अशोक जमनानी की कविता और विचार '' सांप'' - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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अशोक जमनानी की कविता और विचार '' सांप''





आज नाग पंचमी है। हमारे देश के छोटे-छोटे शहरों कस्बों और गांवों में आज भी संपेरे सांपों को घर-घर लेकर जाते हैं। कानूनी प्रतिबंध के बावजूद बहुत सीमित रूप में यह प्रथा आज भी जारी है। छोटे शहर में रहने के कारण सांप-संपेरों से हर नाग पंचमी पर मिलने का मौका मिलता है। आश्चर्य होता है कि कई संपेरे अपने सांपों से बहुत प्रेम करते हैं। आज खींचे चित्रों के साथ एक छोटी सी कविता पेश है। शायद आपको अच्छी लगे ....................

सांप! सांप!! सांप!!!
डर लगता है
डस न ले कहीं
इंसान!इंसान!! इंसान!!!
डर लगता है
................. कहीं

                                  

- अशोक जमनानी

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