कविता ''लक्ष्य (कुहरे के बीच)'' - अपनी माटी

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मंगलवार, जुलाई 20, 2010

कविता ''लक्ष्य (कुहरे के बीच)''


 
कुहरे की चादर बड़ी घनी है माँ
दूर-दूर तक
कुछ नज़र नहीं आता
पर फिर भी
दिखता है अपना देश
अपने लोग !
हमारे कर्तव्यों का दम
कभी नहीं टूटता
इस घने कुहरे में
सर्द होते पाँव शिथिल नहीं होते
सरहद की आन
आग सी गर्म कर जाती है
कंपकंपाती सर्दी के आगे
हमारा उंचा मस्तक
कुहरे को चीरकर
अपना लक्ष्य पाता है

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