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अनुभव:-''बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे ''

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on बुधवार, अगस्त 18, 2010 | बुधवार, अगस्त 18, 2010

कुछ वर्ष पूर्व मेरे नगर के एक स्कूल दुर्गा देवी शर्मा विद्यालय ने स्वतंत्रता दिवस पर मुझे मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया। तब मैंने उनसे कहा था कि मैं बच्चों को भाषण नहीं दूंगा बल्कि एक कहानी सुनाउंगा। उन्होंने उदारता पूर्वक मेरी बात मानी और बच्चों को कहानी इतनी पसंद आयी कि तब से वो प्रति वर्ष स्वतंत्रा दिवस पर मुझे कहानी सुनाने के लिए बुलाते हैं। पहली बार मुझे थोड़ा सा संकोच था लेकिन अब तो बच्चों से मेरी दोस्ती हो गयी है और वो भी बहुत प्यार के साथ मुझसे कहानी सुनते हैं। मैंने महसूस किया है कि बड़ों को भाषण देने से अधिक सुखद अनुभव है- बच्चों को कहानी सुनाना। 

आज़ादी के 63 बरस बाद हम सब यह महसूस कर रहे हैं.कि अभी भी पूरी आज़ादी हमें नहीं मिली है लेकिन ये हमारी खुशकिस्मती है कि हमें बोलने और लिखने की पूरी आज़ादी है और एक साहित्यकार के लिए इस आज़ादी का मतलब है उसकी आवाज़ की आज़ादी जो उसके लिए शायद सबसे ज्यादा ज़रूरी है। मैं अपने देश की इस आज़ादी को सलाम करता हंू। आज फ़ैज़ अहमद फै़ज़ की बहुचर्चित नज़्म बहुत याद आ रही है आप भी पढ़िए -

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बां अब तक तेरी है
तेरी सुतवां ज़िस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है

देख कि आहंगर कि दुकां में
तुन्द हैं शोले सुर्ख है आहन
खुलने लगे कुफ़लों के दहाने
फैला हर ज़ंजीर का दामन

बोल कि थोड़ा वक्त बहुत है
जिस्म ओ ज़बां की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना वो कह ले

फ़ैज़ अहमद फै़ज़








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