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डॉ0 महेन्द्र प्रताप पाण्डेय के दोहे:-बिटिया का जीवन

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on शनिवार, अक्तूबर 02, 2010 | शनिवार, अक्तूबर 02, 2010

बिटिया जब छोटी रही, छोटा था संसार।
मातु पिता अरू भ्रात की, पाती थी निज प्यार।।1।।
आस-पास वय बाल में, खेली सुबहो शाम।
स्नेहिल होकर ही रही, मिलता था आराम।।2।।
ज्यों-ज्यों संवर्धन हुआ, आया मन में लोच।
त्याग, प्रेम, लज्जा बढ़ी, और बढ़ा संकोच।।3।।
घर की इज्जत ध्यान में, बाहर जाना बन्द।
हंसी तेज दुर्लभ हुयी, हो गयी गति में मन्द।।4।।
लगी सिखाने माँ उसे, घर के सारे काज।
अब तुम भी छोटी नहीं, समझो रीति-रिवाज।।5।।
पिता सिखाता धर्म यह, बड़ा है कन्यादान।
पर कन्या का हो रहा, जग में है अपमान।।6।।
दुश्मन वे नर खुद बने, लेते सदा दहेज।
समुचित इज्जत ना मिला, लोभ से न परहेज।।7।।
चूल्हा चौका कर रही, सीखे नित नव ज्ञान।
माँ समझाती यह सदा, सबको दो सम्मान।।8।।
सीख-सीख गुण धर्म को, जान गयी सब हाल।
नही पता उसको हुआ, पति बनेगा काल।।9।।
पिता ढूंढता वर रहा, गया दूर बहु गाँव।
राह न कोई दिख रहा, बने जो उसका छॉव।।10।।
गुण की बाते बहुत सी, कही गयी बतलाय।
पैर थके घर घर गये, थके हृदय बहु धाय।।11।।
दुनियॉ में सब एक से, नही जिन्हे परहेज।
सभी मॉगते ही दिखे, केवल एक दहेज।।12।।
लोटा थाली बेच दी, बेचा सभी जमीन।
फिर भी उसको ना रहा, जग पर अभी यकीन।।13।।
चिन्ता उसको यह रही, करूॅ मै कन्यादान।
पर चिन्ता यह भी रही, रहे सुरक्षित जान।।14।।
दिया दुहाई ढेर सी, पूजा बहु भगवान।
उचित उम्र शादी बने, घर का हो सम्मान।।15।।
पढ़े-लिखे अनपढ मिले, ना ली बिटिया राय।
जहॉ कही कोई कहे, सुनकर जाये धाय।।16।।
मॉ समझाती प्यार से, पति परमेश्वर जान।
सास ससुर को देव अस, कहना उनका मान।।17।।
देवर को बालक समझ, देना लाड़ दुलार।
पति पागल हो जाय पर, करना उसको प्यार।।18।।
जो मिल जाये प्यार से, समझो अपना भाग्य।
उससे कर संतोष को, मत कहना दुर्भाग्य।।19।।
कुल कुटुम्ब के मान का, रखना हरदम ध्यान।
यही परम कल्याण का, साधन अपना जान।।20।।

 






डॉ0 महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ‘‘नन्द’’
राजकीय इण्टर कॉलेज द्वाराहाट अल्मोड़ा
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