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आयोजन रपट:- हैदराबाद में त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, सितंबर 19, 2010 | रविवार, सितंबर 19, 2010


(हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, के शोध छात्र राजीव कुमार ने हमें ये रपट भेजी है -सम्पादक )
 हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के सहयोग से 1 सितम्बर से 3 सितम्बर, 2010 तक ‘हिन्दी आलोचना और मैनेजर पाण्डेय विषय पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका उदघाटन हैदराबाद विश्वविद्यालय के समकुलपति प्रोफेसर प्रकाश. सी. सारंगी ने किया. दीप प्रज्ज्वलन के उपरान्त संगोष्ठी का आरम्भ निराला रचित सरस्वती-वंदना और तेलुगु के भक्त-कवित्यागराज के गीत के सस्वर गायन से हुआ. हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर रवि रंजन ने अतिथियों का स्वागत किया. संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि मैनेजर पाण्डेय, भारत में प्रगतिशील-जनवादी आंदोलन की देन होने के साथ ही उसका विकास करने वाले हिन्दी के उन गिने-चुने साहित्यकारों में से एक हैं, जिन्होंने समकालीन साहित्य के साथ गंभीरता से परम्परा का भी मूल्यांकन किया है. समकुलपति महोदय ने हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी को विश्वविद्यालय की विभिन्न महत्त्वपूर्ण अकादमिक गतिविधियों की एक उल्लेखनीय कड़ी के रूप में रेखांकित करते हुए इसमें प्रोफेसर मैनेजर पाण्डेय जी की व्यक्तिगत उपस्थिति के लिए आभार ज्ञापन किया. संगोष्ठी की शुरुआत मैनेजर पाण्डेय के आत्मवक्तव्य के साथ हुई. उन्होंने आलोचना का लोकतंत्र के निर्माण में सहयोगी तथा आलोचना के लोकतंत्र के निर्माण के लिए आवश्यक बताया. कवि-आलोचक तथा ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने मैनेजर पाण्डेय के योगदान को हिंदी आलोचना के विकास के सन्दर्भ में रेखांकित किया. श्री वाजपेयी के अनुसार तमाम वैचारिक मतभेदों के बावजूद मैनेजर पाण्डेय की आलोचना के साथ उनका वाद-विवाद एवं संवाद जारी रहा है. इस उद्घाटन सत्र के अध्यक्षीय भाषण में मानविकी संकाय के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर मोहन जी.रमणन ने प्रो. मैनेजर पाण्डेय को भारतीय अंग्रेज़ी लेखन के क्षेत्र में प्रो. आयंगार एवं प्रो. सी. डी. नर्सिमहैया सरीखे दो महत्त्वपूर्ण आलोचकों के समकक्ष हिन्दी आलोचक बताया जिनके कृतित्व पर विचार किया जाना बहुत आवश्यक है. सत्र के अंत में सभागार में उपस्थित सभी विद्वानों एवं छात्र-छात्राओं ने खड़े होकर मैनेजर पाण्डेय का अभिवादन किया और धन्यवाद ज्ञापन हिन्दी विभाग के प्रो.आर.एस.सर्राजु ने किया.
दूजे दिन के  दूसरे सत्र के अंतर्गत ज्योतिष जोशी ने मैनेजर पाण्डेय के समाजशास्त्रीय चिंतन के विभिन्न आयामों को व्यापकता और गहराई के साथ रेखांकित किया. प्रसिद्ध मराठी दलित चिन्तक एवं अनुवादक सूर्यनारायण रणसुभे ने मैनेजर पाण्डेय की आलोचना को दलित साहित्य के सन्दर्भ में विश्लेषित किया. प्रसिद्ध स्त्री आलोचक रोहिणी अग्रवाल ने मैनेजर पाण्डेय की स्त्री विषयक आलोचना के महत्व को रेखांकित किया. रांची विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष रवि भूषण ने मैनेजर पाण्डेय की आलोचना के समस्त पड़ावों को रेखांकित करते हुए तेलंगाना किसान आंदोलन, नक्सलबाड़ी आंदोलन, संपूर्ण क्रांति आदि आन्दोलनों की भूमिका को उनके आलोचनात्मक चेतना के निर्माण के सन्दर्भ में देखने –समझने का प्रस्ताव रखा. सत्र के अंत में अध्यक्षीय भाषण देते हुए अशोक वाजपेयी ने बताया कि मैनेजर पाण्डेय की आलोचना का सर्वाधिक महत्त्व साहित्यवाद से मुक्ति के प्रयास में दिखाई पड़ता है.
तीसरे सत्र के अंतर्गत श्री वेंकेटेश्वर विश्वविद्यालय के आई. एन. चंद्रशेखर रेड्डी, युवा आलोचक अभिषेक रौशन, कवि-आलोचक कृष्णमोहन झा, एवं पंकज चतुर्वेदी तथा ज.स.म. के महासचिव और युवा चिन्तक प्रणय कृष्ण ने मैनेजर पाण्डेय के काव्यालोचन के विभिन्न पक्षों पर अपने विचार प्रस्तुत किये. सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध आलोचक, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता के निदेशक एवं ‘वागर्थ’ के संपादक विजय बहादुर सिंह ने की. अपने अध्यक्षीय व्याख्यान में उन्होंने हिन्दी आलोचना की समृद्ध परम्परा में मैनेजर पाण्डेय के अवदान को रेखांकित किया.इस सत्र की समाप्ति के उपरांत संध्या समय हिंदी विभाग के विद्यार्थियों द्वारा शिवप्रसाद सिंह रचित ‘नन्हों’ कहानी की नाट्य प्रस्तुति भी की गई.
तीसरे दिन के चतुर्थ सत्र के अंतर्गत ‘सापेक्ष’ संपादक महावीर अग्रवाल ने मैनेजर पाण्डेय के साक्षात्कार के सन्दर्भ में,कवि लाल्टू ने समाजशास्त्र, युवा आलोचक देवेन्द्र चौबे, वैभव सिंह ने मैनेजर पाण्डेय के इतिहास-दृष्टि के सन्दर्भ में तथा गजेन्द्र पाठक ने मैनेजर पाण्डेय की आलोचना और प्रत्यालोचना के महत्व पर अपने विचार प्रस्तुत किये. सत्र की अध्यक्षता भारतीय भाषा केंद्र जे.एन.यू के प्रोफ़ेसर रामबक्ष ने किया. पने अभिभाषण में प्रो.रामबक्ष ने कहा कि मैनेजर पाण्डेय साहित्य को विचारधारात्मक रूप मानते हैं. पंचम सत्र के अंतर्गत असम विश्वविद्यालय के प्रभात मिश्र, देवघर कॉलेज के राहुल सिंह, हैदराबाद विश्वविद्यालय के आलोक पाण्डेय एवं राकेश कुमार सिंह ने मैनेजर पाण्डेय के योगदान को विभिन्न सन्दर्भों में व्याख्यायित किया.
समापन सत्र में मैनेजर पाण्डेय ने पूर्व वक्ताओं के सवालों, आपत्तियों एवं जिज्ञासा का विस्तार से जवाब दिया. प्रो. पाण्डेय ने आलोचना की पहली शर्त दुराग्रह और पक्षपात से मुक्ति को माना. उन्होंने सुविधा को सिद्धांत बनाने की राजनीति को आलोचना के लिये खतरनाक बताते हुए आलोचना को सुविधा की साधना एवं दुविधा की भाषा से बचने का आह्वान किया. उन्होंने बताया कि आलोचना की मुक्तिधर्मिता को, सार्थक और समाज-सापेक्ष आलोचना के सन्दर्भ में मुक्ति का अर्थ “मोक्ष’ नहीं बल्कि यहाँ मुक्ति समाज सापेक्ष शब्द है जो समाज से मुक्त होने के बजाय युक्त होकर ही अपनी सार्थकता सिद्ध कर पाता है. उनके अनुसार कला और रचना की खोज करती आलोचना ही मुक्तिधर्मी आलोचना तथा इतिहास की प्रक्रिया का बोध करने वाली आलोचना ही सार्थक है.
राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम सत्र में समापन भाषण देते हुए प्रणय कृष्ण ने मैनेजर पाण्डेय को अपने समय का सबसे महत्वपूर्ण आलोचक बताया. उन्होंने मैनेजर पाण्डेय की रचनात्मक यात्रा को आलोचनात्मक संघर्ष बताया. जिसे उनके रचनाकर्म के प्रारंभ के समय भारत एवं विश्व में चल रहे तमाम सत्ताविरोधी, साम्राज्यवाद विरोधी जनांदोलनों को बिना जाने, सम्पूर्णता में नहीं समझा सकता. प्रणय कृष्ण के अनुसार मैनेजर पाण्डेय की आलोचना के तीन केंद्रीय तत्व यथार्थवाद, इतिहास-दृष्टि, और विचारधारा हैं. इसी के माध्यम से वे किसी भी रचना की विगत अर्थवत्ता और वर्तमान सार्थकता को रेखांकित करते हैं. इस सत्र की अध्यक्षता प्रो.शकुंतला रेड्डी ने की.धन्यवाद ज्ञापन संगोष्ठी निदेशक प्रोफ. रवि रंजन ने किया. छात्रों की उपस्थिति लगातार उत्साहजनक बनी रही. संगोष्ठी में हैदराबाद के साहित्यप्रेमी एवं विद्वत समाज की सहभागिता ने संगोष्ठी को गतिशीलता प्रदान की.
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