मुकेश कुमार की कविता''अखबार '' - अपनी माटी Apni Maati

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मुकेश कुमार की कविता''अखबार ''






 मुकेश कुमार की कविता''अखबार ''

दिन था रविवार,
सुबह की अलसाई नींद
ऊपर से श्रीमती जी की चीत्कार...
देर से ही सही, नींद का किया बहिष्कार
फिर, चाय की चुस्की, साथ में अख़बार
आंखे जम गई दो शीर्षक पर
"दिल्ली की दौड़ती सड़क पर, कार में बलात्कार"
"सचिन! तेरा बैट कब तक दिखायेगा चमत्कार"
.

सचिन के बल्ले के चौके-छक्के की फुहार
हुआ खुशियों का मंद इजहार
दिल चिहुंका! हुआ बाग-बाग! चिल्लाया॥
सचिन! तू दिखाते रह ऐसा ही चमत्कार
कर बार-बार! हजारो बार......
.
तदपुरांत, धीरे धीरे पलटने लगा अखबार
पर, तुरंत ही आँखें और उँगलियों ने किया मजबूर
आँखे फिर से उसी शीर्षक पर जा कर हो गयी स्थिर
एक दृश्य बिना किसी टेक-रिटेक के गयी सामने से गुजर
सोच भी गयी थम!
आँखे हो गयी नम!!
.
उसी दिल से, वहीँ से, उसी समय
एक और बिना सोचे, समझे, हुआ हुंकार
क्या ये भी होगा बार-बार!! हजारो बार॥
क्या ऐसे ही महिलाओं की इज्जत होगी तार-तार.....
आखिर कब तक...........!!!!!!!!!!!!!!!

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