Latest Article :
Home » , , , , , , , , » राजेश त्रिपाठी का आलेख:-'आखिर सुनी तो गयी कश्मीर की कराह!'

राजेश त्रिपाठी का आलेख:-'आखिर सुनी तो गयी कश्मीर की कराह!'

Written By Rajesh Tripathi on मंगलवार, सितंबर 28, 2010 | मंगलवार, सितंबर 28, 2010

वर्षों से कराहते, उपेक्षा का शिकार बने और दूसरों के उकसावे में हिंसा से उबलते कश्मीर की कराह देर से ही सही केंद्र ने सुनी तो। केंद्र का कश्मीर के घावों पर मरहम लगाने और उसे मदद देने की घोषणा सराहनीय है। देश की राजनीति का एक शुभ  संकेत है कि धुर वामपंथी नेता सीताराम येचुरी तक ने केंद्र की इस कदम की प्रशंसा की है। दूसरी विपक्षी पार्टियों ने भी इस सार्थक पहली को सराहा है। काश यह प्रयास कुछ पहले हो जाते तो शायद बहुत सी अमूल्य जिंदगियां कश्मीर में चल रहे आंदोलन का शिकार होने से बच जातीं। खैर देर आयद, दुरुस्त आयद। केंद्र ने अपने एक ऐसे राज्य की फिक्र तो की जिस पर दुश्मनों की नजर गड़ी है और जो उसे अशांत-अस्थिर कर देश से काटने का कुचक्र वर्षों से रच रहे हैं। अब यह कश्मीरियों पर है कि वे सामने आये इस वक्त और मौके को गंवाए बगैर अपनी उस जन्नत को संवारने में जुट जायें, जो वर्षों से उदास, बेजान और बेरौनक पड़ी है। माना कि उनके जख्म गहरे हैं लेकिन अब सब्र करने और बीती को भुला नये सिरे से जिंदगी संवारने के अलावा और कोई चारा नहीं है। उन्हें याद रखना चाहिए कि पड़ोस में बैठे लोग उनके किसी काम नहीं आयेंगे। वे उन्हें उकसा कर  उनकी जिंदगी ही तबाह करेंगे। जिन लोगों ने हथियार थामे, अपना घरबार तथाकथित जिहाद के लिए छोड़ गये वे अपनों से महरूम हो जंगल-जंगल भटक रहे हैं। काश उनकी भी अपनी एक खुशहाल जिंदगी होती। वे भी मुल्क की मुख्यधारा से जुड़ते और सामने आने वाली सहूलियतों का फायदा उठा अपनों के साथ जीते। अपने माता-पिता की बांह थामते उनका सहारा बनते।


 यह सच है कि कश्मीर में कहीं तो कुछ गलत हुआ है जिससे वे किशोर और युवक जिनका वक्त स्कूल-कालेजों में किताबों के साथ बीतना चाहिए हाथ में पत्थर उठा पुलिस-सुरक्षाकर्मियों पर हमाला करने को मजबूर हो गये हैं। हम नहीं जानते कि गलती कहां और क्यों हुई लेकिन इतना जानते हैं कि इससे हमारे पड़ोसी देश को कश्मीर के युवा वर्ग को उकसाने और कश्मीर को फिर एक समस्याग्रस्त राज्य बताने का और मौका मिल गया। वैसे तो पाकिस्तान हमेशा कश्मीर में तथाकथित जिहाद को समर्थन देने का दावा करता रहा है। वह अंतरराष्ट्रीय मंच तक में यह बात कहता रहा है कि कश्मीर के लोगों को जनमत संग्रह द्वारा यह तय करने का अधिकार दिया जाना चाहिए कि वे हिंदुस्तान में रहना चाहते हैं या नहीं। हमारे देश की सबसे बड़ी कूटनीतिक कमजोरी यह है कि हम कभी उसके इन तर्कों को मुंहतोड़ जवाब नहीं दे पाये और उसका मन बढ़ता गया। शुक्र है कि हाल ही हमारे विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने पहली बार ललकार कर एक बात सच-सच और साफ-साफ ढंग से पाकिस्तान से कह दी है। कृष्णा ने साफ कहा कि कश्मीर की कोई समस्या नहीं है अगर समस्या है तो वह कश्मीर जो पाकिस्तान के कब्जे में है। वह हिंदुस्तान का है। हमें गर्व है कि हमारे विदेश मंत्री ने यह बात कही तो। कश्मीर में अलगाववाद को उकसाने के पीछे पाकिस्तान की सिर्फ और सिर्फ मंशा भारत को तबाह और अस्थिर रखने की है। कश्मीर में शांति और विकास पाकिस्तान के हित में नहीं है। अगर वहां शांति स्थापित हो जाती है तो फिर वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बांग नहीं लगा सकेगा कि भारत में अल्पसंख्यक वर्ग उपेक्षित है। अब यह कश्मीर के युवकों और वहां के बुजुर्गों पर है कि उन्हें विकास और शांति की राह चुननी है या किसी के उकसावे पर अपनी तबाह हुई जिंदगी को और तबाह करना है।
      

हम मानते हैं कि कश्मीर में कहीं तो कुछ गड़बड़ हुआ है। माना कि आंतकवाद, अलगाववाद वहां वर्षों से था और यह पूरी तरह स्पष्ट है कि वह पाकिस्तान के उकसावे पर फूल-फल रहा है लेकिन अब जब किशोरों और युवकों के हाथों में पत्थर और दिलों में नफरत आ गयी तो लगता है कि कहीं कुछ ज्यादा ही गड़बड़ है। इस पीढ़ी से मुल्क को बहुत उम्मीदें हैं, कश्मीर में विकास का रथ यही पीढ़ी आगे ले जायेगी बस जरूरत है इसके हाथों में पत्थरों की जगह कलम और औजार देने की। केंद्र सरकार की कश्मीर के लिए राहत पैकेज की घोषणा शायद विकास के दिशा में ब़ढ़ा एक सार्थक कदम है जिसका इस्तेकबाल कश्मीरियों को भी करना चाहिए और आगे बढ़ कर इस मौके का फायदा उठाना चाहिए। पिछले कुछ महीनों या सालों में जिन बेगुनाहों को कश्मीर ने खोया है उन्हें एक तरह  से देश ने भी खोया है और उसकी कसक देश के हर दिल में है। उन्हें लौटाया नहीं जा सकता, जिनके वे अपने हैं उनके जख्मों को भी कोई मरहम, कोई मदद भर नहीं सकती लेकिन अब संभलने, जिंदगी को नये ढंग से संवारने के अलावा कोई चारा नहीं है। इस हकीकत को समझने और कश्मीर को गर्त में जाने की कगार से वापस ला विकास की राह की ओर मोड़ना बेहद जरूरी है। कश्मीरियों के साथ अगर कोई ज्यादतियां हुई हैं तो केंद्र को चाहिए कि वह यह निश्चित करे कि ऐसा फिर दोहराया न जाये। वहां ऐसे लोगों के हाथ में सुरक्षा का भार सौंपा जाये जो स्थानीय हों, वहां के भूगोल और लोगों को दिलों, उनकी भावनाओं से परिचित हों और मानवीय भावनाओं के साथ काम करें। कहा यह जा सकता है कि अगर सामने कोई पत्थर या हथियार लिये खड़ा हो तो फिर कोई क्या करे, समझाने से न माने तो सख्ती तो करनी ही होगी। बात सच है लेकिन इसी सख्ती ने आज यह स्थिति ला दी है  कि हम पहले आतंकवादियों से लड़ रहे थे आज अपने घर के बच्चों से हमें लड़ना पड़ रहा है। कश्मीर में अभी भी उदारपंथियों की कमी नहीं है, केंद्र को चाहिए कि उन्हें विश्वास में ले और उनके जरिये किशोरों और युवकों को हिंसा छोड़ विकास के काम में मदद देने की राह में मोड़े। उस कश्मीर में जहां ‘गो बैक इंडिया’ के नारे सड़कों और दुकानों के बंद दरवाजों पर लिखे जा रहे हों वहां शांति-सुलह की बात करना नामुमकिन नहीं तो कठिन, बहुत कठिन तो है ही। ये नारे देश की सत्ता और राज्य प्रशासन पर एक तमाचे की तरह लगते हैं। जाहिर है यह पड़ोसी देश के उकसावे पर हो रहा है जो कश्मीर के लोगो को भारत से आजादी का दिवास्वप्न दिखा कर बहका रहा है। उस पाकिस्तान की हकीकत पूरी दुनिया के सामने साफ है जहां हिंदुस्तान से गये लोग मुहाजिर कहे जाते हैं। उनसे कैसा सलूक होता है यह किसी से छिपा नहीं। फिर जो देश खुद आतंकवाद की आग में जल रहा है, इसके कई प्रांत अशांत हैं और अलकायदा या तालिबान की दहशत के साये में कराह रहे हैं वह किसी की क्या मदद करेगा और क्या आजादी दिलायेगा। पहले खुद वह तो आतंकवाद से आजाद हो ले। वह आंतकवाद जिससे लड़ते हुए बहुराष्ट्रीय नाटो सेनाओं तक के पसीने छूट रहे हैं। पाकिस्तान चाहता है कि भारत भी तबाह रहे, वहां शांति-स्थिरता का राज न हो जिससे उसे वहां आतंकवादियों की घुसपैठ कराने और कश्मीर के युवकों को तथाकथित जेहाद या आजादी की जंग के लिए उकसाने और अपनी ही सरकार के खिलाफ हथियार उठाने, गणतंत्र को चुनौती देने के लिए बहका सके। अफसोस कि कुछ लोग उसके बहकावे और छलावे में आ भी रहे हैं और अपने ही भाइयों का खून कर रहे हैं।
      
अगर आज कश्मीर की केसर क्यारी उदास है, डल झील के शिकारे सुनसान हैं और जमीन की इस जन्नत की अवाम तबाह है तो इसमें बहुत कुछ पाकिस्तान का हाथ ही नहीं दिमाग और वहां की सोची-समझी रणनीति शामिल है। वह चाहता है कि कश्मीर का जो हिस्सा भारत में है वहां के युवकों को आजादी का लालच देकर उनके अपने ही देश के खिलाफ उकसाओ और वहां अशांति, अस्थिरता फैलाओ जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह कहने और स्थापित करने का मौका मिल जाये कि कश्मीर में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। मुसलमान असुरक्षित हैं और कश्मीर के लोगों को खुद मुख्तारी यानी जनमत संग्रह का अधिकार मिलना चाहिए। कश्मीरी खुद तय करें कि उनको क्या चाहिए और उन्हें हिंदुस्तान के साथ रहना है या नहीं। कश्मीर में अशांति पाकिस्तान के अपने हित में है। उसे ऐसे में भारत में आतंकियों की घुसपैठ कराने में आसानी होगी और कश्मीर के मासूम युवक अशांति और अस्थिरता से तंग आकर बगावत या आतंक की अंधेरी राह पकड़ सकते हैं। कश्मीर के हर नागरिक का यह फर्ज है कि पाकिस्तान की इस नापाक और बेमतलब मंशा को कुचल दें और अपनी जन्नत को फिर से सजा दें, वहां शांति और सौहार्द का वातावरण लायें। ऐसा उनके खुद के हित में तो है ही देश के भी हित में है।
     
केंद्र सरकार ने कश्मीर के लिए राहत की जो योजना घोषित की है उस पर भी ईमानदारी और व्यवस्थित ढंग से काम होना चाहिए। कहीं यह कागज पर ही सिमट कर न रह जाये। संभव है घाटी के लोगों पर प्रशासन की ओर से ज्यादती हुई हो, अब इस दिशा में भी सोच-समझ कर कदम उठाने की जरुरत है। जहां काम हलकी-फुलकी झिड़क से चल जाये, वहां गोलियां न चलायी जायें। पत्थर हाथों में लिए युवकों और आतंकवादियों में फर्क होता है, इसे भी समझने की जरूरत है। दोनों से निपटने का तरीका भी अलग होना चाहिए। गृहमंत्री पी. चिदंबरम का यह आदेश कि पिछले जून माह से अब तक पत्थरबाजी जैसी छोटी-मोटी वारदातों के लिए जो युवक या लोग गिरफ्तार हुए हैं उनको छोड़ दिया जाना चाहिए, अपने आप में एक सार्थक और बेहतर पहल है। इस पर तत्काल अमल होना चाहिए और कश्मीर के युवकों को भी चाहिए कि वे अब पत्थर छोड़ें और वापस किताबें पकड़ कालेज जायें, अपनी तकदीर संवारें। यह वक्त का तकाजा है और उनकी अपनी जिंदगी के लिए भी यही सही है। अभी वे बौद्धिक रूप से परिपक्व नहीं हो पाये इसीलिए लोग उन्हें बहका पा रहे हैं और वे आग लगाते वक्त यह भी नहीं सोचते कि वे अपने किसी भाई को ही बेघर करने का कुकर्म करने जा रहे हैं। अब उन्हें इस अंधी गली से उजाले की ओर मुड़ना है और होना यह चाहिए कि तरक्की की इस राह में सरकारी नीतियां और उनकी मदद उनके लिए मशाल का काम करें। घाटी में 100 दिन बाद स्कूल खुले, बस्ते लादे मुसकराते युवक-युवतियों की अखबारों में छपी तस्वीरों ने नयी उम्मीद जगायी है। लगा मरघट के से सन्नाटे में डूबी घाटी फिर लीक पर लौटने को है। खुदा करे यह वापस अपनी रौनक पा लें, गोलियों की खौफनाक गूंज थमे, पत्थरबाजी बंद हो और सब कुछ शांति और स्थिरत की ओर बढ़े।
     
कश्मीर अपनी मिली-जुली संस्कृतियों के लिए सदियों से मशहूर रहा है। यहां मुसलमानों और कश्मीरी पंड़ितों का सह अस्तित्व दुनिया में एक बेहतरीन मिसाल रहा है। इसमें आतंकवाद की नजर लग गयी और कश्मीरियों को जो मुसलमान भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिला कर कश्मीर के विकास में योगदान कर रहे थे, अपने घर से बेघर हो शरणार्थियों का जीवन जीने को मजबूर होना पड़ा। कश्मीर में शांति-स्थिरता लाना है और इसे वापस विकास की धारा में लाना है तो कश्मीरी  पंडि़तों को की भी घर वापसी जरूरी है। घाटी में ऐसी स्थितियां लानी चाहिए जिससे सब साथ रह सकें और पड़ोसी देश से प्रायोजित आतंकवाद से मिल कर लोहा ले सकें। पाकिस्तान कश्मीर के लिए जिहाद झेड़ने की बात करता है, कश्मीर में जिहाद जरूरी है लेकिन वह आतंकवाद के खिलाफ होना चाहिए अपनी ही सरकार, अपने ही लोगों या मुल्क के खिलाफ नहीं। दिल्ली और कश्मीर में सत्ता में बैठे लोगों को भी यह समझ लेना चाहिए कि अपने लोगों को गोली और लाठी के बल पर नहीं दबाया या सुधारा जा सकता । जरूरत इस बात की है कि उनका विश्वास जीता जाये, उनके दिलों को जीता जाये और उनके बहके हुए कदमों को सही राह में मोड़ने के लिए माहौल तैयार किया जाये।
     
कश्मीर में डल झील के शिकारे अरसे से सुनसान हैं। उनके सहारे जिनकी जिंदगी चलती है उनके चेहरे मायूस हैं। आतंकवाद और अशांति के चलते देशी-विदेशी पर्यटकों के कदम कश्मीर की उस हसीन वादी से रूठ गये हैं जहां कभी पर्यटकों का तांता लगा रहता था। नवविवाहित जोड़े वहां हनीमून मनाने जाते और बर्फ के गोले एक-दूसरे पर फेंक खुश होते, उनके चेहरों पर खुशियों के फूल मुसकाते और जिंदगी की वह हसीन तस्वीर वे हमेशा के लिए संजो कर रख लेते। दहशत और  अशांति के माहौल के चलते कश्मीर अपने इन अन्नदाताओं से महरूम हो गया है और पर्यटन पर आधारित वहां की जिंदगी भी बदहाल हो गयी है। कश्मीर के केसर क्यारियां उदास हैं, खिलखिलाती सी फूलों से भरी वादियों में भी मायूसी छा गयी है। केंद्र ने एक पहल की है जिससे घाटी में माहौल सुलझे। गेंद अब कश्मीरियों के पाले में है उन्हें खुद तय करना है कि उन्हें अमन और तरक्की चाहिए या आंतकवाद, अलगाववाद की अंधी गली में घुटती, सिसकती, तडपती जिंदगी। हम तो उस दिन के मुंतजर हैं जब घाटी फिर से खुशहाल होगी, वहां आतंकवाद खत्म होगा, वहां के युवकों को रोजगार मिलेगा और वे अपने सूबे की तरक्की में अपना बहुमूल्य योगदान देंगे। केंद्र को भी चाहिए कि वह कश्मीर को मुख्य धारा से जोड़े, वहां बाहरी लोगों को उद्योग लगाने की इजाजत दे। वहां औद्योगिक विकास होगा तो वहां के युवकों को रोजी-रोटी के लिए हजारों किलोमीटर की यात्रा कर शाल बेचने जाने को मजबूर नहीं होना होगा। कश्मीर तरक्की करे, वहां अमनो अमान हो, धरती की यह जन्नत, जन्नत ही बनी रहे, वहां अब किसी मां की गोद न उजड़े, किसी सुहागन की जिंदगी वीरान न हो, कश्मीर को दहशतगर्दी से मुक्ति मिले यह हर सच्चा हिंदुस्तानी चाहता है। सबका सपना है कश्मीर अपना है, अपना ही रहे, खुशहाल रहे, मालामाल रहे।
Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template