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'' पुस्तक समीक्षा -''हमारे दौर में मीरा''-गजेन्द्र मीणा

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, जुलाई 25, 2010 | रविवार, जुलाई 25, 2010


    हिंदी के वास्तविक और सशक्त  स्त्री काव्य का आरंभ मीराबाई की कविता से होता है। उनकी कविता में स्त्री की आत्मा की ऐसी आवाज सुनाई पड़ती है जो पराधीनता के बोध से बेचैन और स्वाधीनता की आकांक्षा से प्रेरित स्त्री की आवाज है। जिसे आजकल स्त्री चेतना कहा जाता है उसकी सशक्त अभिव्यक्ति पहली बार हिंदी में मीरा के काव्य में मिलती है। मीरा का समय, उस समय के समाज, उसकी सामाजिक सांस्कृतिक बनावट और मीरा के परिवार को ध्यान में रखिए तो उनके जीवन-संघर्ष और आत्माभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के महत्व का वास्तविक बोध होगा। चन्द्रा सदायत का यह कथन पल्लव द्वारा सम्पादित पुस्तक मीरा : एक पुनर्मूल्यांकन से लिया गया है। मीरा को भक्त कवयित्री के रूप में देखे जाने की परम्परा रही है किन्तु यह पुस्तक मीरा का एक नयी दृष्टि से मूल्यांकन करने का प्रयास करती है जिसमें मीरा को भक्त से अधिक सशक्त स्त्री कवि के रूप में देखने की जिद है। पुस्तक में नये और पुराने आलोचकों के विभिन्न आलेख लगभग इसी स्वर की पुष्टि करने वाले हैं। चन्द्रा सदायत का यह आलेख वस्तुतः मीरा को स्त्री काव्य की पुरोधा के रूप में प्रतिष्ठित करने का उपक्रम कहा जायेगा। चन्द्रा सदायत आगे लिखती हैं कि हिंदी के पाठ्यक्रमों में मीरा की स्थिति हिंदी समाज में स्त्री की स्थिति और पितृसत्तात्मक मूल्यों के वर्चस्व की दृष्टि का द्योतक है। 

    यह एक लम्बी बहस का ही हिस्सा माना जायेगा कि पाठ्यक्रम की राजनीति में मीरा या कबीर के साथ कितना न्याय या अन्याय हुआ है। यहाँ मीरा के बहाने स्त्री और दलित प्रश्न फिर से प्रगतिशील आलोचना के समक्ष चुनौती के रूप में आते हैं। यह पुस्तक दरअसल मीरा के व्यक्तित्व और उनकी कविता पर पड़े विभिन्न भक्ति के आवरणों को हटाकर आधुनिक आलोक में मूल्यांकन का प्रयास है। पुस्तक में संकलित एक आलेख मीरा  के अध्यात्म का समाजदर्शन और
समाजदर्शन का अध्यात्म में सुधा चौधरी ने लिखा है कि विद्रोही मीरा जिस घृणित भाव से सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पराधीन मूल्यों को चुनौती देती है उतनी ही परिपक्वता, समझ एवं सम्पूर्णता के साथ अध्यात्म के तात्विक मर्म का उद्घाटन करती है। यह उसके व्यक्तित्व की सकारात्मक रचनाशीलता  एवं वैचारिक गहनता का परिचायक है। अध्यात्मवादी जीवन दर्शन परम सत्ता को निर्गुण, निराकार, निर्विशेष  एवं अद्वैत रूप में मण्डित करता है। मीरा के भावपक्ष को देखकर लगता है कि उसने जगत के मिथ्यातत्व एवं संबंधों में स्वार्थपरकता को कितनी बारीकी से भेदा है। ठीक इसी तरह वरिष्ठ समालोचक रामचन्द्र तिवारी ने अपने आलेख ष्भक्ति आंदोलन की मूल प्रकृति और मीरा की कविताष् में मीरा को मध्यकालीन भक्त साधकों की परम्परा में देखते हुए मीरा की काव्य भूमि को अधिक महत्व दिया है। उनका मानना है कि मीरा का दर्द औरों से अलग है, वैसे ही उनकी काव्य-भूमि भी अन्यों से भिन्न है। दरबारी कविता का तो कहना ही क्या अन्य संत और भक्त कवियों से भी कुछ अलग दिखाई पड़ती हैं। न तो कबीर की भांति हिंदू-मुसलमान और पंडित-मुल्ला से समान दूरी बनाए रखने की प्रतिज्ञा से बंधी है, न जायसी की तरह पंडितों के पीछे चलने की इच्छा से। ...... उन्होंने किसी तरह के आवरण में अपने को छिपाया नहीं है। लोक-भूमि से जुड़कर अपनी भावनाओं का उद्रेक ही उन्हें प्रिय है। इस भूमि पर सबसे गाढ़ है नारी की विवषता का इजहार करती मीरा की मर्म-पीड़ा।

    पुस्तक में डॉ. विश्वनाथ  त्रिपाठी ने वर्ण  व्यवस्था, नारी और भक्ति आंदोलन, मैनेजर पाण्डेय ने मीरा  की कविता और मुक्ति की चेतना तथा गोपेश्वर  सिंह ने मीरा  के काव्य का सामाजिक पहलू जैसे आलेखों में मीरा और भक्ति आंदोलन के संबंध में महत्वपूर्ण विचार दिये है। इसी कड़ी में मीरा को नये ढंग से देखने का प्रयास प्रो. शिव  कुमार मिश्र ने अपने आलेख  स्त्री  विमर्ष में मीरा में किया है। वे मुक्ति के सवाल पर अधिक जोर देते हैं और उनका मत है कि बंधनों से अपनी मुक्ति का आग्रह मीरा में जरूर है परंतु उस मुक्ति की आकांक्षा के तार - स्त्री-जाति की वैसी ही मुक्ति से सीधे नहीं जुड़ते। प्रो. मिश्र का निष्कर्ष है कि मीरा का अपने पक्ष में अनुकूलन करने का काम व्यवस्था ने खूब किया है तथापि मीरा ने अपने समय में अपनी सीमाओं में जो किया, बड़ा काम था। उनका महत्व इस बात में है कि मुक्ति के सपने का उन्होंने पराधीन की आँखों में जीवित रखा। इन्ही अर्थों में जितना कबीर हमारे समकालीन हैं, उतना ही मीरा। प्रो. रामबक्ष का आलेख मीरा  का मर्म बताता है कि मीरा की असली समस्या स्त्री के मूल अधिकार 400 साल पहले मांग लेना थी और इसी कारण उसे बावरी करार दिया गया। वे लिखते हैं ष्यदि मीरा की कविता को बारीकी से पढ़ा जाए तो हमें पता चलता है कि मीरा अपनी इन मांगों को कभी गंभीरता से नहीं लेती। यह उसकी चिंता नहीं है। उसका दर्द यह नहीं है। कौन विरोध कर रहा है ? कौन समर्थन कर रहा है ? कौन प्रेम के वशीभूत होकर समझा रहा है ? कौन मुझसे चिढ़ रहा है ? - यह महत्वपूर्ण नहीं है। मेरी सबसे बड़ी चिंता यह है कि कोई मेरे दर्द को समझ नहीं रहा है।
    पुस्तक में चर्चित कथाकार पंकज बिष्ट का यात्रा वृत्तांत विद्रोह की पगडंडी समूचे विमर्ष के मध्य एक भिन्न आस्वाद देता है। इसमें उन्होंने मेड़ता और चित्तौड़गढ़ की यात्राओं पर लिखते हुए मीरा की कविता और जीवन पर सहृदयता से विचार किया है। ठीक इसी तरह जैनेन्द्र कुमार के प्रसिद्ध उपन्यास सुनीता के हवाले से प्रो. नवल किषोर ने मीरा पर विचार किया है और वे आगे बढ़कर वर्षां तक जाते हैं - सुनीता अब वर्षा में कायान्तरित हो चुकी है। वह घर नहीं लौट रही, बाजार जा रही है क्योंकि उसे चांद चाहिए जो उसे वहीं मिलेगा। आसमानी चांद को पाने का सपना वह कभी का छोड़ चुकी है और धरती के आभासी चांद को दिलाने वाली ग्लेमर की चमकीली राह उसने अपना ली है। अब उसे मीरा के इन षब्दों से नहीं लौटाया जा सकता - 



पांच पहर धन्धे में बीते, तीन पहर रहे सोय।
माणस जनम अमोलक पायो, सोतै डार्यो खोय।।

    कहना न होगा कि यह पुस्तक मीरा को फिर से देखने, समझने और उनकी कविता का मूल्यांकन करने के लिए एक अवसर तो देती ही है। पुस्तक में शिवमंगल  सिंह सुमन, रमेश कुन्तल मेघ, जीवन सिंह, नन्द किशोर  आचार्य, अनामिका और रवि श्रीवास्तव के आलेख भी बेहद ध्यान से पढ़ने की अपेक्षा रखने वाले हैं। स्त्री विमर्श  के नये दौर में यह पुस्तक मीरा को पाठकों के बीच एक बार फिर ले आयी है। 


गजेन्द्र मीणा
शोध  छात्र, हिन्दी विभाग
मोहनलाल सुखाड़िया विश्वा विद्यालय , उदयपुर - 313001
मो. 09928131245


 









पुस्तक - मीरा एक पुनर्मूल्यांकन 
सम्पादक - पल्लव
9414732258
pallavkidak@gmail.com
आधार प्रकाशन , पंचकूला
मूल्य - 450 रुपये
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