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कविता:-''औरत''

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on गुरुवार, अगस्त 19, 2010 | गुरुवार, अगस्त 19, 2010


(आधी दुनिया के हालात पर मेरी कवितानुमा अभिव्यक्ति )
चित्र-साभार





















मांगती न बोलती 
जागती दिन-रात है
रोकती न चिड़ती
सादगी की जात है
नोचती न पूछती
पर सोचती हर बात है
सिंचती वो रोपती
जिन्दगी के बाग़ को
जोड़ती वो मोड़ती
टूटती हर बात को
लिपती और ढ़ोरती
कहती हर दीवार है
अलिखे को बांचती वो
लिखे का मूल सार है
बांटती और जापती
खुशी के हर राग को
ढूँढती और  ढांकती
पीड़ के विलाप को
नाचती वो कूदती
अवसरों पर बोलती
चुप्पियों को चुनती
वो मांगती न बोलती
मिले हुए को भोगती
जागती दिन-रात है



रचना:-माणिक
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2 टिप्‍पणियां:

  1. मि‍ले हुए को भोगती
    जागती दि‍न रात है
    बड़ी ही दि‍लकश्‍ा पंक्‍ि‍तयां हैं।


    हमारी नवीनतम नज्‍म के लि‍ये पधारें
    http://rajey.blogspot.com/2010/08/blog-post_19.html#links

    उत्तर देंहटाएं
  2. हर पंक्ति अर्थपूर्ण है। आपकी
    गहरी सोच को बयाँ करती है.....
    दिल को छूने वाले भावों की अभिव्यक्ति के
    लिए..... बधाई.

    उत्तर देंहटाएं

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