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मौत का कौन सा रंग होता है....???

Written By राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) on शुक्रवार, अगस्त 13, 2010 | शुक्रवार, अगस्त 13, 2010

जब कोई व्यक्ति-विशेष अपने पास नहीं होता 
तो समय का रंग इतना उदास क्यूँ हो जाता है ?
और समूचे दिन का रंग भी बदरंग क्यूँ....?
इसका अर्थ तो शायद यह हुआ कि रंग,
कहीं बाहर नहीं होते,हमारे भीतर ही होते हैं !
जो किसी की आमद से उभरतें हैं 
और किसी के जाने से पिघल जाया करते हैं...जैसे-
लाल रंग तभी तो लाल लग सकता है....
जब हो हमारे भीतर बेपनाह मोहब्बत....
और सफ़ेद रंग....जैसे कुछ हो ही नहीं....
और हरा....हमारे भीतर बहार हो जैसे...
और बैंगनी...गोया कितनी ऐश चाहते हों हम ?
रंगों का अर्थ हमारे ही भीतर का घटनाक्रम है कोई 
बाहर....??सब यों ही है,अगर भीतर कुछ नहीं...!
किन्तु यह जो काला रंग है,इसका मैं आखिर क्या करूँ,
मैं किसी को बचा नहीं सकता और 
किसी मरे हुए को वापस ला नहीं सकता...
और जब काला रंग फ़ैल रहा हो हमारे आसपास,
तब किसी और रंग का खिलौना काम ही कहाँ आता है,
मैंने तो फिर भी संभाल रखें हैं कई रंगों के खिलौने....
और तरह-तरह के रंगों की पोटली भी कई....
मगर उनका मैं क्या करूँ....
जिनका यह खिलौना एक ही था....
और रंग.....!!
उन्होंने तो अपने सारे रंग भी....
उसी एक खिलौने में उड़ेल दिए थे...!!!

रचना-भूतनाथ 
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