''काव्योत्सव'' फिर से आरम्भ रामपति जी की कविता "पावस'' के साथ - अपनी माटी

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सोमवार, जुलाई 12, 2010

''काव्योत्सव'' फिर से आरम्भ रामपति जी की कविता "पावस'' के साथ

श्रीमति रामपती जी स्नातक हैं और वर्तमान में रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय रसायन तथा पेट्रो रसायन विभाग भारत सरकार में निजी सचिव (राजपत्रित अधिकारी) के रूप में कार्यरत हैं.कविता लेखन आपकी रुचि है.
ब्लॉग :www.merebhav.blogspot.com
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पंख पसारे नाचे मोर
हरे भरे उपवन में
खुशहाली का लाई संदेशा
नन्ही नन्ही सावन की बूंदे !

ऋतुओं की रानी मनभावन
मन मयूर उल्लसित हुआ
भरपूर साथ है प्रकृति का
हर पल जीवन उत्सव हुआ !

आड़ी चितवन बौछारों की
है मृदुल स्पर्श फुहारों का
टप टप करती स्वर लहरियां
करती सृजन एक नए राग का !

पावस ऋतु की पावन वेला
रिमझिम रिमझिम है नीलगगन
शीतल बहे बयार पुरवाई
मीठी छुअन तन मन सिहरन !

बरखा का एक एक मोती
ले रहा विदा फलक सीप से
स्वागत को उत्सुक प्यासी धरती
कोई बूँद न छूटे दामन से !

पानी की एक सरल बूँद
सीप में, मोती का जामा पाती है
कालांतर में पावस बूंदे
मिटटी से सोना उपजाती हैं !

आज कृषक के मुख की आभा
दामिनी को पीछे छोड़ गई
हर्षित प्रफुल्लित आशा किरण
मुखमंडल पर दौड़ गई !

आ रही महक सोंधी सोंधी
मन को मदमस्त बनाती है
ठंडी फुहार इस मौसम की
अंतस को भिगो भी जाती है !

हर एक शाख पल्लवित हुई
कलियों ने घूँघट खोले हैं
चराचर, जीव जंतु, मानव
सब नैन बिछाए बैठे हैं !

प्रतीक्षा का अतिक्रमण
तब असहज हो जाता है
वर्ष भर प्यासा रहकर चातक
आकाश निहारा करता है !

घुमड़ - घुमड़ काले बादल
घनघोर घटाएँ तेज हवा
धरा का जल है नहीं गवारा
चातक रहता प्यासा प्यासा !

झूम उठी सृष्टि सारी
प्रकृति ने श्रृंगार किया
खिले पलाश हर दृष्टि में
झिलमिल बूंदों ने जवां किया !

पाती लेकर प्रियतम की
सतरंगी फुहार मन भाई है
लेकिन किसी विरहिणी के
सीने में आग लगा दी है !

कारे बदरा लौट गए
मंद हुई बारिश की थाप
सारा माहौल धुला सा है पर
न धुली हरीतिमा की छाप !     

1 टिप्पणी:

  1. सावन की दस्तक... मानसून का आगमन और काव्योत्सव में पावस की फुहार .... बेहद समीचीन और सार्थक कविता से कायोत्सव की पुनः शुरुआत... कविता अच्छी है... सरकारी महकमे में जा के लोग जहाँ नीरस हो जाते हैं (आम तौर पर लोगो की ये राय है मेरी नहीं ) रामपति जी ने इतनी सरस कविता लिखी है, बधाई !

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