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इन दिनों चर्चा में -1

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on मंगलवार, अगस्त 24, 2010 | मंगलवार, अगस्त 24, 2010






सबसे पहले तो चर्चा मंच के इस आन्दोलननुमा काम पर आप सभी पाठक साथियों और लेखक साथियों  को नमस्कार,आज मिले  इस दायित्व  को निभाने का एक सादगी भरा प्रयास कर रहा हूँ, जिसमें मैं कोशिश कर रहा हूँ कि आपको इस ब्लॉग्गिंग की दुनिया के कुछ ब्लॉग /वेबसाइट के बारे में अपने विचार रखते हुए उनकी हालिया प्रकाशित रचनाओं को प्रकाश में ला पाऊँ.


हिंदी पत्र -पत्रिकाओं की बढ़ती  हुई संख्या इस बात कि तरफ इशारा करती है कि हमारे देश में पाठकवर्ग बड़ी तेजी से बढ़ रहा है,ऐसे में ख़ास-ख़ास पत्रिकाओं की मोटी-मोटी जानकारी देने का काम इटारसी, मध्य प्रदेश के हमारे साथी अखिलेश शुक्ल  कर रहे हैं,जो ''कथा चक्र'' के नाम से ब्लॉग पर पत्रिकाओं का  समीक्षात्मक परिचय पोस्ट करते हैं. आप उन्हें लगातार पढ़ते हुए अपना  कुछ ज्ञान तो बढ़ा पायेंगे ही साथ ही बेमतलब के प्रकाशन सामग्री के इस युग में ख़ास की पहचान आसानी से कर पायंगे.अखिलेश पिछले पांच सालों से ''कथा चक्र'' नामक पत्रिका का सम्पादक का दायित्व  भी संभाले हुए हैं.यथासंभव कथाएँ,सस्मरण और रेखाचित्र लिखा करते हैं.उनकी नवीनतम समीक्षा यहाँ  पढी जा सकती है.




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दुसरे ब्लॉग की बात जहां  आपको मध्य प्रदेश के एक और युवा उपन्यासकार अशोक जमनानी और उनकी रचनाओं से मिलने का मौक़ा  मिलेगा. वे अभी तक  अपनी तीन किताबों(उपन्यास ) के कारण चर्चा में रहे है.वैसे लगातार कवितायें करते हैं. उनको ''अशोकनामा'' पर पढ़ा जाना चाहिए.हाल ही में उन्हें मध्य प्रदेश सरकार की साहित्य आकादेमी ने दुष्यंत कुमार सम्मान से नवाज़ा है.उनकी लिखी  एक कविता ''रास्ता'' आपको जरुर पसंद आयेगी.वैसे अशोक, होशंगाबाद जैसे आध्यात्मिक माहौल वाले शहर के वासी होने से इस वातावरण का पूरा असर उनकी रचनाओं में दिखाई पड़ता है.
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चर्चा के इस सफ़र में तीसरे भाग में एक बहुत सार्थक वेबसाइट है जिसका ज़िक्र करना ज़रूरी होता है वो है ''सृजनगाथा''.यहाँ सम्पादक और उनकी मंडली लगातार नहीं छाप करके बहुत ध्यान से और पूरी अर्थपूर्ण रचनाओं को जगह देते हैं.आप यथासंभव अगर ऐसी साईट को पढ़ते रहेंगे तो साहित्य और आप दोनों का भला होगा.खैर यहाँ आपको मूलरूप  से हिंदी साहित्य की रचनाएँ ,साक्षात्कार और रपटें पढ़ने को मिल जायेगी..वैसे  आज छपी एक बातचीत  जिसमें :-मैत्रेयी  पुष्पा से  रेयाज उल हक़ की बातचीत है.जरुर पढ़ें क्योंकि  ये समसामयिक भी और गरमागरम मुद्दा है''शीर्षक है'' 
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यहाँ मेरा मंतव्य एक ऐसे ब्लॉग से जो ब्लॉग्गिंग के क्षेत्र  में आर-पार आदमी का  है या उसे धाकड़  बल्लेबाज़ कहा जा सकता है,बेबाकी से लिखता है और वो भी बहुत गहरी  सोच  के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है,''गाहे-बगाहे'' नाम से इस ब्लॉग पर सप्ताह में शायद एक पोस्ट ही छपती है मगर बहुत लम्बी और मन में कुलबुलाहट छोड़ जाने वाली होती है . आज की चर्चा में अपने-आप में चर्चा का विषय बनी हुई फिल्म ''पीपली लाइव''  के बारे विनीत कुमार के विचार है.विनीत कुमार मीडिया के विद्यार्थी है और फिलहाल दिल्ली  में रहते हुए शोध कर रहे हैं.उनकी हालिया पोस्ट पीपली लाइवः चैनल की चंडूखाना संस्कृति पर बनी फिल्म 
बहुत विचारोतेजक है.पढ़ें और इस बेबाकी से लिखने वाले नव-युवक को भरपूर कमेन्ट 'कोम्प्लीमेंट दें.
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 फिल्मों पर समीक्षापरक  लेखन करने वाले हिंदी के एक बड़े साहित्यकार धीरेन्द्र आस्थाना भी इस चर्चा का भाग बन रहे  हैं,मेरे अभी तक के पढ़ने के जीवन में ये भी एक बड़े लेखक के रूप में गिने जा सके हैं,वे अपने ब्लॉग के साथ साथ लेखन यात्रा से साहित्य में बहुत अरसे से बने हुए हैं.आज उनकी हालिया रचित पोस्ट जिसमें फिर वही ''पीपली  लाइव'' फिल्म की समीक्षा है. जो वाकई तंत्र पर करारी चोट करती नज़र आती है. इस बात को धीरेन्द्र जी ने अपने ढंग से लिखा है. आप खुद पढेंगे ओ बेहतर होगा,इससे आपका भी एक विचार बनेगा क्योंकि  सामान्यतया कई बार विचार हमारे खुद के नहीं होकर दूजे के होते हैं, और अपना काम चलता रहता है. फिर काहे को पढ़ें. ये धारणा टूटे,इसी में सार्थकता और फ़ायदा है.उनके बारे जितना कहे थोड़ा है,फिर भी उन्हें यहाँ जाना जा सकता है.उनकी ताज़ा पोस्ट का लिंक ये है.
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रवि स्वर्णकार ,जो कि रावतभाटा ,चित्तौडगढ़ के रहने वाले हैं और आजीविका के तौर पर तो परमाणु बिजली विभाग में कार्यरत हैं मगर उनके हाथ के रेखाचित्र और कविताओं के पोस्टर बड़े लाजवाब होते हैं.ख़ास तौर पर वे कभी अपनी खुद की कविताओं के पोस्टर भी बनाते है और कभी कभी नामचीन लेखकों की रचनाओं के. यहाँ वे अपने ब्लॉग ''सृजन और सरोकार'' के ज़रिये उपस्थित हैं.जहां वे वक्त मिलने पर लिखते हैं.अभी हालिया पोस्ट जिसे लोगों ने सराहा भी है मगर एक बार से उसे पढ़ने की ज़रूरत अनुभव होती दिखी तो यहाँ लिंक दे रहा हूँ. इसे देख रवि जी को प्रेरित करें.उनसे जुड़ें वे बड़े सरल मना हैं.


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ये ब्लॉग/साईट बहुत जानी मानी है और लोग यहाँ तक पहुंचते भी है मगर एक बात तो कहनी पड़ेगी कि हिंदी युग्म  वाले साथी  बहुत मेहनत  के साथ इस काम को करते दिखें हैं.मुझे यहाँ जाना नहीं पड़ता क्योंकि वे अपनी पोस्ट मुझे ई-मेल से भेजते हैं,लेकिन यहाँ की साज-सज्जा के साथ ही प्रकाशित सामग्री भी बहुत उम्दा किस्म की रहती है.साहत्यिक समाचार हो तो ''हिंदी युग्म'' पर देखे जा सकते हैं,मगर ''आवाज़'' पर ऑडियो पोस्ट सुनने और उनकी स्क्रिप्ट पढ़ने को मिलती है.उनकी हालिया पोस्ट ''जब हुस्न-ए-इलाही बेपर्दा हुआ वी डी, ऋषि और नए गायक श्रीराम के रूबरू'' भी बड़ी ज्ञान बढ़ाने वाली है.
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आज की अंतिम चर्चा में याद आता है है सिनेमा को लेकर बहुत अच्छे से लेखन और समीक्षा करने वाले लोग कम ही हैं,ऐसे में हम राजश त्रिपाठी को याद करें जो (उत्तरप्रदेश के बांदा जिले के ग्राम जुगरेहली में जन्म। शिक्षा-दीक्षा उत्तरप्रदेश व कोलकाता में। तीन दशक से भी अधिक समय से पत्रकारिता में।शुरुआत आनंद बाजार प्रकाशन समूह के लोकप्रिय हिंदी सापताहिक ‘रविवार’ में उपसंपादक के रूप में। तत्पश्चात इंडियन एक्सप्रेस के हिंदी दौनिक ‘जनसत्ता’ के कोलकाता एडीशन में 10 साल तक उप संपादक रहे  हैं 
आजकल अपने ब्लॉग ''सिने जगत ''के जारी हिंदी सिनेमा के इतिहास के साथ-साथ उसके अतीत के पन्नों पर बखूबी लिखते हैं.झांकते है और पाठकों को लाभ देने के मकसद से काम करते दिखे हैं,हमें  कुछ वक्त उन्हें भी देना चाहिए.उनकी एक ताज़ा पोस्ट जिसमें ''इस तरह साकार हुआ हिंदुस्तानी फिल्मों का सपना'' शीर्षक से लिखा गया है.उनके लिखने का अपना अलग ढंग है न की ढर्रा.
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आज की चर्चा यही पूरी होती है.अब  अनुमति दीजिएगा. कृपया पढ़ते रहिए,और बाद में फिर लिखते रहिए,इसी भावना
 के साथ नमस्कार


सादर
अपनी माटी सम्पादक 
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