देवदत्त पालीवाल की रचनाएँ - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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देवदत्त पालीवाल की रचनाएँ

क्यों भगवन इन मैं ढूंढते हो 

हो रहा उपहास कैसा
आस्था का नग्न देखो ;
अवतार है हम स्वयं मैं
कह रहे हैं संत देखो (१)

ये है अगर अवतार निज मैं
करके नहीं क्यों कुछ दिखाते
खुद लिप्त हैं व्यभिचार मैं पर
मार्ग लोगो को दिखाते (२)

हो सच्चे अगर त्यागी तपश्वी
तो छोड़ दो इन आश्रमों को
जब ले लिया सन्यास तुमने
त्याग दो इन आडम्बरों को (३)

क्यों रूपधर तुम साधुओ का
करते आस्था का अपमान हो
जब फूट जाता पाप का घट
तब भागते क्यों दीखते हो (४)

धिक्कार है उन सब जनों को
जो कर रहे अँधा समर्थन
त्याग दो इन ढोंगियो को
जो कर रहे झूठा प्रदर्शन (५)

इसमें दोष है पूरा तुम्हारा
जो इन ढोंगियो को पूजते हो
है जिनका नहीं कोई ठिकाना
जो भगवान इनमे ढूढ़ते हो (६)

यदि चाह हैं भगवन की
बस स्वयं को बदल डालो
प्रभु तो स्वयं मिल जायगे
बस आचरणों को बदल डालो (७)

है वासना की भूख जिनको
वो मार्ग क्या दिखलायेगे
जो डूब रहे हों स्वयं मैं
वो पार क्या ले जायंगे (८}

चाह है यदि पूजने की तो
क्यों माँ-बाप को न पूजते हो
भगवान हैं घर मैं तुम्हारे
जो इन ढोंगियों को पूजते हो (९)

सब खेल है यह द्रष्टि का
बस भावनाओ की कमी है
हम बदल गए स्वयं मे
पर नहीं बदली जमी है (१०)

चिंता थी कुर्सी की केवल

कर सका न साहस आज तलक
वह अरब सिन्धु भी चला गया
ध्वनि जिसकी भीषण होती थी
वह पवन चल मैं छाला गया [१]

आभास ना था की अभी अचानक
सब कुछ बदला बदला होगा
निर्दोष निह्थे जन मानस पर
इतना भीषण हमला होगा [२]

पूर्व भास् था उनेह घटेगी
पर वे निद्रा मैं लीन रहें
चिंता थी कुर्सी की केवल
जोड़ तोड़ मैं लगे रहें [३]

क्यों डींग हांकते बड़ी बड़ी
तुमको जीने का अधिकार नहीं
क्यों व्यर्थ जताते हमदर्दी
सचजीने का तुमको अधिकार नहीं [४]

अगर न होते वीर सिपाही
तो रूप और भीषण होता
मौत हुई थी एक तिरासी
यह हजार को छू लेता [५]




है कायल उनका देश आज
गुणगान करें ना थकते हैं
कर मुक्त धरा को चलें गएँ
शीश मान मैं झुकते हैं [६]
paliwal_devdutta@yahoo.com

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