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''लघु पत्रिका आन्दोलन''- अखिलेश शुक्ल

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on गुरुवार, सितंबर 16, 2010 | गुरुवार, सितंबर 16, 2010

कुछ सार्थक पत्रिकाएँ

‘हिंदी चेतना’

पत्रिका: हिंदी चेतना, अंक: जुलाई2010, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रमुख संपादक: श्याम त्रिपाठी, संपादक: सुधा ओम ढीगरा, पृष्ठ: 78, ई मेल: hindichetna@yahoo.ca , वेबसाईट/ब्लाग: http://hindi-chetna.blogspot.com/ , (905)475-7165, सम्पर्क: 6 Larksmere Court, Markham, Ontario, L3R 3R1

पत्रिका का यह अंक नई साज सज्जा व कलेवर के साथ पाठकों के सामने आया है। अंक में प्रकाशित कहानियां विश्व समुदाय के सामने भारतीय समाज की पीड़ा को अभिव्यक्ति देती है। प्रमुख कहानियों में टेलीफोन लाईन(तेजेन्द्र शर्मा), पगड़ी(सुमन घई) एवं राम जाने(पंकज सुबीर) शामिल है। ख्यात लेखिका इंदिरा (धीर) वडेरा का प्रज्ञा परिशोधन पूर्ववर्ती अंकों की तरह आम आदमी की जिज्ञासा को शांत करने में पूर्णतः सफल रहा है। डा. अंजना संधीर का स्तंभ ‘एक दरवाजा बंद हुआ तो दूसरा खुला’ एवं आत्माराम शर्मा का हिंदी ब्लाग पाठकों को नवीनतम जानकारियां उपलब्ध कराता है। सुधा गुप्ता का संस्मरण रिश्ता एवं शशि पाधा का दृश्य पटकथा पात्र आम पाठक के जेहन  में कथात्मक रूप से अपनी अमिट छाप छोड़ता है। पत्रिका के दोनों व्यंग्य बहुत पहले से उन कदमों की आहट(समीर लाल समीर) एवं महानता को दौर(पे्रम जनमेजय) उत्कृष्ट रचनाएं हैं। इनमें व्यंग्य के माध्यम से आम भारतीय समाज की विसंगतियुक्त मनोवृत्तियों को उजागर किया गया है। जितेन्द्र सहाय का ललित निबंध दर्द क्लब समाज के दर्द एवं उसकी कसक को सरलता व सहजता के साथ प्रस्तुत कर सका है। जिंदा मुहावरे(डा. एम. फ़ीरोजा खान) व दीपक मशाल की लघुकथाएं भी बारंबार पढ़ने योग्य हैं। बी. मरियम, इला प्रसाद, दिविक रमेश, गुलाम मुर्तजा, अदिति मजूमदार, वेद प्रकाश बटुक एवं प्रेम मलिक की कविताओं में विविधता होते हुए भी वे समाज को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए प्रयासरत दिखाई देती हैं। काव्य संग्रह धूप से रूठी चांदनी(कवयित्री-डा .सुधा ओम ढीगरा) की अच्छी व विश्लेषण युक्त समीक्षा डा. पुष्पा दुबे ने की है। पुष्पा दुबे ने इन कविताओं के संबंध में बहुत सटीक बात कही है। काव्य संग्रह पढ़कर यह भलीभांति जाना समझा जा सकता है कि, ‘‘सुधा जी की काव्यनुभूतियां विस्तृत हैं। उनकी संवेदना स्त्री पीड़ा में मुखर होकर संबोधित होती है। इसलिए उनकी कविताओं में नारी संवेदना मूल स्वर बनकर उभरा है।’’ पत्रिका के प्रमुख संपादक श्याम त्रिपाठी जी का संपादकीय भारत में अंगे्रजी के दुष्प्रभावों व उसके उत्तरप्रभावों पर अच्छी तरह से प्रकाश डाल सका है। उनका कथन, ‘‘वे चीन जाते हैं तो चीनी सीखकर आते हैं. लेकिन भारत आते हैं तो उन्हें हिंदी सीखने की कोई जरूरत नहीं होती’’ स्पष्ट कर देता है कि भारत में हिंदी पूर्ण रूप से स्थापित होने के लिए आज भी संघर्षरत है।

‘गुंजन’

पत्रिका: गुंजन , अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: अनियतकालीन, संपादक: जितेन्द्र चैहान,पृष्ठ:96,मूल्य:50रू.(.वार्षिक 5अंक 250रू.),ईमेल:jchouhan@webdunia.com , http://patrikagunjan.blogspot.com/ , फोन/मो. 09165904583, सम्पर्क: पार्वती प्रकाशन, 73 ए, द्वारिकापुरी इंदौर म.प्र. 452.००९


गुंजन म.प्र. से प्रकाशित होने वाली एक और साहित्यिक पत्रिका है। पत्रिका अनियतकालीन होते हुए भी वर्ष में इसके पांच अंक प्रकाशित किए जाते हैं। समीक्षित अंक में प्रकाशित कहानियां काठ का सपना(मुक्तिबोध) व पिंजरा(जयश्री राय), अच्छी रचनाएं हैं। पिछले लगभग एक वर्ष से जयश्री राय की यह चैथी कहानी पढ़ने में आई है जिसमें नवीनता के साथ साथ समाज के उत्पीड़न को व्यक्त करने का प्रयास किया गया है। पत्रिका में कृष्ण बलदेव वैद्य की डायरी, निसार अहमद से साक्षात्कार व उनका आत्म कथ्य तथा विष्णु खरे का आलेख लौटना निसार अहमद का अन्य प्रभावशाली रचनाएं हैं। सुबोध होलकर, नरेन्द्र गौड़, जितेन्द्र श्रीवास्तव, संजय अलंग की कविताएं समाज को केन्द्र में रखते हुए बाजारवाद के दुष्प्रभावों से सचेत करती दिखाई देती है। स्वप्निल शर्मा, नवीन माथुर पंचैली, प्रदीप मिश्र के आलेखों को पढ़कर इनमें कुछ नयापन दिखाई नहीं देता है। एक तरह से इनमें लकीर को पीटने का ही प्रयास किया गया है। लगभग सभी लघुकथाओं में कोई नया विचार या दृष्टिकोण दिखाई नहीं देता है। राधेश्याम पाठक, छगनलाल सोनी, प्रतिभा पुरोहित, अनुरूपा चैधुले, रेखा चमोली, बीना क्षत्रिय की कविताएं समाज व आसपास के वातावरण के प्रति खीज अथवा क्षोभ की अभिव्यक्ति लगती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं ठीक ठाक है। यह बात बड़ी अखरने वाली है कि पत्रिका केवल अपने सदस्यों की रचनाएं ही प्रकाशित करती है। इससे हो सकता है भविष्य में अच्छी रचनाएं पत्रिका को न मिल सके। फिर भी एक अच्छे व सुंदर कलेवर युक्त इस प्रकाशन का स्वागत किया जाना चाहिए।
 
‘सुखनवर’

पत्रिका: सुखनवर, अंक: जुलाई-अगस्त2010, स्वरूप: द्विमासिक, संपादक: अनवारे इस्लाम, पृष्ठ: 48, मूल्य:255रू.(.वार्षिक 170रू.), ई मेल: sukhanwar12@gmail.com , ब्लाग: http://www.sukhanwarpatrika.blogspot.com/ , फोन/मो. 09893663536, सम्पर्क: सी-16, सम्राट कालोनी, अशोका गार्डन, भोपाल 462.023 म.प्र.
हिंदी एवं उर्दू भाषा एवं साहित्य की साक्षा संस्कृति का साहित्य प्रकाशित कर रही यह पत्रिका अन्य हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं से हटकर है। इस अंक में सुरेश पंडित व डाॅ. सुधा दीक्षित के लेख साहित्य के साथ साथ भारतीय राजनीतिक दृष्टिकोण भी व्यक्त करते हैं। भगवान दास जैन, बलवीर राठी, निगार अजीम, शकी ल जमाली, सुमन अग्रवाल, वसीम मलिक, मंगल नसीम की ग़ज़लें अच्छी व पठनीय हैं। हरिशंकर अग्रवाल एवं जंगबहादुर श्रीवास्तव के गीत पत्रिका के स्तर में वृद्धि करते हैं। फ़रहत जहां, अंजुम उस्मानी एवं एजाज़ अहमद की कहानियों में आज के समाज व उसकी विसंगतियों पर विचार कर उन्हें दूर करने का आग्रह किया गया है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं व साक्षात्कार भी स्तरीय व पठनीय हैं।

मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका 

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: अगस्त2010, स्वरूप: मासिक, प्रधान संपादकः डा.बी. रामसंजीवैया, गौरव संपादक: डा. मनोहर भारती, पृष्ठ: 52, मूल्य:5रू.(.वार्षिक 50रू.), ई मेल: brsmhpp@yahoo.co.in , फोन/मो. 080.23404892, सम्पर्क: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, 56, वेस्ट आफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर कर्नाटक


दक्षिण की प्रमुख हिंदी पत्रिका मैसूर हिंदी प्रचार परिषद के समीक्षित अंक में आलेखों व अन्य रचनाओं का प्रस्तुतिकरण प्रभावित करता है। अंक में प्रेम की तीव्र अनुभूति और कालजयी साहित्य(एस.पी. केवल), हिंदी विश्व पटल पर(अनिरूद्ध सिंह सेंगर), हिंदी को आपका अपनत्व चाहिए(मोहन भारतीय), हिंदी से कैदियों के जीवन में जागी नई उमंग(अनिल सावले) उल्लेखनीय रचनाएं हैं। अन्य पठनीय रचनाओं में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली का प्रयोग(पी. के. जयलक्ष्मी), धूमिल काव्य में विद्रोही चेतना(अमर सिंह वधान), डा. फर्डिनाॅण्ड किटेल(प्रो. बी.के. ललिताम्बा), साहित्य के सामाजिक सरोकार प्रभावित करते हैं। प्रियंका सोनी, अंजु दुआ जैमिनी, एस.के. जैन लाॅगपुरिया, भानुदत्त त्रिपाठी मधुरेश, सतीश वर्मा, लालता प्रसाद मिश्र लाल की कविताएं आज के समाज की विसंगतियों को उजागर करने में सफल रही हैं।

‘अभिनव बालमन’

पत्रिका: अभिनव बालमन, अंक: जुलाई-सितम्बर10, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादकः निश्चल,पृष्ठ:48,मूल्य:15रू.(.वार्षिक50रू.),ई-मेल:abhinavbalmann@rediffmail.com ,फोन/मो. 09719007153, सम्पर्क: शारदायतन, 17/239 जेड़ 13/59, पंचनगरी अलीगढ़ उ.प्र.

पत्रिका का अंक बच्चों में पठन पाठन के प्रति रूचि जाग्रत करने में सहायक है। अंक में बाल रचनाकारों को प्रमुख रूप से स्थान दिया जाता है। इस अंक में भी श्रेष्ठा, आफरीन, अवनी, नेनसी जितेन्द्र, नेहा, परी, दीप्ती, मुकुल, कनिका, मयंक, पूनम, सुशांत, तान्या, उर्वशी आदि की रचनाएं शामिल की गई हैं। वरिष्ठ रचनाकारों में राकेश चक्र, गोपाल बाबू शर्मा, संजय कुमार, निश्चल, घमण्डीलाल, डाॅ. ब्रजनंदन वर्मा, योगेश कुमार, रश्मि बडवाल, शिवहरि गोस्वामी, सतीश नैन की रचनाएं बच्चों के लिए शिक्षाप्रद व ज्ञानवर्धक हैं। पत्रिका के विभिन्न स्तंभ के आलेख/रचनाएं भी बच्चों के बौद्धिक विकास में पूरी तरह से सहायक हैं। पत्रिका का कलेवर बच्चों को प्रभावित करता है। 
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