूजित रक्षित सब करें, वृद्ध देव का रुप।
कर्म अलौकिक जानिये, सम्यक सबल अनूप।।7।।
गुण, अनुभव अर्जित करे, ज्ञान निधि को जान।
अगर किये सम्मान तो, मिलेगा बहु सम्मान।।8।।
वृद्ध सदा देते रहे, कुल को धन मन ज्ञान।
केवल वह है ढूँढते , हमसे बस सम्मान।।9।।
उनके मत को मत करें, कभी आप प्रतिकार।
अहंभाव निज मारकर, कर सेवा सत्कार।।10।।

सच्चाई

मैने स्वप्न अनूठा देखा, जग को जग से रूठा देखा।
चढ़े देवताओं पर जल औ, पुष्प दुग्ध की बात कहे क्या
मंदिर से जो मिलते अमृत, सब प्रसाद को जूठा देखा।
मैने स्वप्न अनूठा देखा, जग को जग से रूठा देखा।।1।।
लोगों का मन खाली इतना, छेद भरे है दिल के अन्दर
पर ऊपर का हृदय आवरण, सज्जित बूटा बूटा देखा।
मैने स्वप्न अनूठा देखा, जग को जग से रूठा देखा।।
मान न पाता सत्य को मानव, जो असत्य है सत्य लगा
हठ के वश मे नाच वृषभ अस, बंधा हुआ एक खूंटा देखा।
मैने स्वप्न अनूठा देखा, जग को जग से रूठा देखा।।
जितना लूटा किया इकट्ठा, पर पीड़ा की बात न सोची
लेकिन ‘नन्द’ छिना जब जिसका, उसी को हमने लूटा देखा।
मैने स्वप्न अनूठा देखा, जग को जग से रूठा देखा।।

वाह विधाता
मानव का वश तब तक चलता, जब तक उसका जीवन है।
दम्भ भरा है तब तक उसमें, जब तक उसके संग धन है।
ईश वन्दना, अर्थ कल्पना, पूरक बन जाते उसके।
माया का जंजाल सताता, स्वार्थ हृदय आते जिसके।
पर जीवन हित सोच न पाया, यह जीवन का खेल रहा।
दुःखी जनो से दूर हुआ, न किसी से कोई मेल रहा।
विस्मृत था कि हमे अवस्थाऐं भी कभी न जकड़ेगी।
दारूण दुःख भी कभी न होगा, विपदा कभी न पकडेगी।
चला समय का झोंका ऐसा, तन का बल भी क्षीण हुआ।
लगा कि ऐसा सूना होगा ,सजा सजाया नीड़ हुआ।
ईश्वर का आराधन केवल, एक मार्ग आया मन में।
धन का अहंभाव भी टूटा, सत्पथ अपनाया तन में।
शेष जीवनी शक्ति को कैसे, सेाचा अपनाना होगा।
कितनी मृदुल भाव सेवा के, मन में अब लाना होगा।
वाह विधाता तेरी दुनिया, की है कैसी रीति निराली।
झुके सदा तेरे आगे है, कैसे - कैसे  बलशाली।।
    

  प्राण एवं जीव

हे व्यथित प्राण हे विकल प्राण, मत कर चिन्ता मत हो मलान।
इसको ही जीवन कहते हैं, मानव ही सब दुःख सहते हैं,
जो सबको एक समझते हैं, सब कहते हैं उसको महान।।
हे व्यथित प्राण हे विकल प्राण, मत कर चिन्ता मत हो मलान।।1।।

दुःख भी सुख की पतली रेखा, है जन्म मरण जीवन लेखा,
सत असत जग में जो देखा, मिल गया उसी को पूर्ण ज्ञान,
हे व्यथित प्राण हे विकल प्राण, मत कर चिन्ता मत हो मलान।।2।।

यह जग ही है दो का समास, यदि है विकास तो है विनाश,
मत हो आसी मत हो निराश, यदि है सन्ध्या तो है विहान,
हे व्यथित प्राण हे विकल प्राण, मत कर चिन्ता मत हो मलान।।3।।
                   
बसन्त''एक दूत''

हे पतझड़ तुम जाते जाते, विपदा घन को लेते जाना।
श्याम सरोरूह शिव शंकर को, पूछे तब तुम याद दिलाना।
कहना कि कलियुग के युग में, आज बसेरा असुर बनाते,
अशुभ अधर्म कुमारग पथ को, सदा सर्वथा है अपनाते,
कही राजनेता बनकर के, कोई धाक जमाता है,
स्वार्थ और पद लोलुपता में, नाता तोड़ बहाता है,
हे पतझड़ बसन्त आने से पहले, तुम सन्देश दे जाना।
हे पतझड़ तुम जाते जाते, विपदा घन को लेते जाना।।1।।
मेरे जो सहयोगी बन्धु, उनका नाम बसन्त पड़ा,
वह ऋतुराज मधुप को लेकर, आज न जाने कहॉ अड़ा,
साथ स्नेहरस का रस लेकर, के वह भूला है आना।
हे पतझड़ तुम जाते जाते, विपदा घन को लेते जाना।।2।।
अंग स्फुरण मन लालायित, देख सुमन को होता है,
हम स्वागत करते हैं उसका, मन लालायित होता है,
जब अनंग से अंग मिले तो, बात यही तुम भी दुहराना।
हे पतझड़ तुम जाते जाते, विपदा घन को लेते जाना।।3।।
मेरी इन बातों को जाकर, ना तुम उन्हें सुनाओगे,
तो समझो इस शून्य जगत में, निन्दक माने जाओगे,
“नंद” के नन्दित मन में “नंदा” को जाकर मेरी याद दिलाना।
हे पतझड़ तुम जाते जाते, विपदा घन को लेते जाना।।4।।

अनमना

है प्रेम रोता कक्ष में,
           प्रीतम बिना प्रियतम बने।
अन्तर्निहित शशि उरसि तल है
           नखत गणमाला बने।।1।।
है आज अम्बर ध्रूम्रघन,
           युग मकर में सावन बसा।
अकथनीया है कथा,
           विपरीत संकुल शब्द सा।।2।।
सतत होगी क्या यहॉ,
           यह कष्टदा श्यामा अमा।
 मुकुलित न होगी पुनि पियूषी,
           सरस प्रिय अनूपमा।।3।।

भ्रमर

भ्रामी भ्रमर बताओ तो, तू क्यों उपवन में रमते हो।
कुंता कीर्णित सुमन न तेरे, जिनमे विधि नित रमते हो।।1।।
इन सौरभ से सुन्दरता से यह, कैसी तेरी ममता है।
शंकर  जी के विष कराल से, इन दोनो की समता है।।2।।
अतः अनिल झकझोर झोर के, इनका मस्तक मोड़ रहा।
बार बार हठि झटक झटक के, पंखुड़ियों को तोड़ रहा।।3।।
मनमोहक मुद्रा ही उर्वसि, मंथन सबका करता है।
प्रबल काष्ठभेदी हो तुम भी, गुन गाता दम भरता है।।4।।
                   

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