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अरुण रॉय की कविता''चाँद तुम मुस्कुराना''

Written By Arun Roy on सोमवार, जुलाई 26, 2010 | सोमवार, जुलाई 26, 2010

चाँद
तुम मुस्कुराना
पृथ्वी के होने तक


अभी भी
लालटेन के नीचे
पढ़ रहे हैं
झूम झूम कर बच्चे
माँ
लकड़ी वाली अंगीठी में
पका रही है प्यार
दादाजी बांच रहे हैं
मानस खाली दालान में

चाँद
तुम मुस्कुराना
माँ, बच्चों और दादाजी के होने तक


अभी
उड़ेंगे जहाज के जहाज
और बरसा जायेंगे
बम और बारूद
चुपके से अँधेरे में
धरती के किसी कोने में
जब सो रही होगी चिड़िया
अपने बच्चों के साथ

चाँद
तुम मुस्कुराना
घोंसले में चिड़ियों के होने तक

मेरे पीछे
पड़े है कई हथियारबंद लोग
तरह तरह के लेकर हथियार
कुछ लुभावने
कुछ घातक हथियार लिए
बदल बदल कर रूप
ये पीछा कर रहे हैं मेरा
और मैं
पुरजोर गति से भाग रहा हूँ
चाँद
तुम मुस्कुराना
मेरी धमनियों में गति रहने तक
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