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माणिक का आलेख-अनुभव :-''बिरहा गायन का एक लोकप्रिय स्वर जाता रहा और आहट तक नहीं हुई''

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on बुधवार, सितंबर 08, 2010 | बुधवार, सितंबर 08, 2010

राम कैलाश यादव-फोटो श्रीनि 
बात हो हल्ले की नहीं है  मगर फिर कुछ तो आहट होनी थी उसके जाने पर जो उसके काम को बाकी दुनिया की तरफ से  सही आदर हो सकता था.,मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं. गाँव के ठेठपन को आभास कराता एक लोककलाविद हमारे बीच अपने सादेपन और लोक गायकी की खुशबू बिखेरता हुआ ही अचानक चल बसा और मीडिया  जगत में आहट तक ना हुई.दिल तब अधिक दु;खता  है जब देश का कोई सादगी संपन्न कलाकार ये जहां चुपचाप छोड़ जाता है. उसके मरने के बाद उसके काम को सभी रोते देखें हैं मगर इस  बार यूं.पी.के बिरहा गायन को ना केवल ज़िंदा रखने बल्कि अपने और से उसे समृद्ध और संपन्न बनाने में कोइ कसर नहीं छोड़ने वाले  उसी दिशा में अपना जीवन फूँक देने वाले राम कैलाश यादव जी को क्या मिला.वैसे जो भी उनके संपर्क में आया वो ही समझ सकता है कि वक्त के साथ बिरहा के कानफोडू होने और बिगड़  जाने की हद तक आने पर उनका काम कितना महत्वपूर्ण है.जो सदा याद आयेगा. देश की कलापरक संस्थाएं ये आभास आज भी करती हैं.खैर भौतिकतावादी इस युग में कलापरक बात करना बीन बजाना लगने  लगा है. इनसे अच्छा तो कुछ संस्कृतिप्रेमी मित्रों  के साथ एक बैठक कर उन्हें याद कर लें बेहतर लगता है.वो भी बिना प्रेस नोट जारी किए.क्योंकि इस तरह के  प्रेस नोट छप जाना कम आश्चर्यजनक बात नहीं है.

हमारे अपने जीवन से ही कुछ प्रमुख और जरूरी मूल्यों की बात अपने संगीतपरक कार्यक्रम के ज़रिए  करने वाले राम कैलाश यादव संगीत नाटक आकादेमी से सम्मानित आम आदमी के गायक थे.उनके साथ पिछले दिनों आई.आई.टी.कानपुर में स्पिक मैके के राष्ट्रीय अधिवेशन  के तहत  छ; दिन रहने का मौक़ा मिला.जहां उनकी सेवा और उनके साथ कुछ हद तक अनौपचारिक विचार-विमर्श के साथ ही वहीं उनके गाये-सिखाए लोक गीतों पर रियाज़ के दौर बहुत याद आते हैं . अब तो वे  ज्यादा गहरी यादों के साथ हमारे बीच हैं,क्योंकि वे चल बसे.आदमी के चले जाने के बाद वो ज्यादा प्यारे हो जाते हैं.ये ज़माने की फितरत भी तो  है.उसी ज़माने में खुद को अलग रख पाना बहुत मुश्किलाना काम है.गांवों-गलियों और पनघट के गीत गाने वाला एक मिट्टी का लाडला ह्रदय गति से जुडी बीमारी  के कारण चल बसा. 

वे अपने मृत्यु के अंतिम  साल में भी हमेशा की तरह भारतीय संकृति पर यथासमय भारी लगने  वाली अन्य संस्कृतियों के हमले से खासे नाराज़ नज़र आते थे. कानपुर में उनका कहा एक  वाक्य आज भी कचोटता है कि आज के वक्त में खाना और गाना दोनों ही खराब हो गया है.ठेठ यूं.पी. की स्टाइल  में कही जाने वाली उनकी बातें भले ही कई बार समझ में नहीं आती हों लेकिन उनका लहजा और उस पर भी भारी उनके चहरे पर आने वाली अदाएं असरदार होती है.धोती-कुर्ते के साथ  उनके गले में एक गमछा सदैव देखा जा सकता था.उनके गाए गीतों में अधिकांशत; अपने मिट्टी की बात है या कुछ हद तक उन्होंने मानव समाज  से जुड़ी बुराइयों पर खुल कर गाया बजाया है.उनके कुछ वीडियो और ऑडियो गीत नेट पर मिल जायेंगे,मगर नहीं मिल पाएगा तो राम कैलाश  यादव का मुकराता चेहरा.ज्यादातर उनके गायन की शुरुआत में ओ  मोरे राम ,हाय मोरे बाबा,मोरे भोले रसिया  कहते हैं.और उस पर भी भारी  उनके पीछे टेर लगाकर गाते उनके साथी . आज उनके बगैर बहुर अधूरे लगते हैं.कोइ तो उनके साथ गाते बजाते बुढा हो तक गया है.

अपने सभी मिलने वालों में भगवान् के दर्शन करने वाले निरंकारी भाव वाले गुरूजी के कई संगीत एलबम निकाले हैं. जिनमें उन्नीस सौ पिच्चानवें से अठ्यानवें के बीच निकले सती सुलोचना,दहेज़,क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद,अभिमानी रावण ख़ास हैं.उन्होंने देशभर के लगभग सभी बड़े शहरों को अपने कार्यक्रम से नवाज़ा था.उनके साथ लोक वाध्य यंत्रों की एक पांच-छ; कलावृन्द  की मंडली होती रही.वे खुद खड़े होकर अपनी प्रस्तुती देते थे. बीच-बीच में कुछ अंगरेजी डायलोग बोलना और मूछों पर हाथ फेरना उन पर फबता था.उनसे सिखा एक गीत आज भी याद है जो मैं गुनगुनाता हूँ. बिरहा का कजरी में गाया जाने वाला ये एक ठेठ  रंग है.कि 

हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा 
आवे बदरा आवे बदरा ,हमरे ………….
जाईके  बरस बदरा वांई  धोबी घटवा 
जहां धोबइन  भीगोईके पछारे कपड़ा 
हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा   ……………..
जाईके  बरस बदरा वांई रे कुंवनियाँ
जहां पनिहारिन निहुरिके भरत बा घघरा
हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा   ……………..
जाईके  बरस बदरा वांई रे महलियाँ
जहां बिरहिन निहारता पिया का डगरा
 हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा   ……………..
 
जाईके  बरस बदरा वांई फूल बगियाँ 
जहां मलिनिया बईठके  गुहत बा गुजरा  
हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा   ……………..
जाईके  बरस बदरा धनवा के खेतवा 
जहां जोहतबा किसानिन उठाईके नजारा 

उनके नहीं रहने के पांच दिन बाद ये  खबर मुझे कोटा,राजस्थान के संस्कृतिकर्मी और  स्पिक मैके के राष्ट्रीय सलाहकार अशोक जैन और स्पिक मैके कार्यकर्ता वीनि कश्यप ने दी . मैं एक ही बात सोच रहा था कि इस  ज़माने में कलाकार तो बहुत मिल जाते हैं मगर सही इंसान नहीं मिल पाते .आज के  दिन एक कलाकार के साथ के रूप में याद रहने वाला दिलवाला इंसान हमारे बीच नहीं रहा.उनके पांचवें बेटे कृष्ण बहादुर से बातचीत पर जाना कि गुरूजी ने अपना अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम स्पिक मैके आन्दोलन की पुणे शाखा के लिए एक  सितम्बर को ही दिया था.वैसे सन अठ्ठासी से हार्ट अटेक के मरीज यादव अब तक इलाहबाद से इलाज ले रहे है थे. बीमारी के चलते अचानक तबियत नासाज हुई और तीन सितम्बर को उनके गाँव लमाही जो ठेठ  यूं.पी. के हरिपुर तहसील में पड़ता है से पास के कस्बे ले जाते रास्ते में ही मृत्यु हो गई.अब उनके पीछे छ; बेटे हैं,बेटी कोइ  नहीं है . मगर अचरज  की बात हो या शोध की कि उनमें से एक भी बिरहा नहीं गाता है. हाँ उनके दो पोते जरुर इस काम को सीख कर आज रेडियो के ज़रिए  बहुत अच्छा  गा-बजा रहे हैं.प्रेमचंद और दिनेश कुमार जो पच्चीस-छब्बीस सालाना उम्र लिए युवा सृजनधर्मी हैं.मतलब राम कैलाश जी यात्रा के जारी रहने आसार हैं.

राम कैलाश यादव, स्पिक मैके प्रस्तुति देते हुए-फोटो श्रीनि 
भले ही और लोगों ने बिरहा गायन  को मनोरंजन के लिए खुला छोड़कर तार-तार कर दिया हो मगर गुरु राम कैलाश जी आज तक भी अपने दम पर सतत बने हुए थे. अगर उनके नहीं रहने के बाद भी  उन्हें सही श्रृद्धांजली देनी है तो हमें अपनी रूचि में संगीत को परख कर सुनने की आदत डालनी चाहिए. राम कैलाश जी सबसे ज्यादा संगीत के इस बिगड़ते  माहौल और लोक स्वरुप का बँटाधार करते इन कलाकारों से दु:खी  थे.वैसे इस बिरहा गायन की परम्परा को देशभर में बहुत से अन्य कलाकार भी यथासम्भव आगे बढ़ा रहे हैं,मगर उनकी अपने सीमाएं और विचारधारा हैं.ऐसे में ज्ञान प्रकाश तिपानिया,बालेश्वर यादव,विजय लाल यादव भी इस  क्षेत्र  से जुड़े कुछ ख़ास नाम  हैं.ये यात्रा तो आगे बढ़ेगी ही,मगर दिशा क्या होगी,भगवान् जाने.


सारांशत: कुछ भी कहो उस प्रखर सृजनधर्मी की गहन  तपस्या का कोइ सानी नहीं है. एक बात गौरतलब है कि जितने बड़े तपस्वी गुजरे हैं.उनके बाद हुई खाली जगह ,यूं ही खाली पडी रही.बात चाहे उस्ताद बिस्मिलाह खान की हों या हबीब तनवीर की ,कोमल कोठारी की या फिर एम्.एस.सुब्बुलक्ष्मी की,बात सोला आना सच्ची है.

आलेख:-माणिक
संस्कृतिकर्मी  और अपनी माटी सम्पादक
चित्तौडगढ,राजस्थान 
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6 टिप्‍पणियां:

  1. Wah manik bhai... baat dil ko choo gayi... vastav me in santon ka koi saani nahin hai... sahi mayano me sant hi to hai yeh log...

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  2. Manik pichle saal he mujhe unke saath waqt bitane ka mauka mila tha. na unko bhoola ja sakta hai na he unke gayan ko . media shayad unhe koi jagah na dey lekin wo un sab ke dilo main jinda rahenge jo unse mile hain.

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  3. पूर्वी भारत में विरह की ए़क समृद्ध परंपरा है और लोक जीवन का अभिन्न अंग है... उसी क्रम में राम कैलाश यादव ए़क ससक्त स्वर थे लोकरंजन के जहाँ मनोरंजन भी ए़क उद्देश्य लिया होता था... राम कैलाश जी का नहीं होना लोकगीत की क्षति है ! उनका जो गीत मानिक जी आपने संदर्भित किया है... आम आदमी के जीवन में जल के महत्व को बखूबी दर्शा रहा है... साथ ही लोक जीवन के विभिन्न आयामों को छु रहा है... हम अपनी माटी टीम के साथ हैं... इस सांस्कृतिक क्षति के समय... मानिक आपने बहुत सुंदर संस्मरण लिख है....

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  4. आपने बहुत सुंदर संस्मरण लिख है....

    उत्तर देंहटाएं
  5. ram kailash ji ki sangeet mujhe bahut pasand hai.mai unki birha jitna sunta hoo mujhe kam lagata hai.
    ramesh chandra yadav(b.tech,m.tech)
    assistant professor.
    nitra,ghaziabad

    उत्तर देंहटाएं
  6. MERI BAHUT ICHHA HAI KI UNKE GHAR KE KISI MEMBER SE MERI BAAT HO JAYE.AGAR AISA HOGA TO BAHUT KHUSHI MILEGI MUJHE.
    MERA NO.09953973148
    RAMESH CHANDRA YADAV
    FROM JAUNPUR NEAR JANGHAI.
    ASST.PROFESSOR
    NORTHERN INDIA TEXTILE RESEARCH ASSOCIATION.GHAZIABAD

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