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सार्थक ब्लॉग:-''आरम्भ''

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, सितंबर 14, 2010 | मंगलवार, सितंबर 14, 2010








पाठक साथियों ,नमस्कार
हम कोशिश करेंगे कि महीने में ठीक-ठाक जांच-पड़ताल के बाद ब्लॉग्गिंग जगत में लिखने वाले चुनिन्दा साथियों की प्रस्तुती यहाँ आप तक पहुंचाते रहें,इस कॉलम की शुरुआत आज कर रहे हैं,हालांकि ये  कॉलम अभी तो अनियतकालीन रूप में होगा,यथासंभव इसे सतत बनायेंगे.वैसे ब्लॉग जगत में बढ़ने वाले कुकुर्मुत्ति ब्लोगों में सार्थकता  के साथ खड़े ब्लोगों को ढूँढना भी बहुत मुश्किल हो गया है. जहां लोग ब्लोगों को पढ़ना भी दुरूह समझते रहे हैं ,कुछ देर रुके की चल दिए.वहाँ रूक कर टिप्पणी देने का तो सवाल ही नहीं उठता है.

ब्लॉग जगत में पोस्ट से ज्यादा टिप्पणी को मान दिया जाता है. और हाँ टिप्पणियाँ मिलनसारिता से मिला करते हिया.तुम मुझे दो-मैं तुम्हे दूंगा.पूरा आपसी घठजोड़ ,मगर कुछ लोग अपना काम बहुत  अच्छे से करते रहे हैं,उन्हें कभी भी प्रत्युत्तर में मिलने वाले विचारों का इतना इंतज़ार नहीं रहा.खैर आज हम यहाँ ''आरम्भ'' ब्लॉग की चर्चा कर रहे हिं,जहां कुछ नयापन लिए हुए लेखन पढ़ा जा सकता है.इस ब्लॉग के बहाने यहाँ एक हालिया पोस्ट भी प्रस्तुत है जो हमारी लोक संस्कृति की गाथा कहती है.ख़ास तौर पर ये ब्लॉग अपने इलाके की संकृति को देश में प्रचारित-प्रसारित करने की भावना के साथ संचालित है.इस यात्रा में संस्कृतिकर्मी रचनाकार संजीव तिवारी कई सम्मान भी प्राप्त कर चुके हैं.सन दो हज़ार सात से ही बने हुए इस ब्लॉग पर महीने में औसतन दस पोस्ट आ जाती है.ब्लॉग की पोस्ट को घर बैठे मंगाने वाले लोगों की संख्या भी दो सौ पार पहुँच गई है.संजीव और उनकी पूरी टीम को हमारी शुभकामनाएँ.उनकी यात्रा और प्रगति करें.-सम्पादक 
हालिया पोस्ट :-




पिछले दिनों इंदिरा गांधी राष्‍ट्रीय मानव संग्रहालय द्वारा इंटरनेशनल इंडीजिनस डे के अवसर पर  कर्नाटक के शहर मैसूर में स्थित देश के प्रख्‍यात प्रेक्षागृह एवं आर्ट गैलरी जगमोहन पैलेस में 10 व 11 अगस्‍त को आयोजित इंटरनेशनल इंडीजिनस फेस्टिवल में छत्‍तीसगढ़ के पारंपरिक जनजातीय नृत्‍यों की श्रृंखला जब बस्तर बैंड के रूप में भव्‍य नागरी मंच में प्रस्‍तुत हुआ तो संपूर्ण विश्‍व से आये कला प्रेमी उस प्रदर्शन को देखकर भावविभोर हो उठे। मैसूर के जगमोहन पैलेस के प्रेक्षागृह में बस्‍तर बैंड के कलाकारों ने लगातार दो दिनों तक ऐसा समां बांधा कि रंगायन एवं निरंतर फाउंडेशन जैसे प्रसिद्ध कला केंद्र ने उन्हें 13 अगस्‍त को पुन: प्रस्तुति के लिए बुलाया। इनकी प्रस्तुति की शिखर सम्मान प्राप्त बेलगूर मंडावी ने भी जमकर सराहना की और इस आयोजन के समाचार अंग्रेजी समाचार पत्रों के पन्‍नो पर भी छाए रहे।। तीन साल पहले सिक्किम के जोरथांग माघी मेले में पहली बार किसी बड़े मंच पर बस्तर बैंड को मौका मिला था। तब किसी ने नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी इसके कलाकार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर धाक जमाएंगे।
इस प्रस्‍तुति में बस्‍तर के लगभग सभी समुदाय के प्रतिनिधि कलाकार हैं. कलाकारों के इस दल में माया लक्ष्‍मी सोरी, इडमें ताती, बुधराम सोरी, विनोद सोरी, कोसादेवा, रूपसाय सलाम, कज्‍जु राम, चंदेर सलाम, दसरू कोर्राम, संताय दुग्‍गा, जुगो सलाम, नीलूराम बघेल, श्रीनाथ नाग, कमल सिंग बघेल, समारू राम नाग, रामलाल कश्‍यप, विक्रम यादव, सुकीबाई बघेल, रंगबती बघेल, बाबूलाल बघेल, लच्‍छू राम, लखेश्‍वर खुदराम, बाबूलाल राजा मुरिया, सहादुर नाग, फागुराम, पुरषोत्‍तम चन्‍द्राकर, अनूप रंजन आदि शामिल हैं. परिकल्‍पना, संयोजन एवं निर्देशन अनूप रंजन पाण्‍डेय का है
बस्‍तर बैंड मूलत: बस्‍तर के आदिम जनजातियों की सांगीतिक प्रस्‍तुति है जिसमें आदिम जनजातियों के संगीत व गीतों के ऐसे नाद की प्रधानता है जो वेद की ध्‍वनि 'चैंन्टिग' का आभास कराता है। इस नाद में गाथा, आलाप, गान और नृत्य भी है, जिसमें बस्‍तर आदिवासियों के आदि देव लिंगों के 18 वाद्य सहित लगभग 40 से ज्यादा परंपरागत वाद्य शामिल है। बैंड समूह के प्रत्‍येक कलाकार तीन से चार वाद्य एक साथ बजाने में पारंगत है। तार से बने वाद्य, फूंक कर मुह से बजाने वाले वाद्य और हाथ व लकड़ी के थाप से बजने वाले ढोल वाद्यों और मौखिक ध्‍वनियों से कलाकार मिला-जुला जादुई प्रभाव पैदा करते हैं। इसकी प्रस्‍तुति में ऐसा आभास होता है कि हम हजारो वर्ष पीछे आदिम युग में आ गए हों। बस्‍तर के आदिम जनजाति घोटूल मूरिया और दंडामी माड़िया दोनों की परंपराओं में विभिन्‍नतायें हैं एवं उनके वाद्य यंत्र भी भिन्न हैं। बस्तर बैंड ने इन दोनों के आदिम जीवन के सारे रंगों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की है। इन जनजातियों के अतिरिक्‍त बस्‍तर के कई अन्‍य जनजातियों के लोगों को इसमें शामिल करके परिधान, संस्कार, अनुष्ठान, आदिवासी देवताओं की गाथा आदि की मिली-जुली संगीतमय अभिव्यक्ति दी गई है। यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि अनूप का यह बैंड, बस्त‍र के लोक एवं पारंपरिक जीवन का सांगीतिक स्वर है. इसमें सदियों से चली आ रही आदिम संस्कृ‍ति एवं संगीत की अनुगूंज है। बस्तर बैण्ड में समूचे बस्तरिया समुदाय के विलुप्त होते पारंपरिक, प्रतिनि‍धि लोक एवं आदिम वाद्यों की सामूहिक सांगीतिक अभिव्यक्ति है। 
बस्तर में आदिवासी लिंगो देव को अपना संगीत गुरू मानते हैं. मान्यता यह भी है कि लिंगो देव ने ही इन वाद्यों की रचना की थी. 'लिंगो पाटा' या लिंगो पेन यानी लिंगो देव के गीत या गाथा में उनके द्वारा बजाए जाने वाले विभिन्न वाद्यों का वर्णन मिलता है। यद्यपि वर्णन में प्रयुक्त कुछेक वाद्य लगभग विलुप्त हो चुके हैं, बावजूद इसके बस्तर बैण्ड के परिकल्‍पना को साकार करने वाले अनूप के प्रयासों से विलुप्तप्राय: इन वाद्यों को सहेजकर उन्हें पुन: प्रस्तुत किया जा रहा है। नाट्य व कला समीक्षक राजेश गनोदवाले जी बस्‍तर बैंड पर लिखते हुए बड़ी संजीदगी से कहते हैं कि 'अनूप नें प्रकृति के उस आवाज को सम्‍हालने की कमान उठा ली है जो आतंक मचाते आधुनिक संगीत और विकास के परिणाम स्‍वरूप बिगड़ने वाले सामाजिक असंतुलन की भेट चढ़ गया।' उनका कहना सर्वथा उचित प्रतीत होता है क्‍योंकि वर्तमान परिस्थिति में बिखर रहे सामाजिक ताने बाने को भाषा, बोली सहित असली जातीय सुगंध की रक्षा करने वाली कम्‍यूनिटी फीलिंग जागृत करने में ऐसे सांगीतिक प्रस्‍तुति की अहम भूमिका है।
बस्तर बैण्ड में कोइतोर या कोया समाज जिनमें मुरिया, दण्डामी माडिया, धुरवा, दोरला, मुण्डा्, माहरा, गदबा, भतरा, लोहरा, परजा, मिरगिन, हलबा आदि तथा अन्य कोया समाज के पारंपरिक एवं संस्का्रों में प्रयुक्त, वाद्य संगीत, सामूहिक आलाप-गान को प्रस्तुत किया जा रहा है. बस्तर बैण्ड के वाद्यों में माडिया ढोल, तिरडुडी़, अकुम, तोडी़, तोरम, मोहिर, देव मोहिर, नंगूरा, तुड़बुडी़, कुण्डीडड़, धुरवा ढोल, डण्डार ढोल, गोती बाजा, मुण्डा बाजा, नरपराय, गुटापराय, मांदरी, मिरगीन ढोल, हुलकी मांदरी, कच टेहण्डोर, पक टेहण्डोर, उजीर, सुलुड, बांस, चरहे, पेन ढोल, ढुसीर, कीकीड, चरहे, टुडरा, कोन्डोंडका, हिरनांग, झींटी, चिटकुल, किरकीचा, डन्डार, धनकुल बाजा, तुपकी, सियाडी बाजा, वेद्दुर, गोगा ढोल आदि प्रमुख हैं. 
बस्‍तर बैंड के संयोजन, निर्देशन और परिकल्पना रंगकर्मी एवं लोककलाकार अनूपरंजन पांडेय कहते हैं कि हमारा प्रयास इस बैंड के रूप में बस्तर की अलग-अलग बोलियों और प्रथाओं को एक मंच पर लाने का है। आगे वे सहजता से स्‍वीकार करते हुए कहते हैं कि वे स्‍वयं इन कलाकारों से निरंतर सीख रहे हैं, विलुप्त होते आदिवासी वाद्य यंत्रों के संग्रहण के जुनून ने कब बस्तर बैंड की शक्ल अख्तियार कर ली पता ही नहीं चला। इस खर्चीले, श्रम समय साध्य उपक्रम की शुरुआत करीब 10 साल पहले हुई थी, लेकिन 2004 के आसपास बैंड ने आकार लिया। किसी बड़े मंच पर तीन साल पहले उसकी पहली प्रस्तुति हुई। अनूप रंजन पाण्‍डेय से चर्चा करने पर ज्ञात हुआ कि देशभर में छा जाने वाला वाला जनजातीय संगीत (जिसमें गीत वाद्य, नृत्‍य शामिल है) से परिपूर्ण, आदिवासी संस्कृति की संपूर्ण झलक दिखाने वाला यह बैंड, अक्टूबर में होने वाले दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में अपनी छटा बिखेरेगा। इसे दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन अवसर की चुनिंदा प्रस्तुतियों के लिए रखा गया है। जहां बस्तर के लोक संगीत और विलुप्त वाद्यों के साथ 40 से ज्यादा कलाकार गजब का प्रभाव छोड़ने वाली एक से डेढ़ घंटे की प्रस्तुति देंगे। 
यह प्रदर्शन दर्शकों को बस्तर के कोने-कोने की संगीतमय यात्रा कराएगी एवं प्रकृति के सबसे करीब होने का अहसास भी कराएगी। बस्‍तर बैंड के इसी ख्याति के आधार पर ही कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजन समिति ने आयोजन अवसर पर 3 से 6 अक्टूबर के बीच इन्हें प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किया है। इसके पूर्व 17 सितम्‍बर को दिल्‍ली सेलीब्रेट (दिल्‍ली सरकार) के द्वारा संध्‍या 6 से 9 बजे दिल्‍ली हॉट में बस्‍तर बैंड का प्रदर्शन होने जा रहा है, दिल्‍ली और उसके आस-पास के पाठकों से मेरा निवेदन है कि इस प्रदर्शन को अवश्‍य देखें।नया थियेटर के मुख्‍य नाट्य कलाकार, प्रसिद्ध रंगकर्मी, लोक कलाकार और संगीत नाटक अकादमी के छत्‍तीसगढ़ के एक्‍जीकेटिव बाड़ी मेम्‍बर  अनूपरंजन पांडेय  के संबंध में जानकरी यहां उपलब्‍ध है।




रपट संजीव तिवारी.

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